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'डेड' फौजी की फिल्मी स्टोरी, चोट से गई मेमोरी चोट से वापस आई

7 साल पहले एक्सीडेंट हुआ था. फौज ने मरा बताकर घरवालों की पेंशन बांध दी. लेकिन वो लौट आया है.

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Image: PTI
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आशुतोष चचा
16 जून 2016 (Updated: 15 जून 2016, 04:11 AM IST)
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आओ तुमको वो किस्सा बताते हैं जिसको कहोगे कि ये फिल्मी है. लेकिन असल में वैसा हुआ है. सात साल पहले सन 2009 में एक आर्मी जवान खो गया था. तीन साल नहीं मिला तो आर्मी ने उसे 'डेड' घोषित कर दिया. वो लौट आया है भाईसाब. उसी के साथ लौटा है वो फिल्मी किस्सा. उसका एक्सीडेंट हो गया था. याददाश्त चली गई थी. फिर एक्सीडेंट हुआ. याददाश्त वापस आ गई. अब शुरू से शुरू करते हैं. जैसा कि फौजी के भाई राम निवास ने अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया. धरमवीर सिंह है उस फौजी का नाम. अब उसकी उम्र 39 साल है. 2009 में 66 आर्मर्ड रेजीमेंट देहरादून में तैनात था. एक दिन मिलिट्री की गाड़ी लेकर चकराता रोड पर जा रहा था. साथ में दो और लोग थे. अचानक एक डिवाइडर पर भयंकर एक्सीडेंट हो गया. गाड़ी उलट गई. तो बाकी के दो लोग तो वापस आने में कामयाब हो गए. लेकिन धरमवीर का कुछ पता नहीं चला. तीन साल बाद फौज के नियम के तहत मान लिया गया कि धरमवीर की मौत हो गई. उनकी फैमिली को पेंशन बांध दी गई. उनकी पत्नी ने पति की सलामती के लिए व्रत रखने चालू किए, जो कभी बंद नहीं हुए. dharamvir singh पिछले हफ्ते उनके घर पर आधी रात को किसी ने ठक-ठक किया. फौज के रिटायर्ड सुबेदार हैं कैलाश यादव. धरमवीर उनका बेटा है. कैलाश ये सोच के उठे कि कोई दारूबाज बेवड़ा आया है. चल के हौंका जाए. दरवाजा खोलकर देखा तो अपना खोया हुआ बेटा खड़ा है. फिर तो भैया क्या सीन बना ये पूछो मत. खुशी के मारे किसी के आंसू बंद नहीं हो रहे थे. धरमवीर ने अपने खोने और वापस आने की पूरी कहानी बताई. 2009 के बाद जो हुआ उनको ज्यादा कुछ याद नहीं. हरिद्वार की सड़कों पर भीख मांगते हुए दिन कट रहे थे. लेकिन तकदीर का भेजा हुआ वो बाइक सवार. जिसने एक दिन सड़क पर टक्कर मार दी. सिर में चोट लग लगी. अस्पताल पहुंचे तो पता चला पुराना सब याद आ गया. बाइक वाले ने उनको पांच सौ रुपए दिए थे. उन पैसों से दिल्ली का टिकट लेकर अपने घर, गांव भिटेड़ा आ गए. जो अलवर के पास है. और इस तरह से ये कुदरत की रची फिल्मी स्क्रिप्ट पूरी हुई.

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