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अमेरिका-इजरायल की दोस्ती टूटेगी? ईरान डील ने नेतन्याहू को बुरा फंसाया

US-Iran peace deal: एक तरफ डॉनल्ड ट्रंप ईरान के साथ पीस डील कर चुके हैं और भविष्य की बात कर रहे हैं. दूसरी तरह बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि ये डील इजरायल के हित में नहीं है. नेतन्याहू डील से खुश क्यों नहीं हैं, इसकी पांच बड़ी वजहें हैं.

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शेख नावेद
| शुभम कुमार
17 जून 2026 (पब्लिश्ड: 10:35 AM IST)
netanyahu on us iran peace deal
अमेरिका-ईरान पीस डील से नेतन्याहू खुश नहीं हैं. (फोटो-इंडिया टुडे)
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ईरान और अमेरिका के बीच का शांति समझौता अब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए गले की फांस बनता जा रहा है. ईरान के साथ पीस डील से वे खुश नहीं हैं. इससे अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद भी बढ़ता जा रहा है. लेकिन नेतन्याहू किस बात से नाराज़ हैं? क्या वो पीस डील को ना-मंज़ूर करते हुए ट्रंप से भिड़ सकते हैं? इन सब सवालों के जवाब हम पांच पॉइंटर्स में समझेंगे. 

सीज़फायर के बावजूद मिलिट्री एक्शन

पहला कारण है, सीज़फायर हो जाने के बावजूद भी इजरायल का मिलिट्री एक्शन. ट्रंप चाहते हैं कि पश्चिम एशिया के सभी पक्ष हिंसा कम करें. लेकिन इसके बावजूद इजरायल ने लेबनान में ईरान-सपोर्टेड हिज्बुल्लाह के खिलाफ अपने हमले जारी रखे हैं. और ये हमले केवल हिज्बुल्लाह को नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि इनकी ज़द में दक्षिण लेबनान के आम लोग भी आते हैं. जिसकी वजह से फ्रांस जैसे देश नाराज़गी जताते हैं.

ईरान भी लेबनान में होने वाले इन इजरायली हमलों के सख्त खिलाफ़ है. ऐसे में पीस डील होने के लिए, इन सैन्य कार्रवाईयों को रोका जाना एक ज़रूरी शर्त बन गया, जिसपर अमेरिका सहमत होता दिख रहा है. 

नेतन्याहू का दावा: इजरायल की जीत

दूसरी वजह नेतन्याहू के दावे से जुड़ी है. नेतन्याहू का दावा है कि इस ऑपरेशन में इजरायल ने बड़ी कामयाबी हासिल की है. यरुशलम में प्रेस ब्रीफिंग के दौरान नेतन्याहू ने कहा कि ईरान के खिलाफ शुरू किया गया ऑपरेशन इजरायल के इतिहास के सबसे अहम मिलिट्री ऑपरेशन में से एक था. उन्होंने कहा—

‘हमने उनके न्यूक्लियर साइंटिस्ट्स को खत्म कर दिया है. ईरान के नेताओं को खत्म कर दिया. परमाणु ठिकानों को तबाह कर दिया. मिसाइलों को डिस्ट्रॉय किया और मिसाइल बनाने वाली ज्यादातर फैक्ट्रियों को भी खत्म कर दिया. हमने इजरायल को पूरी तरह मिट जाने से बचा लिया.’

ऐसे में अगर इजरायल को लगता है कि उसे बढ़त मिली है, तो वह जल्दबाज़ी में इस समझौते के पक्ष में दिखना भी नहीं चाहता.

इजरायल की इंटरनल पॉलिटिक्स

यही है तीसरा कारण. इजरायल में अक्टूबर 2026 तक जनरल इलेक्शन होने हैं. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक़, नेतन्याहू के सामने ऑप्शन काफ़ी कम होते जा रहे हैं. इसके अलावा उन पर करप्शन केस भी चल ही रहा है. ऐसे में किसी भी बड़े फ़ैसले का असर उनकी राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है. चौथा कारण भी इसी तरह की राजनीति से जुड़ा है.

विपक्ष का दबाव

इजरायल के विपक्षी नेता यायर लापिद ने संसद यानी नेसेट में कहा कि नेतन्याहू के सामने दो ही रास्ते हैं. या तो वो अमेरिका जैसे इजरायल के सबसे बड़े सहयोगी के साथ सीधा और नुकसान पहुंचाने वाला टकराव कर लें. या फिर इजरायल के हितों के सामने वो झुक जाएं. इसका सीधा मतलब है कि नेतन्याहू के ऊपर इजरायल की विपक्षी पार्टियों का भी खासा दबाव है. मगर ये चुनौती उन्हें सिर्फ़ विपक्ष से ही नहीं मिल रही. बल्कि उनकी सहयोगी पार्टी भी इसी स्थिति पर खड़ी हैं.

ये भी पढ़ें: US-ईरान डील के फाइनल ड्राफ्ट में क्या है? 60 दिन में जंग रुकवा देगा

गठबंधन सरकार के अंदर असहमति

इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू की अपनी गठबंधन सरकार के अंदर भी खासी असहमति है. नेतन्याहू की पार्टी ‘लिकुड’ और सरकार में शामिल राइट विंग नेताओं ने भी सीजफायर और पीस डील की शर्तों को लेकर नाराज़गी जताई है. ईरान की तरफ़ से कहा गया है कि सीजफायर का मतलब हरेक मोर्चे पर मिलिट्री एक्शन को ‘रोकना’ होना चाहिए, जिसमें लेबनान भी शामिल है. लेकिन इज़रायल के National Security Minister ‘इतामार बेन-गवीर’ ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर साफ़ लिखा—

“ट्रंप का समझौता हम पर लागू नहीं होता. हम इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं और यह हमारी सुरक्षा की गारंटी भी नहीं देता.”

इससे एक बात साफ हो गई है. अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर और एग्रीमेंट की कोशिशों ने वॉशिंगटन और तेल-अवीव के बीच ‘सोच’ के अंतर को सामने ला दिया है. एक तरफ़ ट्रंप कह रहे हैं कि वो इलाक़े में तनाव कम करना चाहते हैं. तो दूसरी तरफ नेतन्याहू का कहना है कि ईरान और उसके साथी-संगठनों के खिलाफ इजरायल की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है.

वीडियो: दुनियादारी: अमेरिका-ईरान के बीच डील, इजरायल मुंह फुलाए बैठा?

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