एक और गणतंत्र दिवस धूम-धाम के साथ बीत चुका है. दावे हैं कि देश के मुद्दे बदल रहेहैं. देश बदल रहा है. लेकिन जिस तरह की घटनाएं आसपास घट रही हैं, लगता नहीं कि कुछबदल रहा है. बदलने की चाह रखना भी बदलाव ही है लेकिन ये चाह भी नदारद दिखती है.जाति इस समाज में नासूर बन चुकी है. इस पर चाहे जितना चिल्लाओ. चाहे जितना लिखो.चाहे जितना पढ़ो, पढ़ाओ. इसका इलाज नहीं हो पा रहा है. राजनीतिक समीकरणों से लेकरसामाजिक नियमों तक, सब जाति पर आकर ख़त्म हो जाते हैं.एक मामला मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में सामने आया है. यहां 'ऊंची' जाति के छात्रों नेदलितों के घर में बना हुआ मिड डे मील खाने से मना कर दिया है.यहां खाना बनाने वाली एक दलित महिला है. इस महिला के बच्चे ने कहा, ''केवल 12 बच्चेखाना खाते हैं. बाकी बोलते हैं, हमें खाना नहीं खाना क्योंकि तुम हमारी बिरादरी केनहीं हो.''इस बारे में हेड मास्टर से पूछा गया तो बोले, ''खाना स्कूल के किचन में बनना चाहिए.किसी के घर में नहीं. क्योंकि खाना किसी के घर में बना है, इसलिए बच्चे इसे खानेमें हिचकिचा रहे हैं.''हेड मास्टर का तर्क समझ से बाहर है. खाना घर में बने या स्कूल में इससे क्या फर्कपड़ता है. जो असली 'फर्क' है वो हेड मास्टर साहब अपने मुंह से बोल नहीं रहे.मिड डे मील से जुड़ी इस तरह की खबरें पहले भी आईं हैं. कोई किसी महिला के दलित होनेकी वजह से खाना नहीं खाता तो कोई उसके विधवा होने से. बिहार के गोपालगंज में एकडीएम तो इसीलिए चर्चा में आए थे, क्योंकि इस मिथ को तोड़ने के लिए उन्होंने एक विधवाके हाथ का मिड डे मील खाया था. इसकी सोशल मीडिया पर तारीफ भी हुई. लेकिन तारीफसिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित रह जाती है.गोपालगंज में डीएम राहुल कुमारमध्य प्रदेश में बच्चे इस तरह मिड डे मील खाने से मना कर रहे हैं. इसके पीछे बच्चेनहीं उनकी 'सोशल कंडीशनिंग' जिम्मेदार है. ऐसी कंडीशनिंग जो बचपन से दिमाग में भरीजाती है कि नहीं तुम औरों से अलग हो. यही कंडीशनिंग आगे चलकर नफरत में बदल जाती हैफिर चाहे किसी जाति के लिए हो या धर्म के लिए. और फिर संजय लीला भंसाली के साथ हुईघटना सामने आती है.दो दिन पहले संजय लीला भंसाली के साथ इतिहास का रोना रोकर जातीय दंभ के चलते हीमारपीट की गई. कोर्ट कचहरी की कोई जरूरत अब बची नहीं. तर्कों की भी नहीं. सब उबलेपड़े हैं. जैसे अभी अपनी-अपनी फेसबुक वॉल से निकलकर भाला घोंप देंगे. कोई किसी सेपीछे नहीं रहना चाहता. मारो-मारो का शोर हर तरफ है. ऐसे में जो मर रहे हैं उनकीआवाजें सुनाई नहीं दे रही हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी निशांत ने की है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें-फिल्मकार को पीटकर कौन सा इतिहास बना रहे हैं इतिहासप्रेमी?किस सेना ने की है भंसाली की पिटाई, जिसके बारे में हमने पहले ही बताया थाजब अंधविश्वास के नाम पर 25 हजार दलित, ब्राह्मणों की जूठी पत्तलों पर लोटे