अब कोर्ट में 'अच्छी पत्नी-बुरी पत्नी' कहने से पहले आप तीन बार सोचेंगे
हाउसवाइफ, ईव टीजिंग, प्रॉस्टिट्यूट जैसे शब्दों की जगह सुप्रीम कोर्ट ने नए शब्द सुझाए हैं.
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सुप्रीम कोर्ट ने फैसलों और दलीलों में जेंडर स्टीरियोटाइप शब्दों का इस्तेमाल रोकने के लिए एक मैनुअल जारी किया है. यानी देश की अदालतों में अब रूढ़ीवादी शब्दों का प्रयोग नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने 16 अगस्त को जारी हुए इस मैनुअल में वैकल्पिक शब्द या तरीके भी बताए हैं.
30 पन्ने की इस बुकलेट की जानकारी चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ ने 8 मार्च को ही दे दी थी. जस्टिस चंद्रचूड़ ने महिला दिवस पर सुप्रीम कोर्ट में हुए एक इवेंट में कहा था कि कानूनी मामलों में महिलाओं के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल रोका जाएगा. कोर्ट इसके लिए जल्द ही डिक्शनरी लाने वाली है. यही काम अब हुआ है.
क्या है इस हैंडबुक में?कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा बनाई गई इस बुकलेट में 40 से ज्यादा शब्दों और करीब इतने ही वाक्यांशों का ज़िक्र है.
पूरी लिस्ट लिखना संभव नहीं है, इसलिए हम कुछ चुनिंदा शब्दों के बारे में आपको बताएंगे, जो कानूनी कार्यवाई में आमतौर पर इस्तेमाल कर लिए जाते हैं. जैसे अफेयर. कोर्ट का कहना है कि इस शब्द की जगह 'शादी से इतर रिश्ता' का प्रयोग होगा. करियर वुमन एक और उदाहरण है. अदालती कार्यवाही में अब सिर्फ ‘’वुमन'' कहा जाएगा. नीचे हम कुछ और ऐसे ही बदलाव बता रहें हैं.
ईव टीजिंग - सड़क पर यौन उत्पीड़न
हाउसवाइफ - होम-मेकर
इंडियन वुमन/वेस्टर्न वुमन - वुमन
प्रॉस्टिट्यूट - सेक्स वर्कर
अविवाहित मां - मां
अच्छी पत्नी - पत्नी
प्रोवोकेटिव क्लोदिंग/ड्रेस (भड़काऊ कपड़े) - क्लोदिंग/ड्रेस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मैनुअल में ऐसे 40 से भी ज्यादा बदलाव बताए हैं. बुकलेट में आगे दूसरे किस्म के स्टीरियोटाइप्स पर भी बात की गई है और उनकी जगह क्या लिखा-कहा जाए, ये बताया गया है. समझने के लिए ये 2 उदाहरण देखिए.
'सारी महिलाएं सारे पुरषों से शारीरिक रूप से कमज़ोर होती हैं'
इस स्टीरियोटाइप को तोड़ते हुए कोर्ट ने बताया,
‘पुरुष और महिलाएं शारीरिक रूप से भिन्न हैं. सभी महिलाएं शारीरिक रूप से पुरुषों से कमज़ोर नहीं होती हैं. किसी व्यक्ति की ताकत केवल उसके जेंडर पर निर्भर नहीं करती. बल्कि उनके पेशे, जेनेटिक्स, पोषण और शारीरिक गतिविधियां भी इसका मानक होती हैं.’
ऐसा ही एक और स्टीरियोटाइप है ‘हर महिला को बच्चे चाहिए’. इसको बदलते हुए कोर्ट ने लिखा,
‘हर महिला को बच्चे नहीं चाहिए. पैरेंट बनने का फैसला हर इंसान का अपना खुद का होता है. इसके पीछे कई परिस्थितियां होती हैं.’

इनमें से कुछ सुझावों के साथ कोर्ट ने कुछ केसेस का जिक्र भी किया. हालांकि, कोर्ट का कहना है कि इस हैंडबुक को तैयार करने का मकसद किसी फैसले की आलोचना करना या उसपर संदेह करना नहीं है. कोर्ट सिर्फ रूढ़ीवादी परंपराओं को रोकना चाहती है.
आप पूरी बुकलेट यहां पढ़ सकते हैं.
LGBTQ हैंडबुकचीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ ने मार्च 2023 में ऐसी ही LGBTQ हैंडबुक लॉन्च की थी. इस पहल से कोर्ट और सीजेआई ने इस कम्यूनिटी से जुड़े स्टीरियोटाइप्स पर रोक लगाई थी. इसे लॉन्च करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि जल्द ही वो जेंडर के लिए अनुचित शब्दों की एक लीगल ग्लॉसरी भी जारी करने वाले हैं, जो अब कर दी गई है. सीजेआई ने कहा था कि अगर आप आईपीसी की धारा 376 से संबंधित मामले का एक जजमेंट पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि कई ऐसे शब्द हैं जो अनुचित हैं. पर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कोर्ट-कचहरी में धड़ल्ले से होती है.
CJI चंद्रचूड़ ने कहा था कि इस लीगल डिक्शनरी से न्यायपालिका छोटी नहीं होगी और समय के साथ कानूनी भाषा को लेकर आगे बढ़ेगी.
वीडियो: सुप्रीम कोर्ट ने न्यूज चैनल और ब्रॉडकास्टर को डांटा, CJI चंद्रचूड़ ने क्यों कहा 1 लाख काफी नहीं?

