केरल में बीड़ी बनाने वाले लड़के की कहानी जो अमेरिका जाकर जज बन गया
अमेरिका के टेक्सस की कोर्ट में जज बने सुरेंद्रन के. पटेल.

केरल का एक लड़का जो बचपन में बीड़ी के बंडल रोल करता था, वकालत पढ़ता है. फिर सुप्रीम कोर्ट में वकालत करता है. लेकिन पत्नी को अमेरिका में नौकरी मिल जाती है तो वकालत छोड़ विदेश चला जाता है. वहां वकालत नहीं कर पाता तो सेल्समैन बन जाता है. लेकिन कोर्ट से दूरी बर्दाश्त नहीं कर पाया. फिर पढ़ाई और अमेरिका में वकालत शुरू की. और आज ये शख्स टेक्सस की कोर्ट में जज बनकर सब कुछ पीछे छोड़ चुका है. ये रोलरकोस्टर कहानी है सुरेंद्रन के पटेल की जिन्होंने 1 जनवरी को टेक्सस की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में जज के रूप में शपथ ली है. अंग्रेजी मैग्जीन द वीक ने सुरेंद्रन पटेल से बातचीत की है. उनकी संघर्षों की कहानी किसी के भी जीवन को देखने का नज़रिया बदल देगी.
बचपन में बीड़ी बांधीपटेल का बचपन केरल के कासरगोड में बीता. मां-बाप दिहाड़ी मजदूर थे. परिवार में इतनी गरीबी थी कि सुरेंद्रन को खुद भी काम करना पड़ता था. मजबूरी थी, उन्होंने कई जगह काम किया. लेकिन एक दफे उन्हें बीड़ी बांधने का भी काम किया. इस काम में उनके साथ उनकी बहन भी जाती थीं. तब सुरेंद्रन 10वीं क्लास में थे.
लेकिन स्कूल जाने की वजह से काम ज्यादा नहीं कर पाते थे, और पैसे कम मिलते थे. इस वजह से पटेल ने 10वीं में ही स्कूल छोड़ दिया. लेकिन स्कूल छोड़ने के बाद उन्हें ये एहसास हो गया था कि वो सही रास्ते पर नहीं जा रहे हैं. वो वापस स्कूल लौटे. पढ़ाई की. और पास होकर कॉलेज में दाखिला लिया. लेकिन स्कूल के साथ-साथ उन्हें बीड़ी बांधने का काम बंद नहीं किया.
पटेल ने कॉलेज में सब्जेक्ट चुना पॉलिटिकल साइंस. लेकिन काम की वजह से वो कॉलेज में क्लास नहीं अटेंड कर पाते थे. इस बात से उनके टीचर नाराज़ भी रहते थे. एग्ज़ाम के समय के प्रोफेसर ने कम अटेंडेन्स का हवाला देते हुए उन्हें परीक्षा में बैठने से मना कर दिया. पटेल मुश्किल में थे. लेकिन वो नहीं चाहते थे कि वो अपने प्रोफेसर को ये बताएं कि वो बीड़ी बांधते हैं और उनके लिए लोगों में सहानुभूति की भावना आए. इसलिए उन्होंने कहा कि उन्हें परीक्षा में बैठने दिया जाए. अगर वो अच्छे नंबर से नहीं पास हुए तो वो कॉलेज छोड़ देंगे.
लेकिन मेहनत खाली नहीं जाती. पटेल ने कॉलेज में टॉप किया. और अगले पड़ाव के तहत कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया. लेकिन पैसे अब भी उनके पास नहीं थे. पहले साल की पढ़ाई के लिए उन्होंने अपने दोस्तों से पैसे मांगे. लेकिन इस तरीके से भी काम चलने वाला नहीं था. इसलिए उन्होंने एक बड़े बिज़नेसमैन के घर पर काम मांगा. और इस तरह उनकी फीस का इंतजाम हुआ.
1995 में उन्हें डिग्री मिल गई. इसके बाद उन्होंने कर्नाटक की एक कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी. इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की. और करीब 10 साल तक देश की सबसे बड़ी अदालत में कई केस लड़े.
अमेरिका कैसे पहुंचे?शादी के बाद के 2007 में उनकी पत्नी को अमेरिका के एक हॉस्पिटल से अच्छा ऑफर मिला. उस समय दंपति को एक बच्ची थी और पत्नी गर्भवती भी थीं. दोनों ने मिलकर ये फैसला किया कि अमेरिका जाएंगे. पटेल ने अपने अच्छे-खासे वकालत के करियर पर फुलस्टॉप लगाते हुए ह्यूस्टन की फ्लाइट पकड़ ली.
परिवार के अलावा पटेल खाली हाथ थे. उनकी पत्नी की नाइट शिफ्ट लगी तो घर की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गईं. उनकी घर संभाला और बच्चों को भी. पत्नी को पूरा सपोर्ट दिया. लेकिन खाली बैठना उन्हें खल रहा था. इसलिए उन्होंने काम करने की सोची. उन्हें सेल्समैन का काम मिला. भारत की सबसे बड़ी अदालत में 10 साल वकालत करने वाला वकील अब अमेरिका में सेल्समैन के तौर पर काम कर रहा था.
लेकिन ऐसे कब तक चलता. उन्हें काला कोट वापस चाहिए था. उन्होंने अमेरिका में वकालत की संभावना तलाशीं. इसके लिए उन्हें अमेरिकी बार का एग्जाम पास करना जरूरी था. उन्होंने परीक्षा दी. पहली बार में ही पास हो गए. इसके बाद उन्होंने इंटरव्यू देने के लिए कई जगह अप्लाई किया. लेकिन कॉल कहीं से नहीं आई.
फिर भी सुरेंद्रन पटेल ने हार नहीं मानी. उन्होंने अमेरिका की ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल लॉ की पढ़ाई के लिए एडमिशन ले लिया. 2011 में पासआउट हुए. और फिर अमेरिका में वकालत शुरू कर दी. 2017 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता मिल गई. उन्होंने 2020 में पहली बार जज बनने के लिए किस्मत आजमाई. लेकिन तब उन्हें सफलता नहीं मिली. 2022 में उन्होंने एक बार जज बनने की ख्वाहिश जताई. पहली लड़ाई पार्टी के अंदर ही थी. उनको कैंडिडेट बनने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के सीटिंग जज से खुद को बेहतर साबित करना था. उन्होंने कैंपेन चलाया. डेमोक्रेटिक कैंडिडेट बने. और अमेरिका के टेक्सस की अदालत में भारतीय मूल के जज के रूप में खुद को स्थापित किया.
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