बच्चे पैदा मत कीजिए और अगर कीजिए तो उन्हें अपनी भौंडी पॉलिटिकल मूर्खताओं में शामिल मत कीजिए
राहुल गांधी की तस्वीर पर लातें मारती ये बच्ची इस देश की सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए.
Advertisement

हम बच्ची की तस्वीर नहीं दिखा रहे. क्योंकि वो बच्ची अभी ये सब समझने लायक नहीं है.
Quick AI Highlights
Click here to view more
यकीन मानिए, आपके घर वालों के अलावा किसी को फ़र्क नहीं पड़ता कि आपकी कितनी संतति हैं. देश की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है, संसाधन कम पड़ेंगे. मूर्खों पर वो संसाधन यूं ही खर्च हो रहे हैं. वो मूर्ख जो सिर्फ पैदा होकर सांस लिए जा रहे हैं. ये देश बहुत सहिष्णु है. बहुत अच्छा है. हमारे देश का संविधान बनाने वाले बहुत बड़े दिल के थे. उन्होंने क़ानून की किताबों में ये नहीं लिखने दिया कि मूर्खों को जीवन का हक़ नहीं है. यही वजह है कि इस महान देश में अपनी सारी मूर्खताओं को समेटे हुए आप जी रहे हैं. पर प्लीज़ इस मूर्खता में अपने बच्चों को शामिल न करें.
हम ये क्यों कह रहे हैं, ये जानने के लिए फेसबुक पर वायरल वो वीडियो देख लीजिए. हम लिंक नहीं दे रहे हैं. आप जाएंगे, कोसेंगे या समझाएंगे. आगे और विवाद होंगे. वो बच्ची अभी बैशिंग की हक़दार नहीं हैं. ये मेरे हिस्से का डैमेज कंट्रोल है.
एक बच्ची राहुल गांधी की तस्वीर पर लातें मार रही है. कैप्शन लिखा मिलता है.
"एक बार इस प्यारी सी बच्ची की बात ध्यान से सुनिए।
इस को गुस्सा क्यों आया?
राहुल गांधी के फोटो पे लाते चला रही हैं."
री-प्रोडक्शन बहुत आसान काम है. कक्षा-9 की किताब में जैसा नज़र आता था, उससे भी आसान. बच्चे पैदा करने की प्रोसेस 5 नंबर के सिर्फ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में जटिल होती है. मुश्किल होता है, बच्चे पैदा करके उन्हें पालना. ढंग का इंसान बनाना. ऐसा इंसान जो कल को इस महान देश की आबोहवा में विचरे तो लोग उसके मुंह खोलते ही उसके मां-बाप की दी हुई परवरिश पर सवाल न उठाएं.
हमें आज़ादी मिली, राष्ट्र ने रूप लिया. नियम बने, हर किस्म के. तब नीति-निर्माताओं ने एक ग़लती कर दी. मां-बाप बनने की योग्यता तय नहीं की. कैसा होता कि एक परीक्षा होती. देखा जाता कि शारीरिक रूप से तो ठीक क्या आप मानसिक रूप से भी बच्चे पालने योग्य हैं. ग्रेडिंग होती, रेटिंग होती. जो अधकच्चे होते, उन्हें लाइनों में लगाया जाता. जब ये तय हो जाता कि वो बच्चों को पालने की बेसिक समझ रखते हैं, तब उन्हें संतान उत्पत्ति की अनुमति मिलती.
नीतियां बनाने वालों ने गलती की. उन्होंने देश के हर बच्चे को संसाधन नहीं माना. इसी कारण इंसान की जान की कीमत नहीं रह गई. समय की कीमत नहीं रह गई. दिन का डेढ़ जीबी इंटरनेट पर खपाते इस देश की बहुत क्षति हुई है. रुपये का स्तर याद नहीं, बुद्धि का स्तर रसातल में चला गया है. पॉलिटिकल जड़ता ने हमारे दिमाग कुंद कर दिए.
फल ये कि ऐसे वीडियो आते हैं. जब 10 बरस से भी छोटी बच्ची, एक नेता की तस्वीर को लात मार रही होती है. मैं कसम खाकर कहता हूं, उसे ये सब सिखाया गया है. वीडियो बीच में पॉज होता है. 'मासूम नफ़रत' में महिला की आवाज़ थोड़ा घी डालती है. आवाज़ आती है '..ला दूंगी' वीडियो फिर शुरू होता है. बच्ची वही बात दोहराती है. इसे मार-मारकर नानी याद दिला दूंगी. हमारे मां-बाप ने सिखाया था कि कागज़ पर पैर पड़े तो सात बार पैर पड़ लिया करो. मैं भी बचपन में मूर्ख था, पता चला कि अंग्रेजों ने देश पर राज किया था. हमारे लोगों को इतना परेशान किया. फिर पता चला अंग्रेज़ इंग्लैंड लौट गए. मुझे ऐसे ही अखबार में इंग्लैंड का झंडा दिखा. मैं मम्मी को दिखाकर उसे कुचलने लगा. मम्मी ने डांटा. कहा, ऐसे नहीं सोचते. मम्मी सोचने की बात जल्दी में कह गईं थीं. उन्होंने एक्सप्लेन नहीं किया, लेकिन मुझे पता था कुछ तो ग़लत किया है मैंने. अब मैं जानता हूं ग़लत क्या था.
ये कौन से मां-बाप हैं जो अपने बच्चों को फेंकू-पप्पू की भाषा सिखाते हैं? आप कोई भी हों, कितने भी विचारशील हों, आप ग़लत हैं. बच्चे ऐसे नहीं पाले जाते. बच्चे मासूम माने जाते हैं. उनकी गलतियां धक जाती हैं. उनके वीडियो वायरल हो जाते हैं. ये फ़ॉर्मूला है. इसका इस्तेमाल खतरनाक होता जाएगा. ऐसे वीडियोज को डिफेंड मत कीजिए. इन्हें किसी भी पॉलिटिकल फायदे के लिए जस्टिफाई मत कीजिए. आपके हर तरफ बहुत से लोग बहुत ज़्यादा ग़लत हो सकते हैं, पर उससे बदला लेने का ये तरीका नहीं कि हथियार ऐसे बच्चों को बनाया जाए. आपकी चिंता कुछ और हो सकती है, आप शायद ये तर्क ले आएं कि कहीं किसी रोज़ किसी और पार्टी के किसी और नेता के साथ ऐसा ही कुछ हुआ हो. मुझे पार्टी नहीं दिख रही. सच में. मुझे एक बच्ची दिख रही है, जिसके घरवाले अपनी नफरतों के जस्टिफिकेशन के लिए उसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
इस बच्ची को शायद कभी पता न चले. देश सच में खतरे में हैं. हमें डरना चाहिए. सब धर्म खतरे में हैं. हिन्दू-मुसलमान सब खतरे में हैं, क्योंकि आजकल कोई भी बच्चे पैदा किए पड़ा है. ऐसे अभिभावक पैदा हो गए जो बच्चों से ऐसे काम कराते हैं और फिर स्मार्ट फोन पर वर्टिकल मोड में वीडियो शूट करते हैं.
री-प्रोडक्शन बहुत आसान काम है. कक्षा-9 की किताब में जैसा नज़र आता था, उससे भी आसान. बच्चे पैदा करने की प्रोसेस 5 नंबर के सिर्फ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में जटिल होती है. मुश्किल होता है, बच्चे पैदा करके उन्हें पालना. ढंग का इंसान बनाना. ऐसा इंसान जो कल को इस महान देश की आबोहवा में विचरे तो लोग उसके मुंह खोलते ही उसके मां-बाप की दी हुई परवरिश पर सवाल न उठाएं.
हमें आज़ादी मिली, राष्ट्र ने रूप लिया. नियम बने, हर किस्म के. तब नीति-निर्माताओं ने एक ग़लती कर दी. मां-बाप बनने की योग्यता तय नहीं की. कैसा होता कि एक परीक्षा होती. देखा जाता कि शारीरिक रूप से तो ठीक क्या आप मानसिक रूप से भी बच्चे पालने योग्य हैं. ग्रेडिंग होती, रेटिंग होती. जो अधकच्चे होते, उन्हें लाइनों में लगाया जाता. जब ये तय हो जाता कि वो बच्चों को पालने की बेसिक समझ रखते हैं, तब उन्हें संतान उत्पत्ति की अनुमति मिलती.
नीतियां बनाने वालों ने गलती की. उन्होंने देश के हर बच्चे को संसाधन नहीं माना. इसी कारण इंसान की जान की कीमत नहीं रह गई. समय की कीमत नहीं रह गई. दिन का डेढ़ जीबी इंटरनेट पर खपाते इस देश की बहुत क्षति हुई है. रुपये का स्तर याद नहीं, बुद्धि का स्तर रसातल में चला गया है. पॉलिटिकल जड़ता ने हमारे दिमाग कुंद कर दिए.
फल ये कि ऐसे वीडियो आते हैं. जब 10 बरस से भी छोटी बच्ची, एक नेता की तस्वीर को लात मार रही होती है. मैं कसम खाकर कहता हूं, उसे ये सब सिखाया गया है. वीडियो बीच में पॉज होता है. 'मासूम नफ़रत' में महिला की आवाज़ थोड़ा घी डालती है. आवाज़ आती है '..ला दूंगी' वीडियो फिर शुरू होता है. बच्ची वही बात दोहराती है. इसे मार-मारकर नानी याद दिला दूंगी. हमारे मां-बाप ने सिखाया था कि कागज़ पर पैर पड़े तो सात बार पैर पड़ लिया करो. मैं भी बचपन में मूर्ख था, पता चला कि अंग्रेजों ने देश पर राज किया था. हमारे लोगों को इतना परेशान किया. फिर पता चला अंग्रेज़ इंग्लैंड लौट गए. मुझे ऐसे ही अखबार में इंग्लैंड का झंडा दिखा. मैं मम्मी को दिखाकर उसे कुचलने लगा. मम्मी ने डांटा. कहा, ऐसे नहीं सोचते. मम्मी सोचने की बात जल्दी में कह गईं थीं. उन्होंने एक्सप्लेन नहीं किया, लेकिन मुझे पता था कुछ तो ग़लत किया है मैंने. अब मैं जानता हूं ग़लत क्या था.
ये कौन से मां-बाप हैं जो अपने बच्चों को फेंकू-पप्पू की भाषा सिखाते हैं? आप कोई भी हों, कितने भी विचारशील हों, आप ग़लत हैं. बच्चे ऐसे नहीं पाले जाते. बच्चे मासूम माने जाते हैं. उनकी गलतियां धक जाती हैं. उनके वीडियो वायरल हो जाते हैं. ये फ़ॉर्मूला है. इसका इस्तेमाल खतरनाक होता जाएगा. ऐसे वीडियोज को डिफेंड मत कीजिए. इन्हें किसी भी पॉलिटिकल फायदे के लिए जस्टिफाई मत कीजिए. आपके हर तरफ बहुत से लोग बहुत ज़्यादा ग़लत हो सकते हैं, पर उससे बदला लेने का ये तरीका नहीं कि हथियार ऐसे बच्चों को बनाया जाए. आपकी चिंता कुछ और हो सकती है, आप शायद ये तर्क ले आएं कि कहीं किसी रोज़ किसी और पार्टी के किसी और नेता के साथ ऐसा ही कुछ हुआ हो. मुझे पार्टी नहीं दिख रही. सच में. मुझे एक बच्ची दिख रही है, जिसके घरवाले अपनी नफरतों के जस्टिफिकेशन के लिए उसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
इस बच्ची को शायद कभी पता न चले. देश सच में खतरे में हैं. हमें डरना चाहिए. सब धर्म खतरे में हैं. हिन्दू-मुसलमान सब खतरे में हैं, क्योंकि आजकल कोई भी बच्चे पैदा किए पड़ा है. ऐसे अभिभावक पैदा हो गए जो बच्चों से ऐसे काम कराते हैं और फिर स्मार्ट फोन पर वर्टिकल मोड में वीडियो शूट करते हैं.
