दहेज कानून में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बदलाव, अब ये सही है या गलत?
6 महीने का होगा ट्रायल.
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फोटो - thelallantop
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दहेज के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का एक बेहद अहम फैसला आया है. इस फैसले के तहत IPC की धारा 498 A के प्रावधानों में बदलाव किया गया है. कोर्ट की जजमेंट के मुताबिक अब किसी भी मामले में दहेज मांगने या उत्पीड़न के आरोपी को तत्काल प्रभाव से गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा. बहुत जरूरी मामलों में गिरफ्तारी संभव होगी लेकिन गिरफ्तारी की वजह बतानी पड़ेगी, जिसकी समीक्षा मजिस्ट्रेट करेंगे. और इसमें किसी भी तरह का घाल-मेल पाने पर इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर के खिलाफ जांच के भी आदेश दिए जा सकते हैं. दहेज़ से जुड़ा कोई भी मामला 'परिवार कल्याण समिति' (फॅमिली वेलफेयर कमिटी) को रेफ़र कर दिया जाएगा. और उसकी रिपोर्ट आ जाने के बाद ही कोई एक्शन लिया जा सकेगा. इसके लिए हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति और मामले की जांच के लिए एक अधिकारी नियुक्त किया जाएगा. इस समिति को अपनी रिपोर्ट एक महीने के भीतर देनी होगी.
कोर्ट के इस जजमेंट के पीछे की वजह इस कानून का गलत इस्तेमाल होना है. कई मामलों में पत्नियां अपने पति और उनके परिवार वालों से बदला लेने के लिए ऐसी चीज़ों का सहारा ले रहीं थी. जो की गलत है. इस तरह के कानून से कई शादियों में दिक्कतें आईं है और आगे भी आने की संभावना थी जिसको इस जजमेंट के बाद खारिज़ किया जा सकता है.

कोर्ट ने इसके तहत मामला दर्ज कराने वाली महिलाओं से ये भी कहा कि इस तरह का कोई भी केस दर्ज करवाने से पहले अपने पति न सही उनके बूढ़े माता-पिता के बारे में तो एक बार सोच लें.
क्या है धारा 498 A?
1860 में बने इंडियन पीनल कोड (IPC) में साल 1961 में भारतीय महिलाओं को दहेज़ प्रथा की वजह से हो रही असुविधा और परेशानियों से बचाने के लिए 'दहेज निषेध अधिनियम' (The Dowry Prohibition Act) जोड़ा गया. इसके अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 साल की जेल और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है. लेकिन इससे भी दहेज़ से जुड़े मामलों में बहुत कमी ना आने पर IPC में साल 1983 में एक और बदलाव किया गया. साल 1983 में धारा 498 A में कुछ और चीज़ें जोड़ी गईं जिससे दहेज़ से जुड़े कानूनों को और मजबूती मिले और इससे जुड़े मामलों में कमी आए. दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर IPC की धारा 498-A जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा संपत्ति या कीमती वस्तुओं की मांग के मामले से जुड़ा है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है.

देश में इस कानून के मिसयूज के कई केस सामने आ चुके हैं.
आंकड़ों के अनुसार कोर्ट का फैसला कितना सही है?
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एच.एल. दत्तू और ए.के सिकरी की दो सदस्यीय बेंच ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Record Bureau) का हवाला देते हुए लिखा है कि 'अनुच्छेद 498 A के तहत 2012 में करीब 2 लाख लोगों की गिरफ्तारी हुई जो कि 2011 के मुकाबले 9.4 फ़ीसदी ज्यादा है. 2012 में जितनी गिरफ्तारी हुई उनमें से लगभग एक चौथाई महिलाएं थीं. अनुच्छेद 498 A में चार्जशीट की दर 93.6 फीसदी है जबकि सजा की दर 15 फीसदी है जो काफी कम है. फिलहाल 3 लाख 72 हजार 706 केस की सुनवाई चल रही है, जिसमें लगभग 3 लाख 17 हजार मुकदमों में आरोपियों की रिहाई की संभावना है. इन आंकड़ों को देखते हुए लगता है कि इस कानून का इस्तेमाल पति और उनके रिश्तेदारों को परेशान करने के लिए हथियार के तौर पर किया जा रहा है.'

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल.दत्तू
इस मामले को और बेहतर तरीके से समझने के लिए हमने दिल्ली हाई कोर्ट के एक क्रिमिनल और परिवार मामलों के वकील प्रांजल शेखर से बात की तो उन्होंने हमें इस जजमेंट से जुड़ी सारी चीज़ें बड़ी तसल्ली से बताईं. उन्होंने हमें बताया कि सुप्रीम कोर्ट का ये जजमेंट अभी ट्रायल पीरियड में है जिसके लिए 6 महीने की डेडलाइन दी गई है. इन 6 महीनों में इस बात का पता लगाया जाएगा कि ये बदलाव किस हद तक कारगर हैं. अगर इसके अच्छे परिणाम आते हैं तो बेशक इसे लागू कर दिया जाएगा. लेकिन पॉजिटिव फीडबैक ना आने की सूरत में इसे हटाया भी जा सकता है. जब हमने फैमिली वेलफेयर कमिटी से जुड़ी कुछ बातें पूछी तो उन्होंने बताया कि ये जजमेंट के 1 महीने के अन्दर बनाई जाएगी जिसके सदस्य रिटायर्ड सिविल सर्विसमेन और उनकी पत्नियां हो सकती हैं. जिन्हें कम से कम सात दिन की ट्रेनिंग दी जाएगी.
तो ये था सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट से जुड़ा मसला. अब आप तय करें कि ये कितना गलत और कितना सही या कितना कारगर होगा. मगर इतना तो है कि अगर कोई अब इस दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून का मिसयूज करता है तो उसके लिए ये अब आसान नहीं होगा. देश में लगातार इस कानून के मिसयूज होने के केस बढ़ रहे हैं और इस बीच ये उन लोगों के लिए अच्छी खबर होगी जिन्हें गलत इरादे से इन मामलों में फंसाया गया है. ताकि कानून में सबका विश्वास बना रहे.
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कोर्ट ने इसके तहत मामला दर्ज कराने वाली महिलाओं से ये भी कहा कि इस तरह का कोई भी केस दर्ज करवाने से पहले अपने पति न सही उनके बूढ़े माता-पिता के बारे में तो एक बार सोच लें.
क्या है धारा 498 A?
1860 में बने इंडियन पीनल कोड (IPC) में साल 1961 में भारतीय महिलाओं को दहेज़ प्रथा की वजह से हो रही असुविधा और परेशानियों से बचाने के लिए 'दहेज निषेध अधिनियम' (The Dowry Prohibition Act) जोड़ा गया. इसके अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 साल की जेल और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है. लेकिन इससे भी दहेज़ से जुड़े मामलों में बहुत कमी ना आने पर IPC में साल 1983 में एक और बदलाव किया गया. साल 1983 में धारा 498 A में कुछ और चीज़ें जोड़ी गईं जिससे दहेज़ से जुड़े कानूनों को और मजबूती मिले और इससे जुड़े मामलों में कमी आए. दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर IPC की धारा 498-A जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा संपत्ति या कीमती वस्तुओं की मांग के मामले से जुड़ा है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है.

देश में इस कानून के मिसयूज के कई केस सामने आ चुके हैं.
आंकड़ों के अनुसार कोर्ट का फैसला कितना सही है?
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एच.एल. दत्तू और ए.के सिकरी की दो सदस्यीय बेंच ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Record Bureau) का हवाला देते हुए लिखा है कि 'अनुच्छेद 498 A के तहत 2012 में करीब 2 लाख लोगों की गिरफ्तारी हुई जो कि 2011 के मुकाबले 9.4 फ़ीसदी ज्यादा है. 2012 में जितनी गिरफ्तारी हुई उनमें से लगभग एक चौथाई महिलाएं थीं. अनुच्छेद 498 A में चार्जशीट की दर 93.6 फीसदी है जबकि सजा की दर 15 फीसदी है जो काफी कम है. फिलहाल 3 लाख 72 हजार 706 केस की सुनवाई चल रही है, जिसमें लगभग 3 लाख 17 हजार मुकदमों में आरोपियों की रिहाई की संभावना है. इन आंकड़ों को देखते हुए लगता है कि इस कानून का इस्तेमाल पति और उनके रिश्तेदारों को परेशान करने के लिए हथियार के तौर पर किया जा रहा है.'

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल.दत्तू
इस मामले को और बेहतर तरीके से समझने के लिए हमने दिल्ली हाई कोर्ट के एक क्रिमिनल और परिवार मामलों के वकील प्रांजल शेखर से बात की तो उन्होंने हमें इस जजमेंट से जुड़ी सारी चीज़ें बड़ी तसल्ली से बताईं. उन्होंने हमें बताया कि सुप्रीम कोर्ट का ये जजमेंट अभी ट्रायल पीरियड में है जिसके लिए 6 महीने की डेडलाइन दी गई है. इन 6 महीनों में इस बात का पता लगाया जाएगा कि ये बदलाव किस हद तक कारगर हैं. अगर इसके अच्छे परिणाम आते हैं तो बेशक इसे लागू कर दिया जाएगा. लेकिन पॉजिटिव फीडबैक ना आने की सूरत में इसे हटाया भी जा सकता है. जब हमने फैमिली वेलफेयर कमिटी से जुड़ी कुछ बातें पूछी तो उन्होंने बताया कि ये जजमेंट के 1 महीने के अन्दर बनाई जाएगी जिसके सदस्य रिटायर्ड सिविल सर्विसमेन और उनकी पत्नियां हो सकती हैं. जिन्हें कम से कम सात दिन की ट्रेनिंग दी जाएगी.
तो ये था सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट से जुड़ा मसला. अब आप तय करें कि ये कितना गलत और कितना सही या कितना कारगर होगा. मगर इतना तो है कि अगर कोई अब इस दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून का मिसयूज करता है तो उसके लिए ये अब आसान नहीं होगा. देश में लगातार इस कानून के मिसयूज होने के केस बढ़ रहे हैं और इस बीच ये उन लोगों के लिए अच्छी खबर होगी जिन्हें गलत इरादे से इन मामलों में फंसाया गया है. ताकि कानून में सबका विश्वास बना रहे.
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