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151 देशों में आग लगी है, डेमोक्रेसी दफ़न हो रही है!

हर जगह अपने नागरिकों के प्रति हिंसा बढ़ रही है.

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29 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 29 जुलाई 2016, 01:10 PM IST)
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ये जानकर कैसा लगेगा कि दुनिया में एक ही साथ कई देशों में दबा के लोग मारे जा रहे हैं? और वो भी अपने ही देश की सेना या पुलिस के हाथों. घर में बैठे टीवी-सिनेमा देखने में लगता है कि सब कुछ एकदम लक-दक है. हिंसा तो बीते जमाने की बात है. जब लोग बर्बर हुआ करते थे. अब तो हम प्रोग्रेसिव डेमोक्रेसी वाले हैं. खुद का जीवन खुद ही तय करते हैं. अपनी मर्जी के मालिक. पर ऐसा है नहीं. दुनिया के 151 देशों में लगातार आग लगी हुई है. चोरी-छिनैती की बात नहीं हो रही. पूरी की पूरी सेनायें हैं. लोगों को मार रही हैं.
'ग्लोबल पीस इंडेक्स' पिछले दस साल से दुनिया में शान्ति की तलाश कर रहा है. 162 देशों की स्टडी की गई है. 2016 में पता चला है कि मात्र 11 देश हैं जो शांत हैं. बाकी जगह स्थिति बहुत गंभीर है. वहां सदियों से लड़ाई हो रही है. जिसके ख़त्म होने के आसार नहीं हैं.
दुनिया के नक़्शे पर इतनी जगह जारी है खून-खराबा
दुनिया के नक़्शे पर इतनी जगहों पर जारी है खून-खराबा: warsintheworld.com से

इसको समझने के लिए आंकड़े काफी हैं:

अफगानिस्तान

लड़ाई की शुरुआत: 1978 तब से अब तक कितने मरे: 20 लाख 2015 में कितने मरे: 36 हज़ार

इराक

लड़ाई की शुरुआत: 2003 तब से अब तक कितने मरे: 10 लाख 2015 में कितने मरे: 21 हज़ार

सीरिया

लड़ाई की शुरुआत: 2011 तब से अब तक कितने मरे: 5 लाख 2015 में कितने मरे: 55 हज़ार

अफ्रीका (नाइजीरिया, कैमरून, चाड, नाइजर): बोको हरम ग्रुप

लड़ाई की शुरुआत: 2009 तब से अब तक कितने मरे: 21 हज़ार 2015 में कितने मरे: 11 हज़ार
ये बड़े आंकड़े थे. अब महाद्वीप के हिसाब से देखें कि कहां, कब से जंग छिड़ी है:

एशिया

कुर्द-टर्की (1984 से), उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान(2004 से), पाकिस्तान (बलूचिस्तान में 1948 से) , यमन(2011से ), भारत ( कश्मीर में 1947 से), म्यांमार (19 48 से), इजराइल-फिलिस्तीन(1964 से), थाईलैंड(1960 से), फिलीपिंस (1969 से), आर्मीनिया (1988 से), चीन (1989 से), टर्की (2015 से), बांग्लादेश (1989 से), लेबनान (2011 से)

अफ्रीका

सोमालिया (1991 से), लीबिया (2011 से), इजिप्ट (2011 से), सूडान (2011 से), इथियोपिया (1992 से), अल्जीरिया (1998 से), ट्यूनीशिया (2002 से), सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक (2012 से ), माली (2012 से), बुरुंडी (2015 से), मोजाम्बिक (2013 से)

यूरोप

रूस (1994 से), यूक्रेन (2014 से)

उत्तर अमेरिका

मेक्सिको (2006 से)

दक्षिण अमेरिका

पेरू (1980 से), कोलंबिया (1964 से)
ये सारे आंकड़े ऊपर-ऊपर के हैं. अभी और ध्यान से देखा जाये तो अपने भारत में ही नक्सली हिंसा एक लम्बे समय से चल रही है. अमेरिका में 'अश्वेत' लोगों को पुलिस ही मार देती है. यूरोप के बहुत सारे देशों में जब-तब लोग हिंसक हो उठते हैं. नॉर्थ कोरिया की पूरी बात ही पता नहीं चलती. हथियारों की बिक्री दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. पूरी दुनिया में कड़े मिजाज के नेताओं को चुना जा रहा है. आतंकवादी कहीं भी बम फोड़ देते हैं. अगर सारी पॉलिटिक्स मिला दें तो सारी डेमोक्रेसी दफ़न हो गई है.

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