क्या है ट्रिपल तलाक बिल, जिसे लोकसभा ने पास कर दिया है?
कांग्रेस, डीएमके, टीडीपी और एआईएमआईम ने इसका विरोध किया था.
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लोकसभा ने तीन तलाक बिल पास कर दिया है.
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27 दिसंबर, 2018. शीतकालीन सत्र का 10वां दिन. मतलब इस सरकार का आख़िरी पूर्णकालिक सत्र. तय था कि बात होगी ट्रिपल तलाक बिल की. क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पहले ही इसे पारित कराना चाह रहे थे. लेकिन विपक्ष की इतनी आपत्तियां थीं कि कुछ न हो सका. इसलिए तय हुआ कि 27 दिसंबर, 2018 को इसपर चर्चा होगी. लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे भी इस बात के लिए राजी थे कि 27 दिसंबर की चर्चा में वो शामिल होंगे. हालांकि मीडिया में वो पहले से ही कहते जा रहे थे कि "बिल पर चर्चा करने" और "बिल को पारित कराने" में अंतर होता है. साथ ही कांग्रेस वो बात भी दोहराती जा रही थी कि तलाक़ देने पर सजा जब किसी धर्म में नहीं दी जाती, तो ट्रिपल तलाक़ बिल में सजा क्यों दी जा रही है?
बीजेपी के लिए था नाक का सवाल

ट्रिपल तलाक बिल पीएम मोदी के साथ ही पूरी बीजेपी के लिए नाक का सवाल था.
ट्रिपल तलाक़ बिल मोदी सरकार का महत्वकांक्षी बिल है. इसे बीजेपी ने नाक का सवाल भी मान रखा है. 27 दिसंबर को जब बहस शुरू हुई तो पार्टियां कोई ढील नहीं छोड़ना चाहती थीं. यही कारण था कि इस चर्चा के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने अपने-अपने सांसदों को व्हिप जारी कर दिया था. व्हिप को आसान भाषा में यूं समझें कि 'न खाता न बही, पार्टी जो कहे वही सही.' व्हिप ज़ारी होता है, तो सांसदों को पार्टी की ओर से तय की गई लाइन पर काम करना होता है.
कहां से शुरू हुआ था मामला?

शायरा बानो, केस में प्रमुख याचिकाकर्ता, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था.
ट्रिपल तलाक़ की बात शुरू हुई थी 2015 से. उत्तराखंड की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक को चैलेंज करता केस दायर किया. सुप्रीम कोर्ट ने शायरा के मामले के साथ 5 महिलाओं के मामले और जोड़ दिए और हियरिंग के लिए 5 जज अपॉइंट कर दिए. पांच जजों की बेंच ने 22 अगस्त 2017 को 3-2 से फैसला सुनाया कि ट्रिपल तलाक की प्रथा असंवैधानिक है. उन्होंने सरकार को छह महीने के अंदर नया कानून बनाने का आदेश दिया. ये भी कहा कि कानून न बनने की सूरत में कोर्ट का आदेश कंटीन्यू रहेगा.
लोकसभा में पास हुआ बिल राज्यसभा में अटक गया

ये बिल पहले भी लोकसभा से पास हो चुका है.
29 दिसंबर 2017 को लोकसभा में ट्रिपल तलाक़ बिल पास भी हो गया. उस समय बिल के खिलाफ सभी संशोधन खारिज हो गए थे. होने भी थे क्योंकि लोकसभा में NDA के सदस्य ज़्यादा हैं. लेकिन राज्यसभा में जाकर ये बिल लटक गया. उस पर खूब हंगामा हुआ. कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां इसमें संशोधन चाहती थीं. वो चाहती थीं कि तीन साल की सज़ा पर पुनर्विचार हो. साथ ही उनका कहना था कि गिरफ्तारी वाला नियम बदले. तलाक़ देने वाले के तुरंत गिरफ्तार हो जाने पर वो अपने परिवार की देखभाल नहीं कर सकता. इन सारे सवालों और अडंगों के बीच राज्यसभा में ये बिल पास नहीं हो सका.
फिर आया अध्यादेश

बिल पास नहीं हो सका, तो केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई थी.
जब राज्यसभा में बात नहीं बनी. तब सरकार ने अध्यादेश लाने का मन बना लिया. एक होता है विधेयक. इंग्लिश में Bill कहते हैं. दूसरा होता है अध्यादेश. इंग्लिश में कहते हैं Ordinance, जो सिर्फ 6 महीने तक लागू रहता है. 6 महीने के पहले उसे बिल की तरह पारित कराने के लिए सदन में लाना होता है. विधेयक यानी बिल भी कानून नहीं होता है, उस पर चर्चा होती है. सुझाव लिए जाते हैं, फिर वो पारित होता है, राष्ट्रपति के पास जाता है. उनकी मुहर लगती है. तब वो क़ानून बनता है. तो 19 सितंबर 2018 को मोदी सरकार की कैबिनेट ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी. देर रात राष्ट्रपति ने भी इस पर साइन कर दिए. उसी के साथ तय हुआ कि शीतकालीन सत्र के ख़त्म होने से पहले सरकार को दोनों सदनों में बिल लाना होगा. उसे क़ानून बनवाना ही होगा, वर्ना अध्यादेश निरस्त हो जाएगा, सिर्फ कोर्ट का आदेश चलेगा .
लोकसभा में पेश करने से पहले हुए तीन बदलाव

ट्रिपल तलाक कानून के लोकसभा से पास होने के बाद महिलाओं ने जश्न मनाया था.
पहला बदलाव : अब महिला का कोई सगा रिश्तेदार ही ट्रिपल तलाक़ दिए जाने पर केस दर्ज करा सकेगा. पहले प्रावधान था कि कोई भी केस दर्ज करा सकता था. पुलिस खुद की संज्ञान ले सकती थी. दूसरा बदलाव : अब मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार होगा. पहले प्रावधान था कि ट्रिपल तलाक़ को गैर जमानती अपराध माना गया था. पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी. तीसरा बदलाव : अब मजिस्ट्रेट के सामने पति-पत्नी के बीच समझौते का विकल्प भी रहेगा. जबकि पहले प्रावधान था कि समझौते का कोई नियम नहीं है.
27 दिसंबर को क्या-क्या हुआ?

ट्रिपल तलाक बिल पर लोकसभा में खूब तर्क-वितर्क हुए.
लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई. राज्यसभा में कावेरी नदी पर बांध का मुद्दा उठा. नारेबाज़ी हुई और कार्यवाही दिन भर के लिए टल गई. लोकसभा में कांग्रेस राफेल डील पर जेपीसी जांच पर अड़ गई. मल्लिकार्जुन खडगे भी अपनी बात से पलट गए. नतीज़ा ये कि कार्यवाही दो बार रुकी और 2 बजे से ट्रिपल तलाक़ पर चर्चा शुरू हुई. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से लेकर, मल्लिकार्जुन खडगे, स्मृति ईरानी, मुख्तार अब्बास नकवी और असदुद्दीन ओवैसी ने पक्ष और विपक्ष में खूब तर्क दिए. इसके बाद इस सबके बाद कांग्रेस, DMK और सपा ने सदन से वाकआउट कर दिया. बचे हुए सांसदों के बीच वोटिंग हुई. बिल के पक्ष में 245 और बिल के खिलाफ 11 वोट पड़े. नतीज़ा ये कि लोकसभा में तीन तलाक बिल पारित हो गया है.
अब आगे क्या?

लोकसभा से पास बिल को राज्यसभा में भेजा जाएगा. वहां से पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा.
अब ये बिल राज्यसभा में जाएगा. संशोधनों और चर्चाओं के बाद सुधार की गुंजाइश हमेशा बाकी रहेगी, लेकिन हमारा मानना है कि किसी भी धर्म या समाज का बनाया कोई भी नियम जो महिलाओं को कमतर आंके, उसे ख़त्म होना चाहिए. पार्टियों की अपनी राजनीति कुछ भी हो, ये उनका सिरदर्द है. लेकिन महिलाओं के हक़ में कोई क़ानून बने. तो आपको उसके साथ खड़े होना चाहिए.
बीजेपी के लिए था नाक का सवाल

ट्रिपल तलाक बिल पीएम मोदी के साथ ही पूरी बीजेपी के लिए नाक का सवाल था.
ट्रिपल तलाक़ बिल मोदी सरकार का महत्वकांक्षी बिल है. इसे बीजेपी ने नाक का सवाल भी मान रखा है. 27 दिसंबर को जब बहस शुरू हुई तो पार्टियां कोई ढील नहीं छोड़ना चाहती थीं. यही कारण था कि इस चर्चा के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने अपने-अपने सांसदों को व्हिप जारी कर दिया था. व्हिप को आसान भाषा में यूं समझें कि 'न खाता न बही, पार्टी जो कहे वही सही.' व्हिप ज़ारी होता है, तो सांसदों को पार्टी की ओर से तय की गई लाइन पर काम करना होता है.
कहां से शुरू हुआ था मामला?

शायरा बानो, केस में प्रमुख याचिकाकर्ता, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था.
ट्रिपल तलाक़ की बात शुरू हुई थी 2015 से. उत्तराखंड की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक को चैलेंज करता केस दायर किया. सुप्रीम कोर्ट ने शायरा के मामले के साथ 5 महिलाओं के मामले और जोड़ दिए और हियरिंग के लिए 5 जज अपॉइंट कर दिए. पांच जजों की बेंच ने 22 अगस्त 2017 को 3-2 से फैसला सुनाया कि ट्रिपल तलाक की प्रथा असंवैधानिक है. उन्होंने सरकार को छह महीने के अंदर नया कानून बनाने का आदेश दिया. ये भी कहा कि कानून न बनने की सूरत में कोर्ट का आदेश कंटीन्यू रहेगा.
लोकसभा में पास हुआ बिल राज्यसभा में अटक गया

ये बिल पहले भी लोकसभा से पास हो चुका है.
29 दिसंबर 2017 को लोकसभा में ट्रिपल तलाक़ बिल पास भी हो गया. उस समय बिल के खिलाफ सभी संशोधन खारिज हो गए थे. होने भी थे क्योंकि लोकसभा में NDA के सदस्य ज़्यादा हैं. लेकिन राज्यसभा में जाकर ये बिल लटक गया. उस पर खूब हंगामा हुआ. कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां इसमें संशोधन चाहती थीं. वो चाहती थीं कि तीन साल की सज़ा पर पुनर्विचार हो. साथ ही उनका कहना था कि गिरफ्तारी वाला नियम बदले. तलाक़ देने वाले के तुरंत गिरफ्तार हो जाने पर वो अपने परिवार की देखभाल नहीं कर सकता. इन सारे सवालों और अडंगों के बीच राज्यसभा में ये बिल पास नहीं हो सका.
फिर आया अध्यादेश

बिल पास नहीं हो सका, तो केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई थी.
जब राज्यसभा में बात नहीं बनी. तब सरकार ने अध्यादेश लाने का मन बना लिया. एक होता है विधेयक. इंग्लिश में Bill कहते हैं. दूसरा होता है अध्यादेश. इंग्लिश में कहते हैं Ordinance, जो सिर्फ 6 महीने तक लागू रहता है. 6 महीने के पहले उसे बिल की तरह पारित कराने के लिए सदन में लाना होता है. विधेयक यानी बिल भी कानून नहीं होता है, उस पर चर्चा होती है. सुझाव लिए जाते हैं, फिर वो पारित होता है, राष्ट्रपति के पास जाता है. उनकी मुहर लगती है. तब वो क़ानून बनता है. तो 19 सितंबर 2018 को मोदी सरकार की कैबिनेट ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी. देर रात राष्ट्रपति ने भी इस पर साइन कर दिए. उसी के साथ तय हुआ कि शीतकालीन सत्र के ख़त्म होने से पहले सरकार को दोनों सदनों में बिल लाना होगा. उसे क़ानून बनवाना ही होगा, वर्ना अध्यादेश निरस्त हो जाएगा, सिर्फ कोर्ट का आदेश चलेगा .
लोकसभा में पेश करने से पहले हुए तीन बदलाव

ट्रिपल तलाक कानून के लोकसभा से पास होने के बाद महिलाओं ने जश्न मनाया था.
पहला बदलाव : अब महिला का कोई सगा रिश्तेदार ही ट्रिपल तलाक़ दिए जाने पर केस दर्ज करा सकेगा. पहले प्रावधान था कि कोई भी केस दर्ज करा सकता था. पुलिस खुद की संज्ञान ले सकती थी. दूसरा बदलाव : अब मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार होगा. पहले प्रावधान था कि ट्रिपल तलाक़ को गैर जमानती अपराध माना गया था. पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी. तीसरा बदलाव : अब मजिस्ट्रेट के सामने पति-पत्नी के बीच समझौते का विकल्प भी रहेगा. जबकि पहले प्रावधान था कि समझौते का कोई नियम नहीं है.
27 दिसंबर को क्या-क्या हुआ?

ट्रिपल तलाक बिल पर लोकसभा में खूब तर्क-वितर्क हुए.
लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई. राज्यसभा में कावेरी नदी पर बांध का मुद्दा उठा. नारेबाज़ी हुई और कार्यवाही दिन भर के लिए टल गई. लोकसभा में कांग्रेस राफेल डील पर जेपीसी जांच पर अड़ गई. मल्लिकार्जुन खडगे भी अपनी बात से पलट गए. नतीज़ा ये कि कार्यवाही दो बार रुकी और 2 बजे से ट्रिपल तलाक़ पर चर्चा शुरू हुई. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से लेकर, मल्लिकार्जुन खडगे, स्मृति ईरानी, मुख्तार अब्बास नकवी और असदुद्दीन ओवैसी ने पक्ष और विपक्ष में खूब तर्क दिए. इसके बाद इस सबके बाद कांग्रेस, DMK और सपा ने सदन से वाकआउट कर दिया. बचे हुए सांसदों के बीच वोटिंग हुई. बिल के पक्ष में 245 और बिल के खिलाफ 11 वोट पड़े. नतीज़ा ये कि लोकसभा में तीन तलाक बिल पारित हो गया है.
अब आगे क्या?

लोकसभा से पास बिल को राज्यसभा में भेजा जाएगा. वहां से पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा.
अब ये बिल राज्यसभा में जाएगा. संशोधनों और चर्चाओं के बाद सुधार की गुंजाइश हमेशा बाकी रहेगी, लेकिन हमारा मानना है कि किसी भी धर्म या समाज का बनाया कोई भी नियम जो महिलाओं को कमतर आंके, उसे ख़त्म होना चाहिए. पार्टियों की अपनी राजनीति कुछ भी हो, ये उनका सिरदर्द है. लेकिन महिलाओं के हक़ में कोई क़ानून बने. तो आपको उसके साथ खड़े होना चाहिए.
