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बंगाल में फिर OBC सर्वे कराएगी ममता सरकार, मुस्लिम समुदाय के सर्टिफिकेट कोर्ट ने किए थे रद्द

कलकत्ता हाई कोर्ट ने मई, 2024 में दिए अपने आदेश में पश्चिम बंगाल में कई जातियों के OBC का दर्जा रद्द कर दिया था. हाई कोर्ट ने तब अपने आदेश में कहा था कि इन समुदायों को धर्म के आधार पर ओबीसी घोषित किया गया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार की ओबीसी लिस्ट को लेकर अगली सुनवाई जुलाई में करेगी. (तस्वीर:PTI)
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शुभम सिंह
20 मार्च 2025 (पब्लिश्ड: 07:57 PM IST)
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पश्चिम बंगाल सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान करने के लिए एक नया सर्वे करेगी. इसे लेकर ममता सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी की जाएगी. OBC रिजवर्शेन प्रमाण पत्र जारी करने के मुद्दे पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार विपक्ष के निशाने पर है.

अगली सुनवाई जुलाई में होगी

कलकत्ता हाई कोर्ट ने मई, 2024 में दिए अपने एक आदेश में पश्चिम बंगाल में कई जातियों का OBC दर्जा रद्द कर दिया था. हाई कोर्ट ने तब अपने आदेश में कहा था कि इन समुदायों के लिए धर्म के आधार पर OBC घोषित किया गया है. बाद में इस आदेश के खिलाफ ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची. वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष रखा. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने बताया कि राज्य का पिछड़ा वर्ग आयोग दोबारा सर्वे कराएगा.

सिब्बल ने कहा,

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मामले की सुनवाई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच कर रही है. पीठ ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,

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हाई कोर्ट ने OBC रिजर्वेशन लिस्ट रद्द की

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2010 से 2012 के बीच OBC लिस्ट में 77 समुदायों को जोड़ा था. इनमें से 75 मुस्लिम समुदाय से हैं. इसके चलते राज्य सरकार पर राजनीतिक तुष्टिकरण का आरोप लगाया गया. राज्य सरकार ने एक कानून के जरिये कुछ समुदायों को OBC में जोड़ा था. यह कानून है- “पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के इतर) (सर्विस और पदों में वेकैंसी के लिए आरक्षण) कानून, 2012”.

इस कानून को खत्म करने के लिए उसी साल एक जनहित याचिका दायर की गई थी. याचिका में कहा गया था कि टीएमसी सरकार का फैसला पश्चिम बंगाल पिछड़ा कल्याण आयोग अधिनियम, 1993 के खिलाफ है. मामला हाई कोर्ट पहुंचा. जहां इसी कानून के तहत कुछ समुदायों को मिले OBC प्रमाणपत्रों को रद्द करने का आदेश दे दिया गया.

जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस राजशेखर मंथा की बेंच ने ये आदेश जारी किया था. तब बेंच ने कहा था कि ये आदेश 2010 से जारी किए गए OBC सर्टिफिकेट्स पर लागू होगा. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2010 से पहले OBC में कैटगराइज 66 समुदाय इससे प्रभावित नहीं होंगे, क्योंकि कोर्ट में इनके खिलाफ याचिका नहीं डाली गई थी.

ममता बनर्जी ने हाई कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दमदम में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि ये OBC आरक्षण जारी रहेगा, सरकार ने सर्वे कराने के बाद कानून बनाया था.

किस तरह प्रक्रिया अपनाई गई और कहां दिक्कत हुई?
ये प्रक्रिया तीन स्तरों में की गई जिसमें दो फील्ड सर्वे भी शामिल हैं. इस प्रक्रिया के तहत जब कोई व्यक्ति या समुदाय OBC लिस्ट में शामिल होने के लिए आवेदन करता है तो उसे कई जानकारियां साझा करनी पड़ती हैं. मिसाल के लिए, समुदाय का नाम, समुदाय की आबादी, आर्थिक डेटा और सामाजिक व शैक्षिक जानकारी वगैरा-वगैरा.

इसके बाद फील्ड सर्वे किए जाते हैं. इन सर्वे में एक सार्वजनिक सूचना जारी की जाती है जिससे लोग जान सकें कि किसी समुदाय ने OBC लिस्ट में शामिल होने के लिए अप्लाई किया है. अगर किसी को इस संबंध में आपत्ति उठानी है तो वो भी दर्ज की जाती है. इसके बाद पश्चिम बंगाल राज्य पिछ़डा वर्ग आयोग आवेदन की जांच करता है. मंजूरी मिलने पर यह मामला कैबिनेट के पास भेजा जाता है.

पश्चिम बंगाल सरकार पर आरोप लगा कि OBC लिस्ट में शामिल करने के लिए त्रिस्तरीय प्रक्रिया फॉलो नहीं किया गया. कुछ समुदायों को महज 24 घंटे या कुछ दिनों के भीतर OBC लिस्ट में शामिल कर लिया गया. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, खोट्टा मुस्लिम समुदाय ने OBC लिस्ट में शामिल होने के लिए 13 नवंबर, 2009 को आवेदन किया था और उसी दिन पश्चिम बंगाल पिछड़ा आयोग ने उसे शामिल करने की सलाह दे दी.

इसी तरह गायेन (मुस्लिम) और भाटिया मुस्लिम समुदायों को भी एक ही दिन में शामिल करने की सलाह दी गई थी. इसके अलावा कई अन्य मुस्लिम समुदायों को OBC लिस्ट में डालने में एक महीने से भी कम समय लगा.

अब देखने वाली बात होगी कि तीन महीने में किस तरह ममता सरकार इन सर्वे को लेकर लगे आरोपों का जवाब देती है.

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