The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • uttar pradesh lawyer win 22 year court battle for 20 rupees against indian railways

20 रुपये के लिए अदालत गए थे, 22 साल बाद वापस मिले! इस जीत की टुंगनाथ ने बड़ी कीमत चुकाई

पेशे से वकील टुंगनाथ चतुर्वेदी बताते हैं कि कैसे 22 साल पहले रेलवे टिकट बुक कराते समय उन्हें करप्शन झेलना पड़ा और उसके खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने क्या कीमत चुकाई.

Advertisement
pic
12 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 12 अगस्त 2022, 10:54 PM IST)
Mathura Station and Tungnath Chaturvedi
मथुरा स्टेशन और टुंगनाथ चतुर्वेदी. (फोटो साभार: एएनआई)
Quick AI Highlights
Click here to view more

उत्तर प्रदेश के एक वकील को 22 सालों बाद भारतीय रेल के खिलाफ एक मामले में बड़ी जीत मिली है. साल 1999 में टुंगनाथ चतुर्वेदी (66 वर्ष) ने मथुरा स्टेशन से मुरादाबाद के लिए दो टिकट लिए थे. उस समय एक टिकट की कीमत 35 रुपये थी. इस तरह दो टिकटों की कीमत 70 रुपये हुई. लेकिन जब उन्होंने टिकट बुक करने वाले को 100 रुपये का नोट दिया तो उसने सिर्फ 10 रुपये ही वापस किए. 90 रुपये काट लिए. यानी 20 रुपये ज्यादा.

इस पर टुंगनाथ ने क्लर्क से कहा कि उसने ज्यादा पैसा काट लिए हैं, लेकिन उन्हें कोई रिफंड नहीं मिला. ये बात वकील को बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने इसके खिलाफ कदम उठाने का सोचा. इसके लिए उन्होंने मथुरा के स्थानीय उपभोक्ता अदालत का रुख किया. लेकिन 20 रुपये की अदालती लड़ाई ऐसी खिंची कि 22 गुजर गए. आखिरकार 12 अगस्त, 2022 को टुंगनाथ चतुर्वेदी को इस मामले में जीत मिली है.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक कुल 100 सुनवाई के बाद कोर्ट ने टुंगनाथ चतुर्वेदी के पक्ष में आदेश दिया और रेलवे से कहा कि वे 15 हजार रुपये का जुर्माना भरे. कोर्ट ने साथ ही 12 फीसदी की दर से ब्याज भी जमा करने को कहा है. अगर ये राशि 30 दिनों में नहीं चुकाई जाती है तो इस ब्याज को बढ़ा कर 15 फीसदी कर दिया जाएगा.

वैसे तो ये चतुर्वेदी के लिए एक बड़ी जीत है, हालांकि उन्होंने बीबीसी से कहा, 

'लेकिन इस केस को लड़ने में मेरी जितनी ऊर्जा खर्च हुई है और जितना समय गया है, उसका कोई मोल नहीं है.'

ये मामला अपनेआप में एक बड़ा उदाहरण है कि किस तरह देश के न्यायालयों में लंबित मामलों का भार है, नतीजन आम जनता को न्याय मिलने में देरी हो रही है.

लेकिन यहां टुंगनाथ चतुर्वेदी की जिद और सच उजागर करने के प्रति समर्पण की दाद देनी होगी कि उन्होंने महज 20 रुपये के लिए 22 साल तक लड़ाई लड़ी और अपने अधिकार को प्राप्त किया. यहां पैसा महत्वपूर्ण नहीं है, न्याय के लिए व्यक्ति ने जो जद्दोजहद की है वो महत्वपूर्ण है.

चतुर्वेदी ने बताया कि उन्होंने भारतीय रेल के एक सेक्शन नॉर्थ ईस्ट रेलवे (गोरखपुर) और मथुरा के उपभोक्ता अदालत में केस दायर किया था. उन्होंने कहा कि इस केस में इतनी देरी इसलिए हुई क्योंकि भारत में न्यायपालिका बहुत धीमी गति से काम कर रही है. चतुर्वेदी ने कहा, 

'रेलवे ने भी इस केस को खारिज करने की कोशिश की. उनकी दलील थी कि रेलवे के खिलाफ दायर शिकायत का निवारण रेलवे ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाना चाहिए, न कि किसी उपभोक्ता कोर्ट द्वारा. लेकिन हमने सुप्रीम कोर्ट के साल 2021 के एक आदेश का सहारा लिया और ये साबित किया कि ये मामला उपभोक्ता अदालत में चल सकता है.'

चतुर्वेदी ने कहा कि कई बार इसलिए भी सुनवाई टाल दी जाती थी क्योंकि जज छुट्टी पर रहते थे या शोक अवकाश पर होते थे.

अब कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि वकील को 15 हजार रुपये का जुर्माना दिया जाए और उनके 20 रुपये वापस किए जाएं. साथ ही 1999 से लेकर 2022 तक हर साल 12 फीसदी की दर से 20 रुपये के ब्याज का भी भुगतान किया जाए.

चतुर्वेदी कहते हैं, 

'ये पैसे का मामला था ही नहीं. ये कुल मिलाकर न्याय का मामला था, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का मामला था और जीत हासिल हुई.'

टुंगनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि चूंकि वे खुद भी एक वकील हैं, इसलिए उन्हें वकील को भुगतान नहीं करना पड़ा और न ही उन्हें कोर्ट आने का खर्चा उठाना पड़ा.

वीडियो: इनकम टैक्स भरने वाले नहीं उठा पाएंगे अटल पेंशन योजना का फायदा, इस वजह से हुआ फैसला

Advertisement

Advertisement

()