बिहार में मची भसड़ के बीच प्रशांत किशोर कहां हैं, क्या कर रहे हैं
इधर लालू-नीतीश के बीच सियासी जंग चल रही है, उधर पीके ने साउथ में नया अड्डा जमा लिया है
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फोटो - thelallantop
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आगे बढ़ता रहे बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार. बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है...
ये नारे 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू, राजद और कांग्रेस की तिकड़ी का प्रचार अभियान संभाल रहे पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट प्रशांत किशोर ने दिए थे. नारे अब भी चल रहे हैं. सरकार के मुखिया के तौर पर अब भी नीतीश कुमार ही हैं, लेकिन वो तिकड़ी बदल गई है और अब जदयू महागठबंधन नहीं राजग का हिस्सा हो गई है.
इस बीच हर छोटी बड़ी बात के लिए ट्विटर पर हंगामा मचाने वाले लोग अब प्रशांत किशोर के बारे में भी पूछने लगे हैं कि आखिर वो कहां हैं. इस बात का जवाब खुद पीके ने दी लल्लनटॉप को दिया है. प्रशांत किशोर ने बताया कि वो अभी हैदराबाद जा रहे हैं. हालांकि किसलिए जा रहे हैं, ये नहीं बताया. जब उनसे बिहार के पूरे घटनाक्रम और इसके पीछे उनकी भूमिका के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इससे साफ इनकार कर दिया और कहा, 'मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है. मैं अपने काम में बिज़ी हूं.'
वो किस काम में बिज़ी हैं, ये तो उन्होंने नहीं बताया, लेकिन सूत्रों की मानें तो पीके इन दिनों वाईएसआर कांग्रेस के साथ जुड़ गए हैं. अभी इसी महीने के पहले हफ्ते में वाईएसआर अध्यक्ष वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने पार्टी नेताओं की बैठक की थी, जिसमें प्रशांत किशोर मौजूद थे. इस बैठक के बाद वाईएसआर सांसद पी मिथुन रेड्डी ने कहा था कि पार्टी ने उन्हें सलाहकार के तौर पर स्वीकार कर लिया है. अब वो प्रदेश में सत्ता पर काबिज तेलुगू देशम पार्टी और उसके मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से मुकाबला करने में पार्टी की मदद करेंगे.
'अबकी बार मोदी सरकार' से आए थे लाइमलाइट में प्रशांत किशोर और उनकी टीम ने मई 2013 में नरेंद्र मोदी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी. राजनेताओं ने तो उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन चाय पर चर्चा और थ्रीडी वाले नरेंद्र मोदी की छवि जैसी तमाम चीजों ने बीजेपी को केंद्र में स्थापित कर दिया. इसका क्रेडिट पीके को भी गया. प्रशांत ने सिटीजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) नाम से एनजीओ बनाकर मोदी को ब्रैंड के तौर पर पेश किया और जीत में अहम भूमिका निभाई. हालांकि चुनाव बाद पीके बीजेपी की टीम से अलग हो गए.
फिर महागठबंधन के बने सारथी उनके भाजपा छोड़ने की मुख्य वजह अमित शाह से अनबन बताई जाती है. कहते हैं कि इसके बाद पीके ने भाजपा को सबक सिखाने की भी ठानी थी. और ऐसा उन्होंने कर भी दिखाया 2015 में. जब बिहार में जदयू-राजद-कांग्रेस ने उन्हें अपने महागठबंधन का सारथी बना दिया. बिहार चुनाव में उन्होंने इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आईपैक) बनाकर 'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो' के नारे के साथ नीतीश को जीत दिलाई. मगर दो साल बाद ये महागठबंधन फ्लॉप हो गया है.

प्रशांत किशोर यूपी चुनाव में कांग्रेस के साथ थे.
यूपी में गम, पंजाब में खुशी बिहार की जीत से उत्साहित पीके और उनकी टीम ने यूपी में अखिलेश यादव और राहुल गांधी को एक मंच पर लाकर नाम दे दिया, 'यूपी को ये साथ पसंद है.' बीजेपी से सीधी लड़ाई के बीच पीके ने यूपी के लड़के बनाम बाहरी का भी नारा दिया. जब तक राहुल और अखिलेश को पीके एक मंच पर नहीं ला पाए थे, उन्होंने कांग्रेस के लिए खाट सभाएं भी आयोजित कीं, जो पूरे चुनाव में चुनावी मुद्दों के लिए कम और खाटों की चोरी के लिए ज्यादा चर्चित रहीं. हालांकि जब चुनाव के नतीजे आए तो ये साफ हो गया कि पीके का सुझाया गया साथ यूपी के लोगों को नहीं पसंद आया. बतौर पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट पीके की ये हार थी. हालांकि पंजाब में कांग्रेस की जीत ने पीके के लोगों को संतोष करने भर की खुराक दे दी. अब देखने वाला होगा कि नॉर्थ से साउथ की डगर पर निकले पीके को कितनी कामयाबी मिलती है.
देखिए ट्विटर यूजर्स पीके को कितनी शिद्दत से ढूंढ रहे हैं-
मौज लेने में भी पीछे नहीं ट्विटर वाले-
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ये नारे 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू, राजद और कांग्रेस की तिकड़ी का प्रचार अभियान संभाल रहे पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट प्रशांत किशोर ने दिए थे. नारे अब भी चल रहे हैं. सरकार के मुखिया के तौर पर अब भी नीतीश कुमार ही हैं, लेकिन वो तिकड़ी बदल गई है और अब जदयू महागठबंधन नहीं राजग का हिस्सा हो गई है.
इस बीच हर छोटी बड़ी बात के लिए ट्विटर पर हंगामा मचाने वाले लोग अब प्रशांत किशोर के बारे में भी पूछने लगे हैं कि आखिर वो कहां हैं. इस बात का जवाब खुद पीके ने दी लल्लनटॉप को दिया है. प्रशांत किशोर ने बताया कि वो अभी हैदराबाद जा रहे हैं. हालांकि किसलिए जा रहे हैं, ये नहीं बताया. जब उनसे बिहार के पूरे घटनाक्रम और इसके पीछे उनकी भूमिका के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इससे साफ इनकार कर दिया और कहा, 'मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है. मैं अपने काम में बिज़ी हूं.'
वो किस काम में बिज़ी हैं, ये तो उन्होंने नहीं बताया, लेकिन सूत्रों की मानें तो पीके इन दिनों वाईएसआर कांग्रेस के साथ जुड़ गए हैं. अभी इसी महीने के पहले हफ्ते में वाईएसआर अध्यक्ष वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने पार्टी नेताओं की बैठक की थी, जिसमें प्रशांत किशोर मौजूद थे. इस बैठक के बाद वाईएसआर सांसद पी मिथुन रेड्डी ने कहा था कि पार्टी ने उन्हें सलाहकार के तौर पर स्वीकार कर लिया है. अब वो प्रदेश में सत्ता पर काबिज तेलुगू देशम पार्टी और उसके मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से मुकाबला करने में पार्टी की मदद करेंगे.
'अबकी बार मोदी सरकार' से आए थे लाइमलाइट में प्रशांत किशोर और उनकी टीम ने मई 2013 में नरेंद्र मोदी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी. राजनेताओं ने तो उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन चाय पर चर्चा और थ्रीडी वाले नरेंद्र मोदी की छवि जैसी तमाम चीजों ने बीजेपी को केंद्र में स्थापित कर दिया. इसका क्रेडिट पीके को भी गया. प्रशांत ने सिटीजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) नाम से एनजीओ बनाकर मोदी को ब्रैंड के तौर पर पेश किया और जीत में अहम भूमिका निभाई. हालांकि चुनाव बाद पीके बीजेपी की टीम से अलग हो गए.
फिर महागठबंधन के बने सारथी उनके भाजपा छोड़ने की मुख्य वजह अमित शाह से अनबन बताई जाती है. कहते हैं कि इसके बाद पीके ने भाजपा को सबक सिखाने की भी ठानी थी. और ऐसा उन्होंने कर भी दिखाया 2015 में. जब बिहार में जदयू-राजद-कांग्रेस ने उन्हें अपने महागठबंधन का सारथी बना दिया. बिहार चुनाव में उन्होंने इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आईपैक) बनाकर 'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो' के नारे के साथ नीतीश को जीत दिलाई. मगर दो साल बाद ये महागठबंधन फ्लॉप हो गया है.

प्रशांत किशोर यूपी चुनाव में कांग्रेस के साथ थे.
यूपी में गम, पंजाब में खुशी बिहार की जीत से उत्साहित पीके और उनकी टीम ने यूपी में अखिलेश यादव और राहुल गांधी को एक मंच पर लाकर नाम दे दिया, 'यूपी को ये साथ पसंद है.' बीजेपी से सीधी लड़ाई के बीच पीके ने यूपी के लड़के बनाम बाहरी का भी नारा दिया. जब तक राहुल और अखिलेश को पीके एक मंच पर नहीं ला पाए थे, उन्होंने कांग्रेस के लिए खाट सभाएं भी आयोजित कीं, जो पूरे चुनाव में चुनावी मुद्दों के लिए कम और खाटों की चोरी के लिए ज्यादा चर्चित रहीं. हालांकि जब चुनाव के नतीजे आए तो ये साफ हो गया कि पीके का सुझाया गया साथ यूपी के लोगों को नहीं पसंद आया. बतौर पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट पीके की ये हार थी. हालांकि पंजाब में कांग्रेस की जीत ने पीके के लोगों को संतोष करने भर की खुराक दे दी. अब देखने वाला होगा कि नॉर्थ से साउथ की डगर पर निकले पीके को कितनी कामयाबी मिलती है.
देखिए ट्विटर यूजर्स पीके को कितनी शिद्दत से ढूंढ रहे हैं-
Between all this, wondering what will Prashant Kishore do now? After all job security bhi koi cheez hoti hai Saheb?
— Neeraj Singh (@Neeraj_Bihar) July 27, 2017
Does any one knows, where this Prashant Kishore is....?? — आशीष कुमार अग्रवाल (@coomarashish) July 26, 2017
What happens to Prashant Kishore now? Will he still enjoy status of a cabinet minister in JDU-BJP govt.? #NitishGharWapsi
— India Politics Watch (@politicalbaaba) July 27, 2017
So what happens to Nitish ji's political strategist cum advisor, Prashant Kishore now? Nitish ji's gharwapasi to BJP with PK or without? 😃 — Sadhavi Khosla (@sadhavi) July 26, 2017
मौज लेने में भी पीछे नहीं ट्विटर वाले-
Dear Prashant Kishore,
Har Baap ka ek Baap Hota Hai...
Usse Ham Amit Shah kehte hai #CheckAndMate
pic.twitter.com/eBp7x82kvN
— धवल पटेल (@dhaval241086) July 26, 2017
Master Strategist... Prashant Kishore did it again for @narendramodi
After drowning Congress in UP... Gave Bihar back to NDA#NitishQuits
pic.twitter.com/ky37yrHnLh
— Hunting_Hunters (@eparitosh) July 26, 2017
Prashant Kishore is on the Roll of BJP ? Just asking @ArvindKejriwal
— Yogi Adityanath MyCM (@coolshivam) July 26, 2017
Sir AAP hi bta do 😂😂#NitishKumar
#NitishQuits
pic.twitter.com/Dm5MlMydvd
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