इसा को नहीं मिला वीज़ा, लेकिन ये बवाल क्या है?
दोल्कुन इसा. चीनी सरकार इसको आतंकी कहती है. इंडिया अपने यहां बुला रहा था. लेकिन फिर कैंसिल कर दिया. क्यूं कट रहा है इसा पर इतना बवाल?
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फोटो - thelallantop
चीन की कहानी है. बेहद अनसुनी. हाल ये है कि वहां भी एक 'कश्मीर' चल रहा है, लेकिन किसी को खबर नहीं है. वहां का कश्मीर माने वो हालात जिनसे हम कितने ही सालों से निपटते आ रहे हैं.पिछले साल, चीन में तीन मुस्लिम स्टूडेंट्स को रमज़ान के महीने में ज़बरदस्ती खाना खिलाया गया. काम उनके प्रोफ़ेसर का था. प्रोफ़ेसर का कहना था कि वो इस कोशिश में थे कि वो बच्चे भूखे ने मर जायें. हालांकि चीन की गवर्नमेंट कहती है कि वहां अपने धर्म को फॉलो करने की छूट है. लेकिन देखने से तो कुछ और ही लगता है. शियानजिंग में चीन की सरकार ने अपने सभी सरकारी अधिकारियों, स्टूडेंट्स, टीचर्स को रमज़ान में रोज़ा रखने से साफ़ मन कर दिया गया था.

आते हैं कि ये शियानजिंग का मसला है क्या? शियानजिंग चीन के उत्तर-पश्चिम हिस्से में बसा एक प्रान्त है. इसके बॉर्डर कई मुस्लिम देशों से मिलते हैं. इन देशों में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, तज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, कज़ाकिस्तान शामिल हैं. इस हिस्से में टर्की के मुस्लिम कबीले के लोग रहते हैं. ये सभी इस्लाम धर्म को मानते हैं. ये लोग यहां सैकड़ों सालों से रह रहे हैं. और तो और, कहा ये भी जाता है कि ये सभी इस क्षेत्र में रहने वाले सबसे पहले लोगों में से एक हैं.
साल 2001 में अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया. इस हमले के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथी कैम्पों में तमाम शियानजिंग और उइहुर से आने वाले मुस्लिम लोग शामिल मिले. यहां से इस जगह के मुस्लिमों का लाइमलाइट में आना शुरू हुआ. यहां से लोगों को इनके बारे में मालूम चला. लोगों को ये मालूम चला कि ऐसे भी लोग कहीं किसी कोने में मौजूद हैं.
अमरीका के अफ़ग़ानिस्तान पर हमले से इस एरिया में भी इस्लामिक कट्टरपंथ की ओर लोगों का रुझान बढ़ा. इसी साल में ही चीनी सरकार ने इन लोगों की हिंसा पर लगाम कसने की सोची. और पिछले 15 सालों से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है.

Congressional executive commission on China ने कहा कि "Both (the Chinese) government and private sectors had discriminatory hiring practices against the Ulighurs and also denied them religious rights such as observing Ramadan and allowing Muslim men to wear Beards and women to wear veils."

One of the Chinese youth injured in a Muslim clash in Xinjiang
हालांकि ऊपर ऊपर से चीनी सरकार का यही कहना है कि वो देश में सभी धर्मों को बराबर स्थान देती है. उइहुर मुस्लिम से कम्पेयर किया जाए तो मालूम चलेगा कि चीन में ही रहने वाले ह्व़े मुस्लिम ज़्यादा आज़ादी और खुशहाली से रहते हैं. उन्हें जो सुविधायें, आज़ादी और छूट मिलती है, वो उइहुर मुस्लिम से कहीं ज़्यादा और सहनीय है.
इन्हीं उइहुर मुस्लिमों का मसीहा बनकर उभरे हैं दोल्कुन इसा. ये उइहुर डेमोक्रेसी के ऐक्टिविस्ट हैं जो शियानजिंग उइहुर ऑटोनोमस रीजन से आते हैं. ये चीन के अंडर है. इसे पूर्वी तुर्किस्तान भी कहते हैं. फिलहाल दोल्कुन वर्ल्ड उइहुर कांग्रेस के सेक्रेटरी हैं.

चीन की सरकार का कहना है कि इसा पूर्वी तुर्किस्तान लिबरेशन आर्गेनाइजेशन के वाईस चेयरमैन हैं. इससे इसा साफ़ इनकार करते आये हैं. चीन की इस बात की वजह से चीन ने इंटरपोल को रेड नोटिस जारी की हुई है. वो बात अलग है कि जर्मनी और उन तमाम देशों ने इस नोटिस पे कार्रवाही करने से इनकार कर दिया है जिनमें इसा शरण ले चुके हैं. इसा चीन की वांटेड लोगों की लिस्ट में 2003 से हैं.
इसा चीन सरकार की हरकतों से तंग आकर 1997 में चीन से भागकर यूरोप चले गए. 2006 में उन्हें जर्मनी ने अपनी नागरिकता दे दी.
22 अप्रैल 2016 को इंडिया ने इसा को विज़िटर्स वीज़ा इश्यू कर दिया. इसा धर्मशाला में एक कांफ्रेंस अटेंड करना चाहते थे. इससे चीनी सरकार काफी नाराज़ हुई. इसे इस तरह से लिया गया मानो इंडिया जान बूझकर चीन को उकसाना चाहती हो. क्यूंकि इससे पहले इंडिया एक बार इसा को वीज़ा देने से इनकार कर चुकी है. माना जा रहा था कि मसूद अज़हर को आतंकी घोषित करने में चीन का साथ न मिलने पर इंडिया ने बदले की भावना से ऐसा किया. खैर, जो भी हो, इंडियन गवर्नमेंट ने 25 अप्रैल 2016 को इसा को दिया वीज़ा वापस ले लिया.

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