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निकोलस मादुरो से पहले दुनिया के ये नेता भी अमेरिकी 'पुलिसमैनी' का शिकार हुए

ये वो लोग हैं जो अमेरिकी पुलिसमैनी का शिकार बने. ये अलग बात है कि जिन देशों के ये प्रमुख रहे, उनका अमेरिका महाद्वीप से भी कोई लेना-देना नहीं था, जिसकी ‘पुलिस रखवाली’ का स्वयंभू जिम्मेदार अमेरिका अपने आपको समझता था.

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US attacked leaders
अमेरिका ने कई देशों के नेताओं को टारगेट किया है (india today)
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राघवेंद्र शुक्ला
5 जनवरी 2026 (Published: 11:05 PM IST)
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अमेरिका के एक राष्ट्रपति थे थियोडोर रूजवेल्ट. वो कहते थे कि पश्चिमी गोलार्ध यानी अमेरिका महाद्वीप में व्यापक अशांति (chronic unrest) या गलत कामों (wrongdoing) को खत्म करने के लिए अमेरिका को अपने अंतरराष्ट्रीय पुलिस पावर का इस्तेमाल करना ही होगा. रूजवेल्ट का ये ‘पुलिस पावर’ ताजा-ताजा आजाद हुए लैटिन अमेरिकी देशों के लिए था लेकिन उनके बाद के राष्ट्रपतियों ने इसे पूरी दुनिया के लिए मानकर काम करना शुरू कर दिया था. अभी जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से उठाया गया तो दुनिया को सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी तक याद आने लगे. 

ये वो लोग हैं जो अमेरिकी पुलिसमैनी का शिकार बने. ये अलग बात है कि जिन देशों के ये प्रमुख रहे, उनका अमेरिका महाद्वीप से भी कोई लेना-देना नहीं था, जिसकी ‘पुलिस रखवाली’ का स्वयंभू जिम्मेदार अमेरिका अपने आपको समझता था. सद्दाम इराक के राष्ट्रपति थे और गद्दाफी लीबिया के तानाशाह.

सद्दाम हुसैन

इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को 13 दिसंबर 2003 को अमेरिकी सेना ने पकड़ लिया था. इसके 9 महीने पहले अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हमले हुए थे. अमेरिका का कहना था कि इराक के पास विनाशकारी हथियार (WMD) हैं और इसी आधार पर उसने इस मध्य-एशियाई देश पर चढ़ाई कर दी. सद्दाम कई सालों तक अमेरिका के सहयोगी थे. लेकिन बाद में अमेरिका ने बिना किसी सबूत के दावा किया कि सद्दाम अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को सपोर्ट करते हैं. 

सद्दाम को उसके गृहनगर तिकरित के पास एक जमीन के गड्ढे में छिपे हुए पकड़ा गया. गिरफ्तारी के बाद अमेरिकी सेना उन्हें अमेरिका लेकर नहीं गई. उन पर इराक की अदालत में ही मुकदमा चलाया गया और मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. इसके बाद 30 दिसंबर 2006 को सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी गई.

कर्नल गद्दाफी

फरवरी 2011 में लीबिया अपने तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ आंदोलनों की गर्मी से उबल रहा था. गद्दाफी की सरकार प्रदर्शनकारियों को दमन कर रही थी. गद्दाफी ने अपने खिलाफ हथियार उठाने वाले लोगों को मरवाना शुरू किया. हजारों लोगों को प्रदर्शनकारियों और विपक्ष का समर्थन करने के शक में गिरफ्तार किया गया. कई लोग गुप्ता हिरासत में रहे और कई लोगों को तो बिना सुनवाई के मार दिया गया. ऐसे हालात में NATO के जरिए अमेरिकी सेना ने भी इस जंग में हिस्सा लिया. सरकारी सैनिकों पर कई बम गिराये गए. महीनों तक भागने के बाद कर्नल गद्दाफी प्रदर्शनकारियों को हत्थे चढ़ गए. वो एक सीवर के जरिए भागने की कोशिश कर रहे थे. विद्रोहियों ने क्रूरता से उनकी हत्या कर दी. गद्दाफी की खून से सनी लाश की तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखीं.

हुआन ओरलैंडो हर्नान्डेज

इन दोनों के अलावा, सेंट्रल अमेरिका के देश होंडुरास के पूर्व राष्ट्रपति हुआन ओरलैंडो हर्नान्डेज पर तो अमेरिका ने बाकायदा प्रत्यर्पित करवाया था. फरवरी 2022 में हर्नान्डेज होंडुरास के राष्ट्रपति का पद छोड़ चुके थे. इसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी एजेंटों और होंडुरास के सुरक्षाबलों ने उन्हें उनके घर से गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद अप्रैल 2022 में उन्हें भ्रष्टाचार और ड्रग्स तस्करी के आरोपों में अमेरिका प्रत्यर्पित किया गया. इसी साल जून में उन्हें 45 साल की जेल की सजा सुनाई गई लेकिन लेकिन 1 दिसंबर 2025 को अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उन्हें माफ कर दिया. इसके बाद वह अमेरिकी जेल से रिहा होकर बाहर आए.

मैनुअल नोरिएगा

मादुरो की गिरफ्तारी के बाद दुनिया ने अमेरिकी 'पुलिसगिरी' के सबसे ताजा शिकार जिस नेता को याद किया वो पनामा के मैनुअल नोरिएगा थे. सद्दाम हुसैन की तरह पहले तो वह भी अमेरिका के दोस्त रहे और पनामा में अमेरिका के सबसे विश्वस्त सिपहसालार माने गए लेकिन बाद में उनकी अमेरिका से दुश्मनी हो गई. अमेरिका को लगा कि नोरिएगा दगाबाजी कर रहे हैं और अपनी खुफिया सेवाएं और देशों को भी दे रहे हैं. इस मसले में अमेरिका ने लैटिन अमेरिका में सीधा दखल दिया और 1989 में पनामा पर चढ़ाई कर दी. नोरिएगा को गिरफ्तार कर लिया गया और अमेरिका लाया गया. रोचक बात ये है कि तारीख भी वही थी जो मादुरो की गिरफ्तारी की थी. यानी 3 जनवरी. आरोप भी वही थे- ड्रग तस्करी का.

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