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इस CEO का कहना है कि बच्चे इंटर्नशिप करने के 40 लाख रुपये दे डालें! क्यों? मत पूछिए

सलाहकार का नाम है, चेत कपूर. जेनरेटिव AI कंपनी ‘डेटास्टैक्स’ के अध्यक्ष और CEO. कोलकाता में जन्मे और सिलिकॉन वैली में इतने समय से हैं कि वहां की चाय टपरियों पर इनका खाता चलता होगा. साल 1986 में उन्होंने स्टीव जॉब्स की सॉफ़्टवेयर कंपनी NeXT से काम शुरू किया था और चार दशकों में वो API मैनेजमेंट कंपनी के CEO बन गए.

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40 लाख देना है, तो देना है. (फ़ोटो - 'हेरा फेरी' फ़िल्म का सीन)
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सोम शेखर
24 मई 2024 (अपडेटेड: 24 मई 2024, 06:22 PM IST)
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पूंजीवाद के पुरोधाओं में सबसे बड्डे अमीरों की गिनती की जाती है. हालांकि, थियरी के हिसाब से ये गणना सही नहीं है. सही-ग़लत पर समय नहीं बर्बादेंगे. वर्ल्ड इज़ नॉट अ फ़ेयर प्लेस कहकर आगे बढ़ेंगे. स्टीव जॉब्स पुरोधाओं की गिनती में आएंगे. किसी भी लिहाज़ से. उनके एक इंटर्न हुए, जो अब ख़ुद CEO हैं. CEO के इंटर्न भी CEO, CEO के मालिक भी CEO. बोलो कितने CEO? फिलहाल एक. उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था के ‘सुखभोगी दलदल’ में उतरने वाले कॉलेज के मेधावी छात्र-छात्राओं के नाम एक सलाह जारी की है: काम के लिए बड़ी कंपनियां न खोजो, क़ायदे के लोग खोजो और उनके साथ काम करो. बात जम तो रही है. मगर दही को भी ज़्यादा जमा दो, तो खट्टी हो जाती. ये तो फिर भी बात है. उन्होंने ज़्यादा जमा दी. कह दिया कि अच्छे लोगों के साथ काम करने के लिए पैसे भी देने पड़ें, तो दे दो.

काम भी करो? पैसे भी दो?

सलाहकार का नाम है, चेत कपूर. जेनरेटिव AI कंपनी ‘डेटास्टैक्स’ के अध्यक्ष और CEO. कोलकाता में जन्मे और सिलिकॉन वैली में इतने समय से हैं कि वहां की चाय टपरियों पर इनका खाता चलता होगा. साल 1986 में उन्होंने स्टीव जॉब्स की सॉफ़्टवेयर कंपनी NeXT से काम शुरू किया था और चार दशकों में वो API मैनेजमेंट कंपनी के CEO बन गए. इस कंपनी को 2016 में गूगल ने पांच हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा में ख़रीदा था.

चेत ने हाल ही में CNBC के प्रोग्राम 'मेक इट' में इंटरव्यू दिया. अपनी जर्नी के बारे में बताया. कहा कि जॉब्स को ऑब्ज़र्व करने से उनकी लीडरशिप स्किल्स में धार आई.

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यही वजह है कि वो नौकरी के अभ्यार्थियों को सलाह देते हैं कि बड़े नाम वाली कंपनियों के पीछे भागने से कुछ नहीं होगा. बड़ी शख़्सियत की तरफ़ बढ़ने में असल फ़ायदा है, जिनसे सीखा जा सके.

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सीधी बात: काम और कंपनी उन्नीस चलेगी, लोग बीस होने चाहिए. यहां तक तो बात माकूल मालूम पड़ती है, मगर... यहीं से वो बह जाते हैं. उनका कहना है कि धाकड़ लोगों के साथ काम करने के लिए अगर पैसे भी लगें, तो दो.

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50,000 अमेरिकी डॉलर = 41,56,675 रुपये. इकतालीस लाख छप्पन हज़ार छह सौ पचहत्तर.

इतने साल भर के देने के लिए कह रहे हैं. हालांकि, पता नहीं क्यों ये नहीं कह रहे कि इतने पैसे हों, तो इंटर्नशिप क्यों करनी?

खाते में 41 लाख हों, तो आदमी बेतहाशा हो जाए. निहारी खाए मुरादाबाद में, कभी जाए रामपुर, कभी नैनीताल. कोई काम-वाम नहीं. बाक़ी बुलेट की तैयारी वैसी ही, जैसी ‘प्रकांड विद्वान’ नदीम भाई ने बताई. 50,000 कैश बैग में, दो लाख का चेक जेब में, गाड़ी पर लिखा हो ‘इंटर्न’. फिर आराम से घूमें-फिरें, ऐश करें. 

इंटर्न से काम कराना चाहने वालों ने हमेशा से ये बात कही है कि चलती हुई कंपनी, चलती हुई गाड़ी जैसी होती है. इंटर्न को बैठाने के फेर में गाड़ी स्लो हो जाती है. गाड़ी स्लो न भी हो तो नौसिखियों को सिखाने में अर्थ, समय और पेशेंस लगता है. सीख कर जहाज का पक्षी उड़ भी जाता है, पुनि जहाज पर आवे की गारंटी भी नहीं होती. कई दफा जहाज पर लौट आया पक्षी काम सीखने के क्रम में जहाज के साथ वही कर  देता है, जिसके लिए पक्षी फेमस हैं. ये सब हम नहीं कहते. जार्गनमिश्रित शब्दों में कंपनियों के मन की बात होती है.

ऐसे में इंटर्नों के स्ट्रगल पर ‘पेड इंटर्न’ जैसे शब्द मलहम बन पड़े ही थे कि चेत की चेतना से ये विचार फूटा. किसी समझदार इंसान ने कहा है, ‘इस दुनिया में एक खराब आइडिया के लिए हमेशा पर्याप्त स्कोप होता है.’ चेत के इस आइडिया को अच्छा-खराब आप (या समय) अपने हिसाब से बता सकते हैं लेकिन आइडिया चल निकला तो पढ़ाई पूरी कर इंटर्नशिप के सहारे बाज़ार में आगे बढना चाह रहे इंटर्नों की जेब का क्या होगा. आप बेहतर समझ सकते हैं.  

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