इस कत्ल के जिम्मेदार हम सब हैं
कहां हैं जाति के मसीहा. कोई आवाज क्यों नहीं उठाता.
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प्रदीप की दादी की ये फोटो इंडियन एक्सप्रेस के लिए गजेंद्र यादव ने खींची है.
पहले ये वीडियो देख लीजिए, जो इस वक्त ATM-बैंक की लाइन में लगने से बहुत जरूरी है:
https://www.youtube.com/watch?v=SRxUm1NnxMA
प्यार, इश्क, मोहब्बत. आजादी. ये सारे अल्फाज़ मुझे झूठे लगते हैं. इन लफ़्ज़ों की तह बनाकर अलमारी में संगवा देना चाहिए. इन लफ़्ज़ों के फेर में भोले-भाले लोग अपनी जान गवां बैठते हैं, क्योंकि सच्चाई तो जाति है. वो जाति, जो राजनीति में इस्तेमाल होती है. वो जाति, जो सबको एक चारपाई पर नहीं बैठने देती. वो जाति, जो मोहब्बत करने वालों को मौत के घाट उतार देती है. भाड़ में जाए ये ऊंच-नीच. पुलिस मानती है कि ये काम लड़की के भाई ने किया. उसने शादी के चार साल बाद क्यों मारा? अगर वो ऐसा ही सोचता था, तो क्या उसे चार साल तक इस कत्ल का मौका नहीं मिला? या फिर चार सालों में उसे इस बात के लिए उकसाया गया? किसने उकसाया? उसके दोस्तों, रिश्तेदारों, जान-पहचान वालों ने? यानी उनसे, जिनसे हमारा समाज बनता है?
खरखौदा में ये ट्रिपल मर्डर शुक्रवार की रात में हुए. शुरुआती जांच में पुलिस को अंदाजा नहीं था कि मामला पसंद की शादी से जुड़ा हो सकता है. सुशीला ने घरवालों की मर्जी के बिना प्रदीप से शादी की थी. सुशीला जाट बिरादरी से ताल्लुक रखती थीं, जबकि प्रदीप धानक बिरादरी के थे. दोनों को प्यार हुआ. सब राजी नहीं थे, तो कोर्ट मैरिज कर ली.
इस शादी से सुशीला के घरवाले खुश नहीं थे, लेकिन बीतते वक्त ने मानो जैसे सब कुछ ठीक कर दिया था. सुशीला का बड़ा भाई मोनू अक्सर अपनी बहन से मिलने उनके घर आने लगा. घर के बाहर ही सही, पर सुशीला की मां और बहन भी उनसे मिलने लगी थीं. दोनों को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि मोनू किसी साजिश को अंजाम देने की फिराक में सही वक्त का इंतजार कर रहा है.
प्रदीप
जाति के कीड़े ने मोनू के दिमाग को खा लिया था. शुक्रवार रात मोनू अपनी बुआ के लड़के हरीश के साथ सुशीला के घर पहुंचा. तो तीन लोगों की मौत बनकर. प्रदीप और उनकी फैमिली पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसीं. सुशीला अपने भाइयों के सामने गिड़गिड़ाईं. मगर कुछ हासिल न हुआ. इस फायरिंग में प्रदीप, उनके पिता सुरेश (60 साल) और मां सुनीता (45 साल) की मौत हो गई. और सूरज जख्मी हो गया. ये तबाही का मंजर 80 साल की बूढ़ी दादी धनखौर ने अपनी आंखों से देखा.
प्रदीप की बहन का कहना है कि दरवाजे पर खटखटाहट हुई. प्रदीप ने दरवाजा खोला. और गोली चल पड़ी. उन्हें पांच गोलियां लगीं. सुशीला उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ीं. और उन लोगों के सामने गिड़गिड़ाईं. उन्होंने सुशीला को भी गोली मार दी. प्रदीप की बहन कहती हैं कि मैं बता नहीं सकती, हॉस्पिटल ले जाते वक्त वो दर्द से कितना कराह रही थीं.
सुशीला नौ माह की प्रेग्नेंट थीं. जब गोली लगी तो कोख के दर्द ने तड़पा दिया. खुशियां आने से पहले मातम पसर गया. सुशीला ने हॉस्पिटल में एक बच्ची को जन्म दे दिया. बच्ची तो खतरे से बाहर है, मगर सुशीला की हालत नाजुक है.
इतनी बेरहमी से तीन लोगों को मार डाला गया. वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से जिंदगी जीने का फैसला किया था. सुशीला ने अपनी जाति से अलग उस जाति में शादी की, जिसे समाज में बहुत से लोग 'नीची जाति' समझते हैं. जाति के मसीहा खामोश हैं. कोई बयान नहीं. क्या इनका मरना किसी के लिए अहमियत नहीं रखता?
बिहार में महादलित को रेप करके मार डाला, संसद में मामला उठाइए मायावती जी!
https://www.youtube.com/watch?v=SRxUm1NnxMA
प्यार, इश्क, मोहब्बत. आजादी. ये सारे अल्फाज़ मुझे झूठे लगते हैं. इन लफ़्ज़ों की तह बनाकर अलमारी में संगवा देना चाहिए. इन लफ़्ज़ों के फेर में भोले-भाले लोग अपनी जान गवां बैठते हैं, क्योंकि सच्चाई तो जाति है. वो जाति, जो राजनीति में इस्तेमाल होती है. वो जाति, जो सबको एक चारपाई पर नहीं बैठने देती. वो जाति, जो मोहब्बत करने वालों को मौत के घाट उतार देती है. भाड़ में जाए ये ऊंच-नीच. पुलिस मानती है कि ये काम लड़की के भाई ने किया. उसने शादी के चार साल बाद क्यों मारा? अगर वो ऐसा ही सोचता था, तो क्या उसे चार साल तक इस कत्ल का मौका नहीं मिला? या फिर चार सालों में उसे इस बात के लिए उकसाया गया? किसने उकसाया? उसके दोस्तों, रिश्तेदारों, जान-पहचान वालों ने? यानी उनसे, जिनसे हमारा समाज बनता है?
खरखौदा में ये ट्रिपल मर्डर शुक्रवार की रात में हुए. शुरुआती जांच में पुलिस को अंदाजा नहीं था कि मामला पसंद की शादी से जुड़ा हो सकता है. सुशीला ने घरवालों की मर्जी के बिना प्रदीप से शादी की थी. सुशीला जाट बिरादरी से ताल्लुक रखती थीं, जबकि प्रदीप धानक बिरादरी के थे. दोनों को प्यार हुआ. सब राजी नहीं थे, तो कोर्ट मैरिज कर ली.
इस शादी से सुशीला के घरवाले खुश नहीं थे, लेकिन बीतते वक्त ने मानो जैसे सब कुछ ठीक कर दिया था. सुशीला का बड़ा भाई मोनू अक्सर अपनी बहन से मिलने उनके घर आने लगा. घर के बाहर ही सही, पर सुशीला की मां और बहन भी उनसे मिलने लगी थीं. दोनों को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि मोनू किसी साजिश को अंजाम देने की फिराक में सही वक्त का इंतजार कर रहा है.
प्रदीप
जाति के कीड़े ने मोनू के दिमाग को खा लिया था. शुक्रवार रात मोनू अपनी बुआ के लड़के हरीश के साथ सुशीला के घर पहुंचा. तो तीन लोगों की मौत बनकर. प्रदीप और उनकी फैमिली पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसीं. सुशीला अपने भाइयों के सामने गिड़गिड़ाईं. मगर कुछ हासिल न हुआ. इस फायरिंग में प्रदीप, उनके पिता सुरेश (60 साल) और मां सुनीता (45 साल) की मौत हो गई. और सूरज जख्मी हो गया. ये तबाही का मंजर 80 साल की बूढ़ी दादी धनखौर ने अपनी आंखों से देखा.
प्रदीप की बहन का कहना है कि दरवाजे पर खटखटाहट हुई. प्रदीप ने दरवाजा खोला. और गोली चल पड़ी. उन्हें पांच गोलियां लगीं. सुशीला उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ीं. और उन लोगों के सामने गिड़गिड़ाईं. उन्होंने सुशीला को भी गोली मार दी. प्रदीप की बहन कहती हैं कि मैं बता नहीं सकती, हॉस्पिटल ले जाते वक्त वो दर्द से कितना कराह रही थीं.
सुशीला नौ माह की प्रेग्नेंट थीं. जब गोली लगी तो कोख के दर्द ने तड़पा दिया. खुशियां आने से पहले मातम पसर गया. सुशीला ने हॉस्पिटल में एक बच्ची को जन्म दे दिया. बच्ची तो खतरे से बाहर है, मगर सुशीला की हालत नाजुक है.
हरीश पैरोल पर आया था बाहर
जांच में पता चला कि मोनू और हरीश बदमाश हैं. दोनों पर झज्जर, रेवाड़ी, गुड़गांव, नारनौल और दादरी में मर्डर, डकैती, लूट और धमकी देने के कई मामले दर्ज हैं. पुलिस के मुताबिक, साल 2008 में हरीश ने अपनी बुआ और उसके लड़के पर जानलेवा हमला किया था. इस मामले में हरीश को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. जिसके बाद वो जुलाई में 42 दिन की पैरोल पर जेल से बाहर आया था, लेकिन वो पैरोल जंप कर गया. सोनीपत के एसपी अश्विन शेणवी ने पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाए जाने की बात कहते हुए आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने का भरोसा दिलाया है.इतनी बेरहमी से तीन लोगों को मार डाला गया. वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से जिंदगी जीने का फैसला किया था. सुशीला ने अपनी जाति से अलग उस जाति में शादी की, जिसे समाज में बहुत से लोग 'नीची जाति' समझते हैं. जाति के मसीहा खामोश हैं. कोई बयान नहीं. क्या इनका मरना किसी के लिए अहमियत नहीं रखता?

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