भगत सिंह: जितने हिन्दुस्तानी उतने ही पाकिस्तानी
फ़िल्म बन रही है पाकिस्तान में. भगत सिंह पर. उनके घर को मंदिर सा बनाया हुआ है. लोग उन्हें याद करते हैं. हिन्दुस्तानी के रूप में नहीं, मसीहा के रूप में.
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फोटो - thelallantop
भगत सिंह. अंग्रेजों से हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई का मुख्य नाम. वो जिसने कहा कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रुरत होती है. और जाकर उन्हीं की असेम्बली में बम फोड़ दिया. किसी को मारने के मकसद से नहीं, इस मकसद से कि उन्हें मालूम चले कि उनकी चूलें हिलने का समय आ गया है.
भगत सिंह जहां पैदा हुए, वो जगह आज पाकिस्तान में है. भगत सिंह जहां मरे, वो जगह भी पाकिस्तान में है. ऐसे में कुछ पाकिस्तानी फिल्मकारों ने बीड़ा उठाया है पाकिस्तान में भगत सिंह के ओहदे, उनकी जगह के बारे में दुनिया को दिखाने का. हमारे मन में भगत सिंह के सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दुस्तानी होने की भ्रान्ति को दूर करने का.
आज देश में किसी भी काली भेड़ को पाकिस्तान जाने को कहा जाता है. उसके पाकिस्तान से कनेक्शन निकाले जाते हैं. यहां तक कि गुलज़ार के भी निकाले गए थे. भगत सिंह का भी कनेक्शन है पाकिस्तान से. उनकी चिता को आग उसी पाकिस्तान की मिट्टी पर दी गयी थी जहां घड़ी-घड़ी लोगों को चले जाने को कहा जा रहा है.
इस फिल्म के ट्रेलर को देखें. और देखें कैसे वहां भगत सिंह के घर को घर नहीं मंदिर बनाया गया है. एक चेहरा कहता दिखता है कि भगत सिंह बहादुर नहीं, बहुत बहादुर थे. इतना बहादुर कि दुनिया डरती थी.
https://www.youtube.com/watch?v=k0WzMVYtGTM
छोड़ते हैं आपको गुलज़ार की एक नज़्म के साथ. जब गुलज़ार ने एक ख़्वाब देखा था. और उठे अपने होठों पर अपनी मिट्टी पर जामी फसलों के गुड़ के स्वाद के साथ.
सुबह सुबह एक ख्वाब की दस्तक पर दरवाजा खोला, देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये है आँखों से मानुस थे सारे, चेहरे सारे सुने सुनाये पाँव धोये, हाथ धुलाये, आँगन मे आसन लगवाए और तंदूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए पोटली मे मेहमान मेरे, पिछले सालो की फसलों का गुड़ लाये थे आँख खुली तो देखा घर मे कोई नहीं था, हाथ लगा कर देखा तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था और होंठो पर मीठे गुड़ का जयका अब तक चिपक रहा था ख्वाब था शायद, ख्वाब ही होगा सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली सरहद पर कल रात सुना है कुछ ख्वाबों का खून हुआ है सरहद पर कल रात सुना है कुछ ख्वाबों का खून हुआ है.

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