जब पहले ही गोल से सुनील छेत्री ने पाकिस्तान को सन्न कर दिया, क्या हुआ था?
सुनील छेत्री ने कहा, "जैसे ही मैच शुरू होता, पता नहीं क्या घुस जाता है हम में और उनमें. बस लगता है, इनसे नहीं हारना."

"11 जून, 2005. बलूचिस्तान. देश के लिए मेरा पहला मैच था. पाकिस्तान के ख़िलाफ़. मैं वो दिन भूल नहीं सकता.
बहुत इंट्रेस्टिंग है ये. उनकी टीम भी उसी होटल में ठहरी थी, जहां हम. उनकी टीम है और हम हैं. हम भी पंजाबी में बात करते हैं, वो भी. बढ़िया भाईचारा है. लेकिन जैसे ही मैच शुरू होता, पता नहीं क्या घुस जाता है हम में और उनमें. बस लगता है, इनसे नहीं हारना."
दी लल्लनटॉप के ख़ास प्रोग्राम ‘गेस्ट इन द न्यूज़रूम’ की ताज़ा किस्त के मेहमान थे, भारत के सलामी फ़ुटबॉलर सुनील छेत्री. उनके देश-विदेश के अनुभव, पहले से लेकर आख़िरी मैच के क़िस्से, क्रिकेट बनाम फ़ुटबॉल, डायट, अनुशासन — दुनिया-जहान के मसलों पर बात हुई.
इसी में उन्होंने क्लब फ़ुटबॉल और देश के लिए खेलने में क्या फ़र्क़ है, ये बताया. कहा, “देश के लिए खेलने में जो फ़ील है, वो बताया नहीं जा सकता.”
तो हमने पूछा कि क्या नहीं बताया जा सकता. तब उन्होंने अपने पहले मैच का क़िस्सा सुनाया. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उनका पहला मैच, जब वो मात्र 20 साल के थे.
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सुनील ने बताया कि पहले मैच में तो उन्हें पता भी नहीं था कि वो खेलने वाले हैं. वो भारत के लिए चुन लिए गए थे, मगर ये अंदाज़ा नहीं था कि तुरंत खेलने उतार दिया जाएगा. वो ये मानकर चल रहे थे कि मौक़े मिलने में कुछ समय है. ऊपर से वो तो इतने भर से बहुत ख़ुश थे कि वो टीम में हैं.
"कोच आकर मुझसे बोले, ‘दोस्त, आज तुम उतरोगे’. मैं अपनी जर्सी में परफ़्यूम डाल रहा था. ख़ैर, गेम शुरू हुआ. बहुत इंटेंस मैच. अटैक, टैकल, दोनों तरफ़ से मस्त-मस्त गालियां. फ़ुल तोड़-फोड़.
60-65 मिनट पर मैंने पहला गोल दागा. इंडिया के लिए पहला मैच और मैंने ही टीम के लिए पहला गोल निकाला. मैं इतना ख़ुश! मैंने विज्ञापन वाले बोर्ड के पार कूदा और अपनी दोनों बाहें फैला लीं… और घुप सन्नाटा. पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था. सब मुझे घूर रहे थे. आमतौर पर गोल के बाद टीम वाले ही साथ आ जाते हैं, मगर मेरे पीछे कोई नहीं था. मैं अकेला बांहें फैलाए खड़ा था. फिर मैं मुंडी नीचे कर निकल गया.
वो मैच ड्रॉ हुआ था. 89वें मिनट में पाकिस्तान ने गोल कर दिया था. पर मैं वो दिन नहीं भूलूंगा."
भारत के लिए सुनील खेले, गोल भी मारा, लेकिन घर पर नहीं बता पाए. फ़ोन केवल होटल में होते थे और उसका जो चार्ज लगता था, वो उनकी तनख़्वाह से ज़्यादा था. अगले दिन अख़बार में पढ़ कर घरवालों को मालूम चला.
और क्या-क्या बात हुई? इसके लिए आपको गेस्ट इन द न्यूज़रूम का पूरा एपिसोड देखना पड़ेगा. 3 अगस्त को ऐप/वेबसाइट पर और 4 अगस्त को यूट्यूब पर.
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