आज चांद का मुंह टेढ़ा नहीं बड़ा होगा
69 सालों में चांद धरती के सबसे नजदीक होगा
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लल्लनटॉप
14 नवंबर 2016 (Updated: 14 नवंबर 2016, 10:04 AM IST)
देखो चांद नज़र आया. चांद नज़र आया. आसमान वाले चांद की ही बात होने जा रही है, लेकिन आज का चांद थोड़ा अलग है. चांद धरती के चक्कर लगाता है, ये बात तो सबको पता है. कभी पास आ जाता है. कभी दूर चला जाता है.
लेकिन आज चांद 69 सालों में धरती के सबसे नजदीक होगा. इस घटना को सुपरमून कहा जाता है.सुपरमून नाम एक एस्ट्रोलॉजर रिचर्ड नोले ने 1979 में दिया था. जब कभी चांद धरती के सबसे नजदीक होता है, इसे सुपरमून कहा जाता है. सुपरमून साल में कई बार हो सकता है. कभी-कभी 14 महीनों में एक बार होता है. 1948 के बाद चांद धरती के सबसे करीब होगा. सबसे चमकीला होगा. खूब बड़ा दिखाई देगा. रोज के मुकाबले सात प्रतिशत बड़ा और पंद्रह प्रतिशत चमकीला होगा. सुपरमून पूर्णिमा (फुल मून) का ही एक नमूना है. इसके अलावा भी फुल मून कई तरह के होते हैं.
ब्लड मून-
जब चांद धरती के पीछे पूरी तरह छिप जाता है तब इसे लूनर एक्लिप्स यानी चंद्रग्रहण कहा जाता है. अभी जल्द ही जब चन्द्र ग्रहण हुआ तो चांद एकदम लाल हो गया था. खून की तरह. तब से इस तरह चांद के लाल हो जाने को ब्लड मून कहा जाने लगा.
ब्लू मून-
इसके लिए दो थ्योरी है. एक थ्योरी कहती है कि एक महीने की दूसरी पूर्णिमा (फुल मून) को ब्लू मून कहा जाता है. एक दूसरी पुरानी थ्योरी ये है कि किसी सीजन की चार पूर्णिमा में तीसरी पूर्णिमा को ब्लू मून कहा जाता है. कई दिनों बाद कोई आदमी दिखाई दे तो अंग्रेजी में इसके लिए 'वन्स इन अ ब्लू मून' वाली कहावत इस्तेमाल की जाती है. जैसे 'ईद का चांद होना' वाली बात कही जाती है .
ब्लैक मून-
ये ब्लू मून का जुड़वा भाई है. लेकिन ये अपने भाई से एकदम उल्टा है. ब्लू मून पूर्णिमा से जुड़ा है जबकि ब्लैक मून अमावस्या (न्यू मून) से. किसी सीजन की तीसरी अमावस्या को ब्लैक मून कहते हैं. ये भी दो-ढाई सालों में एक बार होता है. अभी ब्लैक मून 16 अक्टूबर को हुआ था.
हार्वेस्ट मून-
ये शरद की पूर्णिमा होती है. खूब चमकीली. इसका ये नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस पूर्णिमा की लाइट का इस्तेमाल किसान फसल कटाई और उसे इकट्ठे करने में करते थे. ऐसा बड़े-बुजुर्गों का कहना है. ये सितम्बर में होता है और कई दिनों तक खूब रौशनी वाली रातें होती हैं.
तो आज रात बड़ा और चमकीला चांद देखने के लिए तैयार हो जाओ.
ये स्टोरी निशान्त ने की है.