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4 और फिल्में जिनसे सेंसर बोर्ड सभी दर्शकों की 'रक्षा' कर रहा है

उड़ता पंजाब बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद उड़ने जा रही है सिनेमाघरों के परदों पर. लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलता है. इन चार फिल्मों की कुंडली देख लें.

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गजेंद्र
14 जून 2016 (अपडेटेड: 14 जून 2016, 02:59 PM IST)
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पहली बात, पहलाज निहलानी अच्छे आदमी हैं. वो बस अपना काम कर रहे हैं. उनका काम है individualistic होना, जो हम सभी हैं (हालांकि उन्हें लगता है कि वे व्यक्तिपरक नहीं हैं, society के पवित्र यज्ञकुंड की रक्षा आसमान में उड़ते पिशाचों के अशुद्ध फिल्मी विचारों, शब्दों और दृश्यों से कर रहे हैं) अपनी तमाम कमजोरियों के साथ. कमजोरियां जो वस्तुपरकता के एक छोर पर कमजोरियां हैं और एक छोर पर खूबियां. वे भी राजनीतिक प्राणी हैं, हम सभी भी. अभिषेक चौबे भी. अनुराग कश्यप भी. अशोक पंडित भी. महेश भट्‌ट भी, यहां तक कि आलिया भट्‌ट भी. हम भी समाज को एक तरीके से मोड़ते चल रहे हैं, पहलाज भी. तो पहलाज अच्छे आदमी हैं.
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उड़ता पंजाब तो फिल्म से जुड़े बाहुबलियों ने अपनी तीव्र बुद्धि और ताकत से आजाद करवा ली, उड़वा ली. बहुत सी ऐसी फिल्में हैं जो श्याम बेनेगल समिति के सुधारों के लागू होने तक रोकी जाती रहेंगी. हम बात करेंगे 4 के बारे में जिनके बारे में आप आने वाले समय में सुनते रहेंगे. 1. हरामखोर:
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इसे निर्देशक श्लोक शर्मा ने 2013 में ही बना लिया था. फिर विदेशी फिल्म महोत्सवों में गई. 2015 में रिलीज की तैयारियां होने लगीं. पहला लुक जाहिर किया गया. इसकी चार फोटो अब तक आई हैं. इनमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी और श्वेता त्रिपाठी (जो 'मसान' में दिखी थीं, लेकिन 'हरामखोर' उनकी पहली फीचर थी) अपने पात्रों में दिख रहे हैं. गुजरात के एक गांव के स्कूल टीचर बने हैं नवाज. श्वेता उनकी छात्रा. दोनों में प्रेम हो जाता है. चंचल संदर्भों में नाम हरामखोर रखा गया है. ज्ञात हुआ है कि पिछले हफ्ते सेंसर बोर्ड की परीक्षण समिति ने इसे देखा और प्रदर्शन अनुमति देने से मना कर दिया. फिल्म की निर्माण कंपनियों में एक सिख्या एंटरटेनमेंट की गुनीत मोंगा ने बयान दिया है कि फिल्म की थीम को आपत्तिजनक बताया गया है. कथित तौर पर इसमें बच्चे भद्दे इशारे करते हैं और शिक्षकों का चित्रण आदर्श नहीं है. अब निर्माताओं के पास विकल्प है कि वे बोर्ड की संशोधन समिति के पास फिल्म को ले जाएं या अपील ट्रिब्यूनल के पास. उनका इरादा सीधा ट्रिब्यूनल के पास जाने का है. क्योंकि संशोधन समिति में तो ऐसे उदाहरण रहे हैं कि खुद पहलाज अध्यक्षता करने लगते हैं जो सही नहीं है. ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाई कोर्ट का सेवानिवृत जज करता है तो न्यायपूर्ण रहता है. ट्रिब्यूनल के फैसले पर नजर रहेगी. 2. डांस फॉर डेमोक्रेसी/बैटल ऑफ बनारस: https://www.youtube.com/watch?v=oXu3XcTwkDM ओम-दर-ब-दर (1988) जैसी कल्ट फिल्म के निर्देशक कमल स्वरूप ने ये बहुत उत्साहजनक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई जो भारतीय चुनावों और भारतीय डॉक्यूमेंट्री मेकिंग विधा का अनूठा दस्तावेजीकरण है. इसे अप्रैल 2014 में शूट किया गया जब वाराणसी में लोकसभा चुनाव हो रहे थे. इसमें अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी के बीच मुकाबला बड़ा रोचक साबित हुआ था. 44 दिन में 4K के सघन फॉर्मेट पर इसे फिल्माया गया. इस तकनीक में फिल्माई गई ये पहली डॉक्यूमेंट्री मानी जा रही है. टीज़र में म्यूजिक की प्रभावोत्पादकता देखी जा सकती है. फिल्म अगस्त 2015 में पूरी हो चुकी थी लेकिन सेंसर ने रोक ली. परीक्षण और संशोधन दोनों समितियों ने फिल्म को सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया. कमल ने तब कहा था कि वे पहलाज से मिले और कहा कि अगर कट लगाकर भी सर्टिफिकेट देते हों तो वे कट लगा लेंगे. कथित तौर पर पहलाज ने कहा कि इस तरह की फिल्म को तो कट लगाकर भी पास नहीं कर सकते. वैसे माना ये जा रहा है कि चुनावों में चूंकि राजनेता हर तरह की भाषा यूज़ करते हैं. मोदी-केजरीवाल हों या दर्जनों निर्दलीय. पहलाज नहीं चाहते कि उनके प्रिय मोदी की कैंपेनिंग के दौरान की छवि और आज प्रधानमंत्री के तौर पर छवि में कोई विरोधाभास दिखे. इसके अलावा इस फिल्म में भी कोई नग्नता या निर्देशक द्वारा डाली गई गालियां नहीं हैं. कमल ये भी कह चुके हैं कि डॉक्यूमेंट्री का प्रस्तुतिकरण बहुत ही सीधा है. कहीं कुछ बढ़ाया-घटाया नहीं गया है. अभी केरल में इंटरनेशनल डॉक्यूमेंट्री एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने कमल स्वरूप गए हुए हैं. उन्होंने फोन पर बताया कि 'डांस फॉर डेमोक्रेसी' को उन्होंने सेंसर बोर्ड की दोनों समितियों और अपील ट्रिब्यूनल के समक्ष रखा लेकिन तीनों जगह रोक लिया गया. अब हाई कोर्ट में अर्जी दायर की गई है. कोर्ट की डेट का इंतजार है. बाकी लड़ाई यहीं लड़ी जानी है. 3. ट्रिपल एक्स:
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X.X.X. इसलिए चर्चा में थी क्योंकि सत्या-2 के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद जो राम गोपाल वर्मा हैदराबाद डेरा लेकर चले गए थे, वे एकता कपूर के बैनर की इस फिल्म से लौटने वाले थे. विषय भी कामुकता और यौन क्रीड़ाओं से सीधा जुड़ा था. जिसमें रामू की बड़ी दिलचस्पी रहती है. लगा था इसे बॉलीवुड की सीमाओं में रहते हुए शर्म की देहरी लांघे बगैर बनाया जाएगा लेकिन जब नए निर्देशक के तौर पर केन घोष लाए गए और बाद में पहला पोस्टर आया तो माथा ठनका. इसमें तीन जोड़ों की आकृतियां, यौन क्रियाओं में लिप्त दिख रही थीं. बाद में इस फिल्म को लेकर एकता कपूर ने न्यूडिटी क्लॉज पर भी साइन करवाया जिसके तहत संबंधित एक्टर को कहे मुताबिक कपड़े उतारने होंगे. ये फिल्म 2015 की दूसरी छमाही में प्रदर्शित होनी प्रस्तावित थी. लेकिन अब तो फिल्म भूत हो गई है. इसका कोई अता-पता नहीं है. हालांकि इन्हीं एकता कपूर की फिल्म क्या कूल हैं हम-3 को इन्हीं पहलाज निहलानी के बोर्ड ने पास कर दिया था और फिल्म जनवरी में लगी. जबकि आपत्ति के मामले में उड़ता पंजाब और एंग्री इंडियन गॉडेसेज़ जैसी फिल्में क्या कूल हैं हम-3 के erected पोस्टर के चरण की धूल भी नहीं है. लेकिन फिर भी सेंसर बोर्ड की ताजा संवेदनशीलता को देखते हुए तय है कि ट्रिपल एक्स को समितियों के आगे चक्कर लगाने पड़ेंगे क्योंकि बोर्ड दर्शकों की 'रक्षा' को कटिबद्ध है. 4. मोहल्ला अस्सी:
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पांच साल हो गए इस कृति को शनि की साढ़े-साती लगे. काशीनाथ सिंह के मशहूर उपन्यास काशी का अस्सी पर आधारित मोहल्ला अस्सी का निर्देशन चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने किया है. प्रोड्यूसर और पोस्ट-प्रोडक्शन के स्तर पर लंबे समय अटकी रही ये फिल्म अब तैयार है लेकिन अब सेंसर तैयार नहीं. दरअसल पिछले साल फिल्म का ट्रेलर भी लीक हो गया था जिसमें गालियां वगैरह हैं. सनी देओल और साक्षी तंवर और शिवजी का रूप धरा एक पात्र गालियां बोलते हैं जो वैसे आम बोली जाती हैं. फिल्म वैश्वीकरण, पूंजीवाद और धर्म जैसे तमाम विषयों पर आलोचनात्मक टिप्पणी है. बताया जाता है कि इस विषय-वस्तु के कारण फिल्म रुकी है. जबकि बड़ा कारण ये है कि पहलाज निहलानी की चंद्रप्रकाश द्विवेदी से नहीं बनती. और इसके आगे ये तथ्य मायने नहीं रखता कि खुद द्विवेदी सेंसर बोर्ड के मौजूदा सदस्य हैं. अभी तक इस फिल्म का ट्रेलर भी पास नहीं हुआ है. परीक्षण समिति ने इसे सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया है. रिवाइजिंग कमिटी के स्तर पर अब ये अटकी है. निर्माता विनय तिवारी कह चुके हैं कि अगर अतार्किक कट सुझाए गए तो वे अपील ट्रिब्यूनल के पास जाएंगे या उसके बाद हाई कोर्ट.

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