चीन जाकर ताइवान पर 'सुट' हो गए ट्रंप, ईरान पर जिनपिंग से खेल पाए या नहीं?
व्हाइट हाउस की मानें तो ट्रंप से मीटिंग के दौरान शी जिनपिंग ने अमेरिका से तेल खरीद बढ़ाने में भी दिलचस्पी दिखाई है, ताकि आने वाले समय में वो तेल की ज़रूरतों के लिए हॉर्मुज़ के रास्ते पर अपनी निर्भरता को कम कर सकें. इसका मतलब ये भी निकाला जा रहा है कि चीन शायद ईरान से तेल खरीद कम कर सकता है. अभी चीन, ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है.

क्या चीन जाकर ट्रंप जो हित साधना चाहते थे, वो सध गया है? अब ईरान को रोकने के लिए अमेरिका को चीन जैसे बड़े देश का भी साथ मिलने वाला है? और अगर ये हुआ, तो यकीन मानिए जियो पॉलिटिक्स में बहुत-बहुत बड़ा डेवलपमेंट होगा.
हुआ ये कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पहुंचे हुए हैं चीन. 14 मई को बीजिंग में उनकी मुलाकात हुई चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से. दोनों में ट्रेड, टेक्नोलॉजी, ताइवान से लेकर ईरान जंग जैसे कई मुद्दों पर बात हुई. लेकिन जिस बात ने सबको चौंका दिया, वो था शी जिनपिंग का एक बयान. जिनपिंग ने साफ कहा कि “स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पूरी दुनिया के लिए खुला रहना चाहिए. ईरान को वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से किसी तरह का टोल टैक्स नहीं वसूलना चाहिए.”
व्हाइट हाउस की तरफ से ट्रंप और शी जिनपिंग की बातचीत की एक समरी जारी की गई है. इसके मुताबिक, ट्रंप और शी जिनपिंग इस बात पर भी सहमत दिखे कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए. दोनों नेताओं की बातचीत को लेकर अमेरिका की तरफ से जारी ये बयान अब तक का सबसे डीटेल्ड बयान माना जा रहा है. वहीं चीन की सरकार ने दिनभर में कुछ अपडेट ज़रूर दिए, लेकिन कई अहम मुद्दों पर चुप्पी बनाए रखी.
एक और बड़ी दिलचस्प बात रही. ट्रंप के चीन दौरे के बीच अमेरिकी बयान में ताइवान का कोई ज़िक्र नहीं आया. जबकि चीन बार-बार कहता रहा है कि ताइवान उसके लिए सबसे अहम मुद्दों में से एक है. उधर चीन के सरकारी मीडिया ने अपनी रिपोर्ट में ईरान के परमाणु कार्यक्रम या हॉर्मुज़ स्ट्रेट में टोल वसूली जैसी बातों का भी ज़िक्र नहीं किया. सिर्फ़ इतना कहा गया कि दोनों नेताओं के बीच मिडिल ईस्ट पर चर्चा हुई.
ताइवान का मुद्दा तो इतना सेंसेटिव है कि इस बारे में जब मीडिया ने ट्रंप से पूछा तो अमूमन हर मुद्दे पर तपाक से जवाब देने वाले ट्रंप ने कोई रिएक्शन ही नहीं दिया.
व्हाइट हाउस की मानें तो ट्रंप से मीटिंग के दौरान शी जिनपिंग ने अमेरिका से तेल खरीद बढ़ाने में भी दिलचस्पी दिखाई है, ताकि आने वाले समय में वो तेल की ज़रूरतों के लिए हॉर्मुज़ के रास्ते पर अपनी निर्भरता को कम कर सकें. इसका मतलब ये भी निकाला जा रहा है कि चीन शायद ईरान से तेल खरीद कम कर सकता है. अभी चीन, ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है.
चीन कुल 57 करोड़ टन तेल दूसरे देशों से खरीदता है. इसका लगभग 90 फीसदी हिस्सा समुद्र के रास्ते आता है. चीन का जो तेल समुद्र से आता है उसका लगभग 13-18 फीसदी हिस्सा वो ईरान से खरीदता है. आंकड़ों में देखें तो चीन लगभग 15 लाख बैरल कच्चा तेल रोज़ ईरान से खरीदता है.
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ दुनिया के लिए बेहद अहम समुद्री रास्ता है. दुनिया का लगभग 20 फीसदी तेल इसी रास्ते से गुज़रता है. युद्ध शुरू होने के बाद से ये रास्ता लगभग बंद जैसा हो गया है. पहले ईरान से इसे ब्लॉक किया और फिर अमेरिका ने भी यहां नेवल ब्लॉकेड लगा दिया. इसका सबसे ज़्यादा असर दुनिया में तेल और गैस के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पर पड़ा है. इसी हफ्ते ट्रंप ने फिर धमकी दी थी कि अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएं मानने को तैयार नहीं हुआ, तो अमेरिका दोबारा उस पर सैन्य हमला कर सकता है.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अप्रैल में चीन के विदेश मंत्री वांग यी और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बीच फोन पर भी इस मुद्दे पर बात हुई थी. स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने Reuters से कहा कि दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई थी कि किसी भी देश या संगठन को हॉर्मुज़ जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों से गुज़रने के बदले जहाज़ों से पैसे वसूलने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए.
असल में, ईरान ने युद्ध खत्म करने की एक शर्त ये रखी है कि उसे हॉर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाज़ों से टोल वसूलने का अधिकार दिया जाए. इसके जवाब में पहले तो ट्रंप ने ये संभावना भी जताई थी कि अमेरिका खुद जहाज़ों से शुल्क वसूल सकता है या फिर ईरान के साथ मिलकर टोल सिस्टम चला सकता है. लेकिन जब इसकी आलोचना हुई, तो व्हाइट हाउस ने बाद में सफाई दी. कहा कि ट्रंप चाहते हैं कि हॉर्मुज़ स्ट्रेट बिना किसी रोक-टोक के पूरी तरह खुला रहे.
चीन ने अब तक सीधे तौर पर टोल टैक्स के मुद्दे पर ज्यादा बयान नहीं दिए हैं. चीन के ईरान से अच्छे संबंध हैं और वो अभी भी ईरानी तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है. वहीं ट्रंप लगातार चीन पर दबाव डाल रहे हैं कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके ईरान को अमेरिका के साथ समझौता करने के लिए तैयार करे.
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