चुनाव का माहौल चारों ओर है. वोट बैंक गिने जा रहे हैं. पर ट्रांसजेंडर इस बैंक मेंकहीं नहीं आते. इनका नाम आते ही प्रत्याशी तो दूर मतदाताओं के चेहरे के भाव बदलजाते हैं. आम बोलचाल में ट्रांसजेंडर को जो शब्द दिया गया है, वो है हिजड़ा. लोगसत्तर कोने का मुंह बना लेते हैं उन्हें देखकर. सीधी निगाह तक से नहीं देखते. उनकेबारे में ख़ास पूर्वाग्रह हैं. इसी वजह से राजनीतिक ताकत और रिप्रेजेंटेशन में इनकीहिस्सेदारी ना के बराबर है. वोटर लिस्ट में 18 साल के ऊपर के नागरिकों को गिना जाताहै. लेकिन ऐसा लगता ही नहीं कि ट्रांसजेंडर भी वोटर हैं. नेताओं की नजर उन पर नहींपड़ती. पड़ती भी है तो कहीं-कहीं नाचने वाले बैंड में दिख जाते हैं. वही उनकीहिस्सेदारी है. पांच राज्यों यूपी, पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में चुनावोंकी तैयारी हो चुकी है. ये राज्य 4 फरवरी से 8 मार्च के बीच चुनावों से घिरे रहेंगे.धूल उड़ने लगी है. नेता भाग-दौड़ मचाना शुरू कर चुके हैं. नेताओं के आपसी झगड़े,चुनावी चालें सुर्ख़ियों में हैं. जाति, धर्म की गोटियां सेट की जा रही हैं. इनआधारों पर उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की जा रही है. इस बार 16 करोड़ वोटर इनचुनावों में हिस्सा लेंगे. पर पंजाब में ट्रांसजेंडरों को लेकर अबकी थोड़ा माहौलबदला है. 2012 में पंजाब चुनावों में महज पांच ट्रांसजेंडरों ने वोट डाले थे. लेकिनइस बार 380 ट्रांसजेंडरों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल किए गए हैं. यानी पिछली बारसे 76 गुना ज्यादा. असल बात ये है कि चुनाव आयोग उन्हें महत्त्व दे रहा है, जिसकीवजह से उन्होंने वोटर लिस्ट में जगह बनाई है. 2011 की जनगणना में बताया गया था किरूरल इंडिया में लगभग 70,000 ट्रांसजेंडर हैं, जिनमें सबसे ज्यादा लगभग 13,000उत्तर प्रदेश में हैं. इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर है जहां 10,000 ट्रांसजेंडरहैं. उत्तर प्रदेश चुनावों के लिहाज से सबसे जटिल है. यहां के चुनाव में भीट्रांसजेंडर बढ़ चढ़कर हिस्सा ले सकते हैं. ऐसा नहीं कि ट्रांसजेंडर सिर्फ वोटर हीरहे हैं. उन्होंने चुनाव भी लड़ा है. गोरखपुर से आशा देवी ने मेयर का चुनाव लड़ा थाऔर जीता भी था. पायल नाम की एक दूसरी ट्रांसजेंडर ने लखनऊ में बीजेपी के लालजी टंडनके खिलाफ चुनाव लड़ा था. वो जीत तो नहीं सकीं लेकिन उन्हें काफी सपोर्ट मिला था.चुनाव के मामलों पर बोलते हुए एक ट्रांसजेंडर सीमा कहती हैं कि कोर्ट के निर्देशोंके बावजूद हम लोगों को इग्नोर किया जाता है. हमें आधार कार्ड, वोटर कार्ड से लेकरपैन और राशन कार्ड तक बनवाने में दिक्कतें होती हैं. ट्रांसजेंडर भी इसी सोसायटी काहिस्सा हैं. उन्हें देश की व्यवस्था में शामिल होने का पूरा हक़ है और फिर तो हमारेदेश में चुनाव त्योहार माने जाते हैं. लगभग हर साल कहीं न कहीं मनाए जाने वाले इनत्योहारों से देश के एक बड़े हिस्से को इग्नोर करना वैसे भी ठीक नहीं हैं. अब वो खुदआगे आ रहे हैं और चुनाव आयोग भी उन्हें वोटर लिस्ट में शामिल कर रहा है. इससे उनमेंभरोसा बढ़ेगा कि वो देश के मेनस्ट्रीम से अलग नहीं हैं. --------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी निशांत ने की है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें- नाइकी के नए ऐड में छा गए अमेरिका के पहले ट्रांसजेंडर ऐथलीट मिलिएपाकिस्तान की पहली ट्रांसजेंडर मॉडल से