The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • supreme court on mansih kashyap row why nsa was applied on him

फ़ेक न्यूज़ फैलाने वाले मनीष कश्यप पर NSA लगाना कितना जायज?

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से पूछा कि नैशनल सिक्योरिटी ऐक्ट क्यों लगाया गया?

Advertisement
Supreme Court on Manish Kashyap NSA
5 अप्रैल को मनीष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी (फाइल फोटो)
pic
सोम शेखर
21 अप्रैल 2023 (अपडेटेड: 21 अप्रैल 2023, 11:09 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

एक यूट्यूबर है. उसने फ़र्ज़ी वीडियो फैलाए. वीडियो और उसमें परोसी गई ग़लत जानकारियों की वजह से माहौल बिगड़ गया. हल्ला कटा और दो राज्यों में अफ़रा-तफ़री मच गई- बिहार और तमिलनाडु. फिर यूट्यूबर ने एक राज्य के डिप्टी सीएम को धमकी दी कि सरकार गिरा देगा. जब जांच हुई, तो पता चला कि तमिलनाडु में हिंदी भाषी मज़दूरों पर संगठित हमलों का कोई पैटर्न नहीं था. कहीं पुराने वीडियो को संदर्भ से काटकर वायरल किया जा रहा था, तो कहीं निजी दुश्मनी में हुई हत्या को बिहारियों पर हमला क़रार दे दिया गया था. दोनों राज्यों में उसके ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज हुए. दोनों राज्यों की पुलिस ने उससे पूछताछ की. इसके बाद उस पर लगा दिया गया राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून यानी NSA. एक यूट्यूबर को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा क़रार दिया गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो सुप्रीम कोर्ट ने भी यही पूछा कि नैशनल सिक्योरिटी ऐक्ट क्यों?

बात, बहस में उतरने से पहले आपको सिलसिलेवार ढंग से ये बता देते हैं कि अब तक हुआ क्या-क्या है.

- मनीष कश्यप, एक यूट्यूब चैनल चलाता है: 'सच तक'. मनीष का कहना था कि तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी मज़दूरों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है. उनके साथ हिंसा हो रही है. उसने इससे जुड़े कुछ वीडियो भी शेयर किए, जिसे तमिलनाडु और बिहार की पुलिस ने फ़र्ज़ी करार दिया.
- इसके बाद मनीष कश्यप की गिरफ़्तारी की ख़बर उड़ी. गिरफ़्तारी को लेकर उसने अपने चैनल पर वीडियो भी बनाए. 18 मार्च, 2023 को मनीष कश्यप ने सरेंडर कर दिया. सरेंडर करने से पहले भी उसने वीडियो बनाए. न्यूज़पेपर्स और वेबसाइट्स की कटिंग दिखाई कि बहुत सारे मीडिया संगठनों ने तमिलनाडु में बिहारी मज़दूरों के ख़िलाफ़ हुई कथित हिंसा को रिपोर्ट किया था, लेकिन पुलिस बस उसके पीछे पड़ी है. कहा कि उसे देश के संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा है.
- इसके बाद बिहार पुलिस और आर्थिक अपराध इकाई ने कई अलग-अलग धाराओं के तहत मनीष के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया. पहले बिहार पुलिस ने पूछताछ की. फिर तमिलनाडु पुलिस ने मनीष की कस्टडी ले ली.
- 3 अप्रैल को मदुरै की कोर्ट ने मनीष को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.
- तमिलनाडु पुलिस ने कोर्ट से मनीष की न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग की थी. 5 अप्रैल को कोर्ट ने फै़सला सुनाया और मनीष को 19 अप्रैल तक के लिए ज्युडिशियल कस्टडी में भेज दिया गया.
- 5 अप्रैल को ही मनीष ने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की थी. उसने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत देने और अलग-अलग राज्यों में दर्ज हुईं FIR को एक साथ क्लब करने की गुज़ारिश की थी. कहा कि पहली FIR पटना में हुई है, सारे केस वही ट्रांसफर कर दिए जाएं.
- लेकिन फिर तमिलनाडु सरकार ने 5 अप्रैल को ही मनीष कश्यप के ख़िलाफ़ NSA के तहत भी मामला दर्ज कर दिया. जिसके बाद मनीष कश्यप ने FIR क्लब करने की मांग के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट से NSA हटाने की अर्जी भी दी.

ये तो कहानी हो गई कि मनीष कश्यप रासुका-याफ्ता कैसे हुआ. पर आज अदालत में क्या सुनवाई हुई और उससे क्या निकला? अब ये जान लेते हैं.

मनीष ने उसके वीडियो और ट्वीट्स के बाद दर्ज की गई कई FIRs को जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. आज, सुप्रीम कोर्ट में इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सवाल पूछा कि मनीष कश्यप के ख़िलाफ़ रासुका या नैशनल सिक्योरिटी ऐक्ट क्यों लगाया गया है?

तमिलनाडु सरकार की तरफ़ से पैरवी कर रहे वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि मनीष के यूट्यूब चैनल के 60 लाख फॉलोवर्स हैं. उसने फेक न्यूज फैलाई है. यहां तक कहा कि एक गवाह ने स्वीकार किया है कि एक वीडियो पटना के घर में शूट किया गया था.

CJI ने कहा कि अदालत मुक़दमों को खारिज नहीं कर रही. मामलों की जांच एजेंसियां करेंगी. सिब्बल अड़े रहे कि उसने सिर्फ़ वीडियो पोस्ट नहीं किए. बल्कि वो ख़ुद तमिलनाडु गया और वहां भी फ़र्ज़ी वीडियो शूट किए. इस पर मनीष कश्यप के वकील ने सवाल उठाए कि इन आरोपों पर NSA कैसे लगा दिया गया?

सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में बिहार और तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया. इसके अलावा, मनीष कश्यप के वकील ने कहा था कि मनीष पर तमिलनाडु में 6 मुक़दमे और बिहार में 3 मुकदमे दर्ज किए गए हैं. जबकि NSA अलग से है. मनीष की याचिका में सुधार कर NSA को चुनौती देने की अपील शामिल करने की इजाज़त दे दी.

ये हुई सुनवाई. अब हम बहस में उतरने के लिए तैयार हैं. दो सवाल हैं. एक का संबंध NSA से है, दूसरे का पत्रकारिता से. हम उल्टी वाकी धार वाली गंगा बहाते हैं. दूसरे सवाल पर पहले जाते हैं.

NSA लगाना कितना जायज़?

एक बड़े जत्थे का मानना है कि मनीष कश्यप पत्रकार है ही नहीं. वो पत्रकार के भेस में ऐक्टिविस्ट है. उसको पत्रकार-धर्म का कोई भान नहीं है. कपिल सिब्बल ने भी आज कोर्ट में कहा कि मनीष चुनाव लड़ चुका है. ये तथ्य है कि साल 2020 में मनीष कश्यप ने निर्दलीय विधानसभा चुनाव भी लड़ा था और उसे 9200 वोट मिले थे. इसके बाद मनीष यूट्यूबर बन गया. भारत आज़ाद देश है. कोई भी कभी भी पत्रकार हो सकता है. कोई भी नेता हो सकता है. लेकिन कपिल सिब्बल ने जो ये कहा कि कश्यप पत्रकार ही नहीं हैं.

अब सवाल उठ रहे हैं कि NSA लगाना कितना जायज़ है. इससे पहले हमें ये समझना होगा कि NSA या रासुका है क्या?

NSA या रासुका 1980 में देश की सुरक्षा के लिए सरकार को ज़्यादा शक्तियां देने के लिए जोड़ा गया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 (3) में NSA का ज़िक्र मिलता है. बाय-डेफ़निशन ये ऐसा कानून है, जिसके तहत किसी "ख़ास ख़तरे" के शक में व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है. NSA के तहत संदिग्ध व्यक्ति को तीन महीने तक बिना ज़मानत के हिरासत में रखा जा सकता है. ज़रूरत पड़ने पर ये अवधि बढ़ाई भी जा सकती है और हिरासत में रखने के लिए आरोप तय करने की भी ज़रूरत नहीं होती. आरोपी सिर्फ़ एडवाइज़री बोर्ड के सामने अपील कर सकता है, जिसमें हाई कोर्ट के जज होते हैं.

इसमें एक बात ग़ौर करें. NSA एक प्रिवेंटिव क़ानून है. प्रिवेंटिव कानूनों का इतिहास आज़ादी से पुराना है. 1881 में अंग्रेज सरकार ने 'बंगाल रेगुलेशन थर्ड' नाम का ऐक्ट बनाया था. इसमें भी घटना होने से पहले गिरफ्तारी की व्यवस्था थी. फिर साल 1919 में 'रॉलट एक्ट' आया, जिसमें ट्रायल की व्यवस्था तक नहीं थी. मतलब हिरासत में लिया शख्स कोर्ट भी नहीं जा सकता था. इसे 'गलघोंटू' या 'गैगिंग ऐक्ट' कहा गया. और इसी के विरोध प्रदर्शन के दौरान ही जलियांवाला बाग कांड हुआ था.

हिंदुस्तान आज़ाद हुआ, तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सबसे पहले 1950 में 'प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट' लाए थे. 31 दिसंबर 1969 में इस ऐक्ट की अवधि ख़त्म हो रही थी. ऐसे में इंदिरा गांधी के PM रहते हुए 1971 में सरकार, विवादित क़ानून 'मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट' या MISA ले आईं. 1975 में इमरजेंसी के दौरान राजनैतिक विरोधियों के दमन के लिए इस कानून का बहुत सख्ती से इस्तेमाल किया गया. इमरजेंसी खत्म होने के बाद जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, तब इस कानून को 44वें संविधान संशोधन के तहत ख़त्म कर दिया गया. इंदिरा गांधी जनवरी 1980 में फिर प्रधानमंत्री बनीं. और उन्हीं की सरकार ने 23 सितंबर 1980 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून संसद से पास करवाया और 27 दिसबंर 1980 को ये तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की मंजूरी के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या NSA के रूप में जाना जाने लगा.

ये तो हुआ इतिहास. लेकिन सवाल अब भी यही है कि सरकार जब चाहे किसी को भी शक के आधार पर गिरफ़्तार कैसे कर सकती है. सरकार को ऐसा कब लगता है कि कोई देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है- इसकी कोई साफ़-साफ़ परिभाषा नहीं है. इस संबंध में हमने कुछ समय पहले नालसर यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा से बात की थी, तो उन्होंने बताया कि,

Embed

अब जब सरकार ही तय करे कि कौन ख़तरनाक और कौन सेफ़, तो बात तो यहीं ख़त्म हो गई. सरकारी फ़ैसलों के कुछ नमूने हमारे सामने हैं.

कई बार तो ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ भी NSA लगा दिया गया जो सिर्फ़ सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे थे. डॉ. कफील खान वाला मामला आपको याद होगा. गोरखपुर के बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के मामले में डॉ. कफील खान के खिलाफ कार्रवाई हुई थी. बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में CAA विरोधी प्रदर्शन के दौरान भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उनपर NSA भी लगाया गया था, जिसे 8 महीने बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था. कोर्ट में सरकार यह साबित नहीं कर पाई थी कि कफील के सिर्फ भाषण भर देने से कानून-व्यवस्था का संकट पैदा हो गया था. ऐसी ही स्थिति दलित एक्टिविस्ट चंद्रशेखर आज़ाद के मामले में भी पैदा हुई थी. उन पर भी सरकार ने NSA लगाया था, लेकिन कोर्ट में इस कानून के टिकने लायक जवाब नहीं दे सकी.

इसी तरह मई 2021 में मणिपुर में पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम और एक्टिविस्ट एरेन्ड्रो लेचोम्बाम के खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई की गई थी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. इन दोनों पर ये कार्रवाई फेसबुक पोस्ट की वजह से हुई थी. उन्होंने लिखा था, "गाय का गोबर और गोमूत्र काम नहीं करता है. रेस्ट इन पीस." दरअसल, जिस दिन ये पोस्ट आई थी उसी दिन मणिपुर बीजेपी अध्यक्ष का निधन हो गया था. फेसबुक पोस्ट आने के बाद बीजेपी नेताओं ने दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था. जिसमें IPC की धाराओं के साथ-साथ NSA भी लगाया गया था. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. जुलाई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने एरेन्ड्रो लेचोम्बाम को रिहा करने का आदेश दिया था. चार दिन बाद हाईकोर्ट से किशोर चंद्र को भी रिहा करने का आदेश आया था.

अब मनीष कश्यप के ख़िलाफ़ NSA के तहत कार्रवाई की गई है. इससे पहले कई और पत्रकारों, नेताओं पर भी ऐसी धाराएं लगाई गईं. लेकिन बाद में ऊपरी अदालतों ने उन्हें खारिज कर दिया. अब सवाल ये उठता है कि इस तरह के मामलों में NSA लगाना कितना जायज है?

फेक न्यूज़ वाक़ई एक बड़ी समस्या है. जिससे निपटने के लिए सख्त कानूनों की भी ज़रूरत है. फैक्ट चेक का अपना महत्व है. फ़ेक न्यूज़ फैलाने पर क़ानून हर हाल में होना चाहिए. लेकिन इसमें भी हमें ये देखना होगा कि किसी न्यूज़ को फेक बताने से पहले कितना होमवर्क किया गया है. फैक्ट चेकर अपने काम में कितना प्रोफेशनल रहा है. अगर ऐसा नहीं होगा, तब नीयत पर सवाल उठेंगे ही. और, फेक न्यूज़ से निपटने के लिए NSA का इस्तेमाल कितना सही है, सवाल तो इस नीयत पर भी उठेंगे ही. जैसे कि सुप्रीम कोर्ट ने उठाए हैं.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: गुजरात दंगों में अमित शाह ने जिस केस में गवाही दी, उसमें क्या फैसला आया?

Advertisement

Advertisement

()