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या तो ये कहना बंद कर दो 'क़बूल है' या फिर सच में शौहर चुनने की आज़ादी दे दो

ट्यूनीशिया में मुस्लिम औरतें, अब गैर मुस्लिम से शादी कर सकती हैं. लेकिन अपने देश में शादी के इन दो नियमों का कचूमर बना दिया गया.

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18 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 18 सितंबर 2017, 05:54 AM IST)
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लड़की ज्यादा वॉट्सऐप पर रहती है, इसलिए दूल्हे ने शादी तोड़ी.
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99 फीसदी मुस्‍लि‍म आबादी वाला देश ट्यूनीशिया. जिसने अपने एक पुराने कानून को खत्‍म कर दिया. मुस्लिम औरतें, गैर मुस्लिम मर्दों से शादी नहीं कर सकती थी. लेकिन अब छूट दे दी गई है.
ट्यूनीशिया वो भी देश है जो 1956 में एक से अधिक शादियों का रिवाज खत्म चुका है. ट्यूनीशिया के साथ-साथ टर्की में एक से अधिक शादी करना गैर कानूनी है. ट्यूनीशिया में जब ये कानून बना था तो उसमें ये भी था कि अगर कोई रेपिस्ट किसी उस लड़की से शादी कर ले, तो उसकी सजा भी माफ हो जाती थी लेकिन जुलाई में ट्यूनीशिया की संसद ने महिलाओं से जुड़े इस क्रूर कानून के प्रावधान को भी खत्म कर दिया.
ट्यूनीशिया में मुस्लिम औरतें, गैर मुस्लिम से शादी नहीं कर सकती थीं.
ट्यूनीशिया में मुस्लिम औरतें, गैर मुस्लिम से शादी नहीं कर सकती थीं. (Photo : Reuters)

ट्यूनीशिया वो भी देश है, जिसने ट्रिपल तलाक को बैन कर रखा है. ट्यूनीशिया के लिए आप ये कह सकते हैं कि वहां की स्थिति अलग है. वहां का कानून अलग है. वहां भौगोलिक स्थिति भी अलग है. लेकिन इस्लाम तो एक ही है.
इस्लाम में शादी से पहले दो नियम बहुत खास हैं. मगर मर्दवादी सोच ने उन नियमों का कचूमर निकाल दिया है. शरिया लॉ का झंडा बुलंद करने वालों को यहां शरीयत मरती नज़र नहीं आती है.
1. इस्लाम में शादी एक एग्रीमेंट की तरह हैं. दूल्हा-दुल्हन के बीच एग्रीमेंट. क्योंकि निकाह तभी होता है जब दूल्हा अपनी दुल्हन के नाम मेहर की रक़म तय करता है. अब ये दुल्हन पर डिपेंड करता है कि वो कितनी रक़म मांगती है. ये रक़म इसलिए भी होती है कि अगर दूल्हा बाद में धोखा दे दे तो कम से कम औरत के पास अपना गुज़ारा करने के लिए कुछ सहारा तो हो.
2. शादी से पहले लड़की से पूछा जाता है कि क्या तुम्हें फलां साहब के फलां बेटे के साथ ये निकाह क़बूल है? अब ये लड़की पर डिपेंड करता है कि वो हां कहे या न? लेकिन कितना फॉलो होते है शरिया का ये नियम?
दोनों नियम की धज्जियां उड़ाईं जाती हैं. चार शादी, ट्रिपल तलाक की रक्षा शरिया लॉ का हवाला देकर करने वाले लोगों की ज़बानों को उस वक़्त लकवा मार जाता है जब औरतें के इस शरिया लॉ की बात की जाती है. दहेज में हर चीज़ की मांग करने वाले लोग मेहर की रक़म को इतना कम से कम रखते हैं कि लड़की एक साल भी उस रक़म से अपना गुज़ारा नहीं कर सकती.
शादियों में दहेज ऐसे सजा दिया जाता जाता है जैसे कोई शोरूम हो. और लड़के वाले ट्रक में भरकर ले जाते हैं.
मुस्लिम शादियों में दहेज ऐसे सजा दिया जाता है, जैसे कोई शोरूम हो और लड़के वाले दहेज ट्रक में भर ले जाते हैं.

चलिए मैं दूल्हा पक्ष के इस फालतू तर्क को मान लेता हूं, जिसमें वो कहते हैं कि 'हमें दहेज नहीं चाहिए. वैसे फ्रिज, वॉशिंग मशीन, ये चीज़ और वो चीज़ देना तो आम बात है.' या फिर उस तर्क को भी मान लेता हूं कि 'हमने तो बहुत मना किया था, लड़की वाले नहीं माने. अपने मान सम्मान के लिए उन्होंने दहेज दिया है.' आपके पास बहुत से तर्क हो सकते हैं दहेज लेने के. तो क्यों न लड़की वाले मेहर की रक़म को दहेज की कीमत से गुना-भाग कर दें. जितनी रक़म का दहेज लिया है उसका चार गुना मेहर की रक़म तय की जाए. फिर देखिए कैसे दहेज लेने में हिचकिचाएंगे ये दहेज के लुटेरे. लड़की को छोड़ने से पहले दस बार सोचेंगे.

ये ही हाल 'क़बूल है' का है

मैं 26 साल का हो गया हूं, लेकिन अपनी जिंदगी में मुझे अपने आसपास ऐसा कोई मामला नहीं दिखा, जिसमें लड़की ने कहा हो नहीं मुझे ये निकाह क़बूल नहीं है. जबकि ये कई बार देखा है कि लड़की की मर्ज़ी नहीं होती है. घर वालों ने शादी फिक्स कर दी. लड़की मना करती रही, नहीं करूंगी उससे शादी. ऐसा बोलने पर लड़की को डराया गया, धमकाया गया.
जब शादी का दिन आया तो परिवार की इज़्ज़त के हवाले दिए गए. तथाकथित 'इज़्ज़त' को लड़की की हां से जोड़ दिया गया. नहीं सोचा गया कि शरीयत का उल्लंघन हो रहा है. उस शरीयत का जिसके मुताबिक वो निकाह कराना चाहते हैं. क़ाज़ी आए. हाथ में निकाह के कागज़ात थामे. पूछा, 'फलां साहब की दुख्तर क्या तुम्हें ये निकाह क़बूल है.' लड़की की क्या मजाल जो न कर दे. क्योंकि उसे इतना टॉर्चर कर दिया गया है कि अगर न करेगी तो उसकी जिंदगी को नरक बना दिया जाएगा.
फोटो क्या देखते हो गिरेबान झांको. ये तो Symbolic Image है.
फोटो क्या देखते हो गिरेबान झांको. ये तो Symbolic Image है.

उस लड़की का निकाह हुआ. नतीजा क्या हुआ? शादी चल नहीं पाई. ससुराल पक्ष को बात का पता चला. दूल्हा को पता चला कि वो किसी और से शादी करना चाहती थी. बस फिर क्या? लड़की उनके लिए बदचलन हो गई. तानेकशी होने लगी. नौबत तलाक की. लड़की वापस घर गई.
सवाल है जब अपनी ही मर्ज़ी चलानी है. तो फिर 'क़बूल है' कि ढकोसलेबाज़ी क्यों है. क्यों वो सारा स्यापा किया जाता है. मौलवी आए. लोगों को गवाह बनाया जाए कि लड़की-लड़के ने निकाह के लिए हां कर दी. शादी लड़के और लड़की की होनी थी. मगर उससे पहले क्या हुआ? दोनों के घर वाले आपस में मिलते रहे, मुर्ग मुसल्लम ढकोसते रहे. जिन्हें मिलना चाहिए था उन्हें मिलने तो दूर, देखने भी नहीं दिया गया. बस निकाह के वक़्त 'क़बूल है' वाला गेम खिलवा दिया. जाओ समझते रहो एक दूसरे को. न समझ आए तो झेलते रहो एक दूसरे को.
वैसे 'क़बूल है' के बेसिक में ही गड़बड़ है. क्योंकि लड़की की पसंद का ही लड़का होता तो पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. लड़का पसंद का ही नहीं है. शायद इसलिए ही पूछा जा रहा है, 'क्या निकाह क़बूल है.'
Source: PTI
ट्यूनीशिया में अब तक मुस्लिम औरतों से शादी करने के लिए गैर मुस्लिम मर्द को इस्लाम स्वीकार करना पड़ता था.

क्यों न लड़की को वो आज़ादी दी जाए जो खुद तुम्हारे शरिया ने दी है. 'क़बूल है' वाली आज़ादी. अपना शौहर चुनने की आज़ादी. ट्यूनीशिया का फैसला उसी आज़ादी की तरफ एक बड़ा कदम है. जिसने मुस्लिम औरतों को अपना शौहर चुनने की आज़ादी दी है.


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