विदर्भ. महाराष्ट्र का ये इलाका संतरों के लिए मशहूर है. यहां से कपास का एक बड़ाहिस्सा आता है, जिसके दम पर हिंदुस्तान दुनिया का दूसरा सबसे ज़्यादा कपास पैदा करनेवाला देश है. लेकिन इसकी एक और पहचान है. सुसाइड कैपिटल की.किसानों की खुदकुशी के लिए ये इलाका कुख्यात रहा है. बीते कई सालों से मानसून से इसइलाके को ज्यादा कुछ नहीं मिला. यहां की सबसे बड़ी फसल (कपास) लगातार बर्बाद हुई.यहां डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या 6 गुना बढ़ गई है, लेकिन अगर आप पूरी बातजानेंगे तो यह बुरी खबर नहीं है. गैर सरकारी संगठनों (NGO's) के चलाए विदर्भस्ट्रेस एंड हेल्थ प्रोग्राम (VISHRAM) के चलते यहां अब पहले से ज्यादा लोग स्ट्रेसऔर डिप्रेशन के लिए डॉक्टरों की सलाह ले रहे हैं. ये अच्छी बात है क्योंकि देहातीइलाकों में सभी तरह मानसिक दिक्कतों को 'पागलपन' की श्रेणी में रख दिया जाता है औरइसके लिए बहुत कम लोग डॉक्टरी इलाज कराते हैं. लेकिन टैबू अब टूट रहे हैं. खुदकुशीका आंकड़ा कुछ कम हुआ है और अब लोग अपनी परेशानियों को लेकर डॉक्टर से मिल रहे हैं.पिछले एक साल में आया बदलाव'इंडियन एक्सप्रेस' के हवाले से खबर है कि ये पहली बार हुआ है कि विदर्भ में कोईप्रोग्राम सुसाइडल बिहेवियर को कम करने में सफल होता नज़र आ रहा है. ख़ास बात ये भीहै कि इस प्रोग्राम में लोगों की मदद ज़्यादातर छोटी-छोटी ग्रुप मीटिंग्स के ज़रियेकी गई. हज़ार के लगभग मीटिंग्स में लोगों ने जाना कि डिप्रेशन एक समस्या है जिसेछुपाना नहीं चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. किसानों की ख़ुदकुशी के मामलों में अमरावती का हाल विदर्भ और मराठवाड़ा के उन 14जिलों में सबसे खराब था जहां इस तरह के सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं. साल 2015में विदर्भ में 1541 मामले सामने आए जिनमें से 1179 सिर्फ अमरावती से थे. लेकिन अबस्थिति धीरे-धीरे सुधर रही है. अमरावती का उदाहरण इसलिए खास है, कि इस मॉडल पर चलके बाकी जगह भी ऐसे किसानों की मदद की जा सकेगी जो मौसम और सरकार की मार के चलतेमौत को चुन लेते हैं.ये सारी मेहनत विदर्भ स्ट्रेस एंड हेल्थ प्रोग्राम (VISHRAM) के तहत 'प्रकृति' और'संगत' नाम के दो एनजीओ ने की. ये इस काम में डेढ़ साल से लगे हुए थे जिसके लिएइन्हें टाटा ट्रस्ट से मदद मिली थी. ये नतीजे 'लैंसेट साइकैट्री' में प्रकाशित हुएहैं.राष्ट्रीय स्तर पर हुए एक सरकारी सर्वे में सामने आया है कि भारत में 2 करोड़ लोगडिप्रेशन से जूझ रहे हैं और उनमें से लगभग 90 फ़ीसदी को पिछले एक साल में कोईडॉक्टरी मदद नहीं मिली है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:किसानों की ख़ुदकुशी दर 42 परसेंट बढ़ी, भाषणों का अचार डालें?हे सरकार! 79 पैसे में तो जहर भी नहीं आता जिसे किसान खा ले