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सुप्रीम कोर्ट ने रेप के किस मामले में कहा कि अपराध वासना नहीं प्यार में किया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर रेप के दोषी पर लगे आरोप हटा दिए, क्योंकि पीड़िता ने खुद दोषी से शादी कर ली थी और उनके बच्चे के भविष्य के लिए साथ रहना चाहती थी.

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31 अक्तूबर 2025 (अपडेटेड: 31 अक्तूबर 2025, 05:00 PM IST)
Supreme Court Rape Case
सुप्रीम कोर्ट ने इस असाधारण रेप केस को तय करने के लिए संविधान की धारा 142 का इस्तेमाल किया
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सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में 31 अक्टूबर 2025 को एक बहुत ही रेयर मामले पर सुनवाई चल रही थी. मामला रेप का था, लेकिन घटना के कुछ साल बीत चुके थे और पता ये चला कि अब दोषी और पीड़िता शादी कर चुके हैं और साथ रह रहे हैं. कपल का एक छोटा बच्चा भी है. ये असाधारण परिस्थिति ही इस केस को सुप्रीम कोर्ट तक ले आई.

मामला तमिलनाडु का है. घटना के बाद शिकायत दर्ज की गई थी और आरोपी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 366 लगाई गई थी. धारा 366 किसी महिला का अपहरण कर उसे जबरन शादी करने के लिए मजबूर करने से संबंधित है. इसके साथ ही, आरोपी पर बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा अधिनियम (POCSO) की धारा 6 भी लगाई गई थी. POCSO की धारा 6 बहुत ही गंभीर स्तर के यौन शोषण के लिए सजा तय करती है.

निचली अदालत में आरोपी को दोषी माना गया और उसे सजा सुनाई गई थी. लेकिन फिर इस मामले में एक नया मोड़ आया. पीड़िता ने खुद कोर्ट से अपील की कि वो अब दोषी बन चुके अपने पति के साथ ही रहना चाहती है. इसी एक बात की वजह से ये संवेदनशील और जटिल मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा था.

सुप्रीम कोर्ट ने जब पूरे केस की परिस्थितियों और दोनों पक्षों के जीवन को ध्यान से देखा तो एक बहुत ही ज़रूरी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि "ये अपराध वासना में नहीं बल्कि प्यार में किया गया है." इस टिप्पणी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 को लागू किया. अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह विशेष अधिकार देता है कि अगर कोई केस कानूनी जटिलताओं के कारण अटका हो, तो वह 'पूरा और सही इंसाफ' दिलाने के लिए अपनी तरफ से कोई भी जरूरी फैसला या आदेश दे सकता है. उस आदेश से न्याय होना चाहिए. जस्टिस मिलनी चाहिए.

इस विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन मसीह की बेंच ने ये फैसला सुनाया कि रेपिस्ट के ऊपर से सारे आरोप हटाए जाएं और उसे एक आज़ाद इंसान घोषित किया जाए ताकि वह अपने परिवार के साथ सुखी रह पाए. जजमेंट की शुरुआत में बेंच ने प्रसिद्ध अमेरिकन जस्टिस बेंजमिन कोर्डोज़ो को कोट किया: उन्होंने लिखा था,

"कानून का अंतिम मकसद समाज की भलाई है."

इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए, बेंच ने कहा: "पीड़ित महिला ने खुद कहा है कि वह अपने पति जिस पर वह निर्भर है के साथ शांति से रहना चाहती है, और नहीं चाहती कि पति पर अपराधी का दाग लगे. अगर आपराधिक कार्यवाही चलती रही और पति जेल गया, तो उनका परिवार टूट जाएगा. इससे पीड़िता, उनका छोटा बच्चा और पूरे समाज को बहुत बड़ा और न भरने वाला नुकसान होगा."

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को एक कड़ी चेतावनी भी दी. कोर्ट ने साफ किया कि अगर कभी उसने अपनी पीड़िता पत्नी को छोड़ा या उसे दुख दिया, तो उसे दुबारा दोषी माना जाएगा और उसकी पिछली सजा फिर से लागू हो जाएगी.

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