The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • villagers in Bihar build bridge over a river when denied help from their government time and again

सरकार ने नहीं की मदद, गांव वालों ने बनाया नदी पर पुल

बिहार में इस बार अकेला मांझी नहीं था पहाड़ काटने को. सारे गांव वालों ने साथ दिया और नदी पर पुल बन गया. सरकार ने दुअन्नी की मदद न की.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
आशुतोष चचा
17 मार्च 2016 (अपडेटेड: 17 मार्च 2016, 12:38 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
आने वाली 21 मार्च को बिहार में एक कमाल होने वाला है. एक लोहे का पुल बना है नदी पर. उसका शिलान्यास है. अगल बगल के 10 गांवों में बस्ती है 50-60 हजार लोगों की. पब्लिक के लिए खुल जाएगा ये पुल. ये दसियों साल से बाट जोह रहे हैं इस दिन को देखने की. लेकिन इस पुल की कहानी में बड़े ट्विस्ट हैं.
DSC_5704
नया दौर फिलिम देखे हो? दिलीप कुमार तांगा हांकता है. तांगे की दौड़ ऑर्गनाइज होती है. मोटर से घोड़े की दौड़. मोटर से जीतने के लिए गांव वाले लकड़ी का पुल बना लेते हैं. वो तो फिल्म है. और बहुत पुरानी कहानी है. ब्लैक एंड व्हाइट जमाने में ये बात हो सकती थी. कि गांव वाले अपने मन से कुछ बड़ा काम कर लें. सरकार की राह तके बिना. बिहार के दशरथ मांझी ने तो पहाड़ काट दिया था. वो भी अकेले. इस बार अकेले किसी मांझी को नहीं पिलना पड़ा. सरकार का मुंह देखते देखते हार गए तो खुद ही बीड़ा उठाया अपनी जिंदगी बदलने का.
DSC_5699
मधुबनी, बिस्फी विधानसभा लगती है. ग्राम पंचायत का नाम है रघौली. यहां एक नदी बहती है. जिसके ईस्ट में 10 गांव बसे हैं. लालपुर, उसौथू, डीह, सिंघिया, भरन, बिस्फी ये कुछ नाम हैं गांवों के. इन गांवों के लोग गले तक मुसीबतों में डूबे थे. बच्चे पांचवी के बाद पढ़ नहीं पाते थे. क्योंकि स्कूल नदी पार था. जान हथेली पर लेकर जाना हो जिसको जाए. कोई बाजार नहीं. सड़क नहीं, आने जाने का साधन नहीं. छोटी छोटी चीज खरीदने नदी पार कर जाना पड़ता. ट्रेन पकड़ने, बस जोहने, अस्पताल सब जाओ जान हथेली पर लेकर. बरसात में तो और दहकच्चर मच जाती थी. मरीज को घर से लेकर निकलो तो मुश्किल ये कि अस्पताल तक पहुंचने से पहले न मर जाए. इन गांवों में शादियां होना बंद हो गई थीं साहब. जितने जवान थे सब गांव छोड़ रहे थे. बूढ़े बुजुर्ग आखिरी सांस का इंतजार करने पड़े रहते थे.
DSCI0299
सन 2012. कौशल किशोर तिवारी ने अपने गांव के लोगों को जोड़ा. बतकही हुई. तय हुआ कि चंदा लगे और बांस का पुल बने. बन गया चचरी पुल. 18 हजार रुपए का खर्च आया. 17 हजार बच गया. फिर जोड़ कर एक लाख रुपए में नाव बनाई गई. इतना सब कुछ होने के बाद भी समस्या बहुत ज्यादा हल नहीं हुई. प्लान बनता रहा.
Untitled design
अजय चौधरी, जिनको प्यार से लोग अप्पू कहते हैं. वो आए 18 नवंबर 2015 को अपने गांव. उनका बिजनेस दिल्ली में है. गांव में किसान फैमिली है. एक बड़ा भाई था विश्वंभर चौधरी. 2009 में नक्सली हमले में वो शहीद हो गए थे.
Kamla Gramin Vikas Samiti Nyas copy - Copy - Copy
तो अप्पू ने गांव वालों से छिट पुट हल्के मन से बात कही कि क्यों न अपना पुल बनवा लिया जाए. सबको ये एक हसीन सपना लगा. तो उन्होंने गांव के बुजुर्गों, जिम्मेदारों से मीटिंग की. उनके सामने मास्टर प्लान पेश किया. कमला ग्रामीण विकास समिति न्यास के नाम से एक ग्रुप बना. अध्यक्ष बने इसके कौशल किशोर तिवारी. उन्होंने ऐलान किया कि भाई सब लोग हेल्प करो. जितना पैसा एक्स्ट्रा लगेगा वो हम लगाएंगे. बात बन गई. इंजीनियर बुलाया गया. एक और की पर्सन थे इस काम में. हम्माद अहमद. सबने मिल कर ये स्क्रू पाइल पुल बनाना शुरू किया. 14 जून 2015 को शहीद विश्वंभर चौधरी सेतु लालपुर के नाम से. एक करोड़ रुपए का खर्च आया. पुल बन कर खड़ा हो गया. 21 तारीख को इसकी लॉन्चिंग है. किसी नेता या VIP को बालाया नहीं गया. गांव वाले ही इसमें आगे रहेंगे.  

Advertisement

Advertisement

()