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मलेरकोटला की कहानी, जिसकी हिफाज़त का बीड़ा ख़ुद गुरु गोविंद सिंह ने उठाया था

वहां बने 150 साल पुराने पैलेस को बेगम ने पंजाब सरकार को सौंप दिया.

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13 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 13 जनवरी 2021, 06:13 PM IST)
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फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा, जहां पर गुरु गोबिंद सिंह के दो बेटों को जिंदा चुनवा दिया दया था. (फोटो- विकिपीडिया)
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पंजाब का संगरूर जिला. यहां के मलेरकोटला में 150 साल पुराना एक पैलेस है. नाम है- मुबारक मंजिल पैलेस. यहां के आखिरी नवाब थे  नवाब शेर मोहम्मद. इनकी बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इनकी 97 वर्षीय पत्नी बेगम मुनव्वर उल निसा ने इस प्राइवेट प्रॉपर्टी को सरकार के हाथों सौंपा दिया है. अब राज्य सरकार इसे रिडेवलेप और रेनोवेट करेगी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रॉपर्टी के एवज में राज्य सरकार ने बेगम को तीन करोड़ रुपये दिए हैं.  इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब कैबिनेट ने टूरिज़्म के लिए इस महल के अधिग्रहण, संरक्षण और इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है.

AAP नेता अरशद डाली ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि 97 वर्षीय बेगम ने महल सरकार को सौंप दिया है. उनकी कोई संतान नहीं है और न कोई लीगल वारिस. इसलिए उनकी आखिरी इच्छा है कि वो इस महल को पहले की तरह जगमगाते हुए देखें. उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनके जाने के बाद कहीं प्राइवेट पार्टियां इसे हड़प न लें. इसलिए उन्होंने इसे सरकार के हवाले कर दिया.  उधर, पंजाब सरकार के पर्यटन सचिव संजय कुमार ने बताया कि सरकार जल्द ही महल को राज्य का संरक्षित स्मारक घोषित करेगी. उसके बाद इसका रेनोवेशन होगा. उन्होंने बताया कि बेगम ने मांग की थी कि वो अपने अंत समय तक यहीं रहना चाहती हैं. उनकी ये मांग मान ली गई है.

मलेरकोटला  का इतिहास क्या है?

मलेरकोटला पंजाब का एक ऐसा कस्बा है, जहां पर सिखों की आबादी से ज्यादा मुसलमानों की आबादी है. मलेरकोटला दो इलाक़ों को मिलाकर बना है-मालेर और कोटला. द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1454 ईसवीं में मालेर बस्ती सूफी संत शेख सदरुद्दीन सदर-ए-जहान को दी गई थी. उन्हें हैदर शेख के नाम से जाना जाता है. हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, मलेरकोटला की खोज सन 1600 में हुई थी. और मलेरकोटला की रियासत 1657 में अस्तित्व में आई थी. जब हैदर शेख के वंशज, बायजीद खान को मुगलों द्वारा नवाब की उपाधि दी गई थी.

गुरु गोबिंद सिंह और मलेरकोटला का संबंध क्या है?

1705 की बात है. यहां सिखों और मुगलों के बीच कुछ ठीक नहीं था. उस दौरान नवाब थे शेर मोहम्मद खान. सरहिंद के मुगल गवर्नर वज़ीर खान के खिलाफ खड़े होने वाले एकमात्र व्यक्ति, जिन्होंने गुरु गोबिंद सिंह के दोनों बेटों को एक दीवार में जिंदा चुनवाने का आदेश दिया था.  गोबिंद सिंह के बच्चों ने इस्लाम धर्म कबूल करने से मना कर दिया था. एक बेटे की उम्र सात वर्ष और दूसरे की नौ वर्ष थी. नवाब शेर मोहम्मद खान ने रोकने का काफी प्रयास किया था, पर बेटों को बचाया ना जा सका. हालांकि गुरु गोबिंद सिंह नवाब के इतने आभारी थे कि उन्होंने कृपाण मोहम्मद खान को भेंट की थी. और तब से ये जगह मलेरकोटला सिख इतिहास में अमर हो गई. तब से ही सिख समुदाय उनका एहसान मानता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, जहां बेटों ने अपनी जान गंवाई थी. उस जगह पर जो गुरुद्वारा बनाया गया, उसे फतेहगढ़ साहिब के नाम से जाना जाता है. और नवाब शेर खान के सम्मान में मलेरकोटला में साहिब हा का नारा नाम से गुरुद्वारा बनाया गया है.

मलेरकोटला की रक्षा का वादा किया था

नवाब शेर मोहम्माद खान को गुरु गोबिंद सिंह ने कृपाण के साथ आशीर्वाद दिया था कि मलेरकोटला की जड़ें हमेशा हरी रहेंगी. गुरु गोबिंद सिंह ने शेर मोहम्मद खान को वादा किया था कि वो मलेरकोट की रक्षा करेंगे. और 1947 के बाद विभाजन के दौरान जब पंजाब दंगों, लूटपाट, हिंसा, यौन शोषण और सामूहिक हत्याओं से तबाह हो गया था, तब मलेरकोटला दंगों से अछूता रहा. आसपास के क्षेत्रों के सिखों ने निवासी मुसलमानों को आश्वासन दिया कि वे मलेरकोटला में सुरक्षित हैं और उन्हें नए बने पाकिस्तान में पलायन करने और सीमा पार करने की प्रक्रिया में अपनी जान जोखिम में डालने की ज़रूरत नहीं है. यहां के लोगों का विश्वास है कि ऐसा गुरु के आशीर्वाद के कारण हुआ. क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार, 1941 में यहां 38% मुसलमानों की आबादी थी, 34% सिख और करीब 27%  हिंदू थे. ऐसे में किसी भी तरह की साम्प्रदायिक हिंसा ना होना, गुरु गोबिंद सिंह की कही बात की बड़ी वजह है.

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