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  • Sushil Kumar or Narsingh Yadav: Who deserves to represent India in 74kg category at Rio Olympics?

सुशील भाई, पहलवानी का हर फैसला पहलवानी से नहीं होता

एक तरफ दो ओलंपिक मेडल दिला चुका पहलवान. दूसरी तरफ वो, जो नियमों के मुताबिक डिजर्व करता है. ओलंपिक किसे भेजा जाए.

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13 मई 2016 (अपडेटेड: 13 मई 2016, 01:21 PM IST)
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फोटो - thelallantop
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पहलवान सुशील कुमार नाराज़ हैं. खबर है कि रियो ओलंपिक में उन्हें नहीं भेजा जा रहा. अब उन्होंने जिद पकड़ ली है. कहा है कि जिन्हें भेजा जा रहा है नरसिंह यादव, उनसे हमें लड़ा दो. जो जीत जाए उसे भेज दो. इसके लिए उन्होंने खेल मंत्री को चिट्ठी भी लिख मारी है. बल्कि सुशील और उनके गुरु सतपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की इजाजत भी मांगी है. यह एक किस्म की पहलवानी जिद है. बहस चल पड़ी है. किसे भेजा जाए? सुशील कुमार जो दो बार ओलंपिक मेडल दिला चुके हैं या नरसिंह यादव जो नियमों के मुताबिक भेजे जाने के हकदार हैं. पहले पूरा मामला समझ लो.

पूरा मामला क्या है

रेस्लिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) ने इंडियन ओलंपिक्स एसोसिएशन (IOA) को संभावितों के जो नाम भेजे हैं, खबर है कि उनमें सुशील कुमार का नाम नहीं है. हालांकि ओलंपिक्स एसोसिशन ने कहा कि अभी किसी का नाम फाइनल नहीं है. सुशील कुमार ने दो ओलंपिक मेडल जीते हैं. 2008 ओलंपिक में ब्रॉन्ज और 2012 में सिल्वर. ये दोनों मेडल उन्होंने 66 किलो वाली कैटेगरी में जीते. 2013 में इंटरनेशनल रेस्लिंग फेडरेशन ने वजन की कैटेगरीज नए सिरे से तय कीं तो सुशील को 74 किलो कैटेगरी में शिफ्ट होना पड़ा. 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में 74 किलो कैटेगरी में लड़े और गोल्ड मेडल जीते.
नरसिंह भी 74 किलो वाली कैटेगरी के पहलवान हैं. उनकी दावेदारी इसलिए हुई, क्योंकि उन्होंने पिछले साल लास वेगस में वर्ल्ड रेस्लिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीता था. नियमों के मुताबिक, वह ओलंपिक में भेजे जाने के हकदार हुए. सुशील के कंधे में चोट थी. वह इस टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सके. 
https://twitter.com/WrestlerSushil/status/730695252080742401
लेकिन अब वह कह रहे हैं कि हमको नरसिंह से लड़वा दो. 'गेम ऑफ थ्रोन्स' जिन्होंने देखा हो उन्हें लॉर्ड टिरियन का 'ट्रायल बाय कॉम्बैट' याद आ जाएगा.
सुशील ने कहा, 'मैं बस ट्रायल की मांग कर रहा हूं. मैं यह नहीं कह रहा कि मेरे पास्ट की वजह से मुझे रियो ओलंपिक में भेजा जाए. मैं ये कह रहा हूं कि मुझमें और नरसिंह में जो बेहतर हो, वो देश के लिए खेलने जाए. ओलंपिक चैंपियन जॉर्डन बरॉस को भी अमेरिका के ओलंपिक दल का हिस्सा बनने के लिए ट्रायल का सामना करना पड़ा था.' हालांकि खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने इसे फेडरेशन का ईशू कहते हुए दखल से इनकार कर दिया है. https://twitter.com/WrestlerSushil/status/730951863957397504 सुशील साहब, आपने देश का मान बढ़ाया है. लेकिन माफ कीजिए, खेल नियमों से चलता है जनभावना से नहीं. फिटनेस खेल का ही एक जरूरी हिस्सा है. नरसिंह ने खुद को फिट रखा, आप नहीं रख पाए. ओलंपिक क्वालिफिकेशन के नियम 1992 से बने हैं और तब से भारत में ऐसा कोई फैसला ट्रायल के जरिये नहीं लिया गया. वैसे भी 2014 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों के बाद से सुशील ने किसी टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लिया है. न ही उन्होंने नेशनल कैंप में हिस्सा लिया और न ही पिछले साल प्रो-रेस्लिंग लीग में. हाल ही में वह कंधे की चोट से उबरे हैं और न चुने जाने पर बमक उठे हैं. उधर नरसिंह ने इसके लिए पूरी मेहनत की है. उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज लिया. साथ ही प्रो-लीग में भी उनका प्रदर्शन धमाकेदार था. तमाम कोचों ने अपनी देखरेख में उन्हें ओलंपिक में लड़ने के लिए तैयार पाया है.
फर्ज कीजिए कि क्रिकेट के खेल में युवराज सिंह को टीम में न लिया जाए और वे कहने लगें कि 6 बॉल हमको खिला लो, 6 रहाणे को खिला लो, जो ज्यादा रन बनाए, उसे टीम में रख लो. ऐसा होता है क्या? ये बपरौला का अखाड़ा नहीं है सुशील भाई. कि केसरी तभी बनेंगे जब हमको चित्त कर देंगे. 
खेल पहलवानी का जरूर है. पर इसका हर फैसला पहलवानी से थोड़े ना होगा. कायदा-कानून भी कोई चीज होती है.

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