The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • Son becomes professor in NIT Raipur, where his father was a peon

चपरासी बाप का प्रोफेसर बेटा, जो हमारा हीरो है

पापा से कहा, चपरासी की नौकरी छोड़ दो. पापा बोले, तुम इसी इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर बन जाओ तो छोड़ दूंगा. लड़का बन गया.

Advertisement
pic
6 मई 2016 (अपडेटेड: 5 मई 2016, 04:16 AM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
दुखुराम जंघेल NIT रायपुर में चपरासी की नौकरी करते थे. बेटे रेखराम ने 12वीं का एग्जाम दिया था. उसके दो भाई और थे. उसे हमेशा खराब लगता कि तीन बच्चों के होते हुए भी पिता को चपरासी की नौकरी करनी पड़ती है. उसने पिता से कहा, आप नौकरी छोड़ दीजिए. पिता ने भी कह दिया, ठीक है, इसी कॉलेज में प्रोफेसर बन कर दिखाओ. तो मैं नौकरी छोड़ दूंगा. रेखराम ने शर्त मान ली. उसे मालूम तक नहीं था कि ये सब कैसे होगा. पढ़ाई के खर्च कौन उठाएगा. उसे तो बस इतना पता था कि शर्त पूरी करनी है. और पिता को आराम की जिंदगी देनी है. हिंदी अखबार दैनिक भास्कर के लिए ये खबर अमनेश दुबे ने की है. अखबार से हुई लंबी बातचीत में रेखराम ने सुनाई अपने संघर्ष की कहानी.
रेखराम का परिवार राजनंद गांव के संडी गांव का है. घर में तंगी हुई. 16 में से 20 एकड़ जमीन बिक गई. तब रेखराम के पापा दुखुराम गांव छोड़ परिवार के साथ रायपुर आए. और चपरासी की नौकरी करने लगे.
रेखराम ने 12वीं के बाद मेहनत कर भिलाई के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया. एडमिशन मिलना उतना मुश्किल नहीं था जितना फीस भरना. पापा की तनख्वाह से फीस भरना नामुमकिन था. इसलिए रेखराम ने सबसे मदद मांगी. इसी दौरान रायपुर के एक प्रोफेसर ने रेखराम को नौकरी पर रख लिया.
जब तक इंजीनियरिंग पूरी नहीं हुई, रेखराम प्रोफेसर के यहां झाड़ू-पोंछा, बर्तन-कपड़े धोना और खाना बनाने जैसे काम करता रहा. इसी से अपनी फीस भरता रहा.
BE यानी इंजीनियरिंग ख़त्म होने के बाद रेखराम ने एमटेक का एग्जाम दिया. और उसी कॉलेज में उसे दाखिला मिला जिसमें पापा चपरासी था. और कुछ ही सालों में जिसमें वो प्रोफेसर बनने वाला था.
NIT रायपुर में भी पढ़ने का खर्च आना ही था. NIT की फीस भरने के लिए क्लासमेट्स और रूममेट्स के कपड़े धोता, उनके लिए खाना बनाता. कई बार भूखा सो जाता. इसके अलावा सुबह 4 से 8 बजे तक अखबार बांटता था. इन्हीं पैसों से किताबें खरीदता.
एमटेक पूरा हुआ. लेकिन प्रोफेसर बनना खेल नहीं. रेखराम ने एक प्रोफेसर से मदद मांगी. जिन्होंने उसे पीएचडी के लिए तैयार किया. उनके पढ़ाने के बाद रेखराम को ग्वालियर में पीएचडी में एडमिशन मिला. जिसके सहारे उसे एजुकेशन लोन भी मिल गया. रेखराम की पीएचडी 2013 में ख़त्म हुई. रेखराम ने पढ़ाने के लिए जगह-जगह अप्लाई किया. पर असल में तो NIT रायपुर में ही नौकरी चाहिए थी उसे. NIT रायपुर में वेकेंसी नहीं थी. इसलिए रेखराम ने लगभग डेढ़ साल भोपाल के सागर इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में पढ़ाया. 2015 में रेखराम का सिलेक्शन NIT रायपुर में हुआ. असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर जॉइन किया. जब लिस्ट में नाम आया, रेखराम पापा के पास गया और शर्त याद दिलाई. दुखुराम उस वक़्त दुनिया के सबसे खुश पिता रहे होंगे. दुखुराम ने चपरासी की नौकरी छोड़ दी रेखराम पूरे परिवार के साथ कोटा कॉलोनी में रहता है. roadies salute रेखराम एक मिसाल है. उन्हें थोड़ी सी छूट लेकर आप हीरो कह सकते हैं. उनकी कहानी सिखलाती है कि इच्छाशक्ति और मेहनत के दम पर कुछ भी किया जा सकता है.

Advertisement

Advertisement

()