शाहिद आफरीदी और लिएंडर पेस दो ऐसे खिलाड़ी हैं जिनको शायद भारत की 60 प्रतिशत जनतापैदा होने के समय से ही देख रही है. हर दो महीने में इनसे उम्मीद की जाती है किरिटायरमेंट लेंगे और नये लोगों को मौका देंगे. आफरीदी तो कई बार ले भी चुके हैं.कुछ उत्साही लोग जबरिया संन्यास दिलाने की बात करते हैं.ये उत्साह दिखाया है सुप्रीम कोर्ट ने और अखिलेश यादव के समर्थकों ने.अनुराग ठाकुर की विदाईसुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई और समर्थकों ने मुलायम को सपा केअध्यक्ष पद से विदाई दिला दी.सुप्रीम कोर्ट ने मंडे को ऑर्डर दिया कि अनुराग ठाकुर को प्रेसिडेंट पद से हटायाजाये क्योंकि वो कोर्ट के ऑर्डर नहीं मान रहे हैं. कोर्ट ने अजय शिर्के कोसेक्रेटरी के पद से हटा दिया. इतना ही नहीं हुआ है. दोनों को शो-कॉज नोटिस भी दियागया. कि कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट क्यों ना लगाया जाये इन पर. 18 जुलाई के एक डिसीजन मेंलोढ़ा पैनल ने बताया था कि बीसीसीआई के ज्यादातर अफसर पद संभालने के योग्य नहींहैं.जस्टिस लोढ़ा14 नवंबर को लोढ़ा कमिटी की तीसरी रिपोर्ट आई थी जिसमें इनको डिस्क्वालिफाई कर दियागया था. कोर्ट ने इसके बाद नये एडमिनिस्ट्रेटर के नाम मंगाये हैं. सुप्रीम कोर्ट नेजुलाई में ही कहा था कि लोढ़ा कमिटी क्रिकेट में ट्रांसपैरेंसी के लिए बनाई गई है.हर्षा भोगले ने कहा कि इंतजार कीजिए. कुछ बहुत क्रांतिकारी हुआ है. बिशन सिंह बेदीने कहा कि ये इंडियन खेल के लिए शुभ संकेत है.जस्टिस लोढ़ा ने कहा कि ये तो होना ही था.कोर्ट ने राजनीति को खेल में दखलअंदाजी के लिए गलत माना है. ये राजनीति हर खेल मेंघुसी हुई है.मुलायम सिंह का विस्थापनइसी तरह मुलायम सिंह यादव को सपा के समर्थकों ने अध्यक्ष पद से विदाई दे दी है.मुलायम मान नहीं रहे हैं. अभी भी ऑर्डर निकाल रहे हैं कि फलाने बर्खास्त कर दियेगये. छह साल के लिए बाहर. जब ये खबर आई कि मुलायम का बीपी बढ़ गया है तो तुरंत कहा-मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैंने कभी कुछ गलत नहीं किया है. 78 साल के मुलायम अपने भाईशिवपाल और अमर सिंह के साथ दिल्ली में विराजे हैं. साइकिल चुनाव चिह्न रखने के लिए.पता नहीं क्या इरादा है.मुलायम और शिवपालबात ये है कि लोगों को कुर्सी से इतना मोह क्यों हो जाता है. इसके लिए हर चीज भूलजाते हैं. अनुराग ठाकुर पर आरोप लगता है कि स्टेट क्रिकेट के प्रेसिडेंट रहते हुएएक मैच में कैप्टन बनकर उतर गये. सीवी बनाने के लिए. ऐसा क्रिकेट के इतिहास मेंपहली बार हुआ था. पिताजी पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल थे. उनके रसूख काफायदा उठाकर अनुराग ने मनमर्जी कर दी. वहां से बड़ी तेजी से प्रगति कर गये. हर बड़ेप्रोग्राम में नजर आते. चाहे वो राजनीति का हो या फिर क्रिकेट का. बीसीसीआई केप्रेसिडेंट बन गये.जनता में उत्साह, चीजों के बदलने की उम्मीद बंधी हैये बहुत अच्छा हुआ है. बड़ा ही अनोखा सा कुछ हुआ है. ऐसा लग रहा है कि इसका इंतजारजनता बहुत दिन से कर रही थी. पर इसमें एक ऑयरनिकल चीज है. दोनों में ही डेमोक्रेटिकप्रोसेस को ताक पर रखा गया है. या यूं कहें कि पूरी तरह नहीं तो थोड़ा सा तो ताक परटिका ही दिया गया है.अनुराग और मुलायम दोनों ही बोर्ड और पार्टी से चुने हुए लोग थे. डायरेक्ट जबर्दस्तीनहीं किये थे. तो कौन हैं वो लोग जिन्होंने दोनों को चुना था. क्या लोग डरते हैं.क्या किसी संस्था में लोग आवाज नहीं उठाते.इसका जवाब यही है कि आवाज उठी है. शायद ऐसे ही आवाज उठती है. सुप्रीम कोर्ट नेफैसला लेकर साबित कर दिया है कि भरोसा यूं ही नहीं है कोर्ट पर. उधर अखिलेश केसमर्थक भी बदलाव चाहते हैं. सपा पर हमेशा गुंडई का आरोप लगते रहा है. शायद खुद कोबचाने की कवायद हो ये. शायद समर्थक ये दाग मिटाना चाहते हों.लिएंडर से कोई दिक्कत नहीं, मजाक कर रहे थेपर ये शायद बना रहता है. क्योंकि कोई भी बदलाव अच्छा हो, इस बात की कोई गारंटी नहींहोती. क्योंकि गड़बड़ी प्रोसेस में होती है. संस्थागत. पर ये भी होता है कि बदलावऐसे ही होता है. उम्मीद रहती है कि नये लोग जरूर चीजें बदलेंगे.खेलों के लिहाज से ये बहुत अच्छा डिसीजन है. एक बार की बात है. मुक्केबाज विजेंदरसिंह स्पोर्ट्स एकेडमी में प्रैक्टिस कर रहे थे. अचानक अर्दली आया और कान में कुछबोला. विजेंदर सिंह मशीन से हट गये. बाद में पता चला कि साहेब आ रहे थे. जिम करने.तो ये हाल है.दिक्कत आफरीदी से भी नहीं, मजाक कर रहे थेये डिसीजन बहुत ही अच्छा हुआ है. इससे उम्मीद जगी है. कि शायद कुछ ठीक हो जाये.शाहिद आफरीदी और लिएंडर पेस का मसला अलग है. वो लोग तो स्पोर्ट्सपर्सन हैं. उनकीमर्जी. उनके खेल पर निर्भर करता है. उनसे चिपकने की कंप्लेंट नहीं है. पर मजाक केतौर पर कह लेते हैं. बचपन से देख रहे हैं. और ढंग से खेलते नहीं आजकल. बेवजह कीबातों से ज्यादा चर्चा में रहते हैं.