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गुजरात के हॉस्पिटल में औरतों की डिलीवरी का वीडियो देख सिर शर्म से झुक जाता है

क्या गरीब औरत की कोई गरिमा नहीं होती?

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25 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 25 सितंबर 2017, 05:07 AM IST)
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इस समाज में गरीबों का कोई वाली नहीं यही सच है.
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गरीबी अभिशाप है. न जाने कितनी बार ये बात साबित होती रहेगी. ग़ुरबत जो न करवाए थोड़ा है. गरीबी में आत्मसम्मान की, गरिमा की अपेक्षा ही हास्यास्पद लगती है. इस हॉस्पिटल के लेबर वॉर्ड का ये वीडियो देखकर कोई भी नॉर्मल शख्स विचलित हुए बगैर नहीं रह सकता. बच्चा पैदा करना कितनी खूबसूरत घटना है. कितना महत्वपूर्ण पल है औरतों के जीवन का. वही पल अगर शर्मिंदगी का बायस बन जाए तो! हम उस मुल्क में रहते हैं जहां औरत का शरीर खूब परदे में रखने की रवायत है. ऐसे में वही शरीर नग्न हालत में हर आते-जाते शख्स की नुमाइश के लिए उपलब्ध हो जाए, तो कितना बुरा महसूस होता होगा उस औरत को! क्या हमारे अस्पताल जानते भी हैं संवेदनशीलता किस चिड़िया का नाम है?
ये नज़ारा गुजरात का है. उसी गुजरात का, जिसके बारे में कहते हैं कि वहां विकास परमानेंट रहता है. गुजरात का वडोदरा शहर. वही वडोदरा जहां से हमारे प्रधानमंत्री ने चुनाव जीता था. वहां का सर सयाजीराव जनरल हॉस्पिटल. SSG हॉस्पिटल के नाम से फेमस है. इस हॉस्पिटल के डिलीवरी वॉर्ड का नज़ारा किसी भी संवेदनशील आदमी को शर्म से भर देगा. यहां खुले वॉर्ड में महिलाओं की डिलीवरी करवाई जाती है. प्राइवेसी का कोई ख़याल नहीं रखा जाता. ये बेहद इंसल्टिंग है. पर गरीब आदमी के मान-अपमान की फ़िक्र करता कौन है इस मुल्क में?
हमारी एक दोस्त है. पूजा धोड़पकर. वडोदरा में दिव्य भास्कर अख़बार के लिए काम करती है. पूजा ने इस वॉर्ड का स्टिंग ऑपरेशन किया. अपने मोबाइल से चुपके से यहां चल रही बेशर्मी का वीडियो बना लिया. वीडियो इतना डिस्टर्बिंग है कि हमें उसे कई जगह ब्लर कर देना पड़ा. देखिए वीडियो:

और भी है धांधलियां

SSG सरकारी हॉस्पिटल है. फ्री में डिलीवरी होती है. ज़ाहिर है यहां भर्ती होने वालों में गरीब तबके की औरतों की ही भरमार होती है. और गरीब आदमी तो इस देश में किसी सम्मान के लायक होता ही कब है! औरतें बिना कपड़ों के आसपास के बेड पर पड़ी रहती हैं. डिलीवरी कभी भी हो सकती है. आसपास से लोग गुज़रे जा रहे हैं. मेल इंटर्न, अन्य मरीज़ों के रिश्तेदार, हॉस्पिटल के स्टाफ में शामिल मर्द कर्मचारी, सब. जैसे स्वीपर, चपरासी, वॉर्ड बॉय वगैरह. औरतों की गरिमा का किसी को ख़याल नहीं. इतना भी नहीं कि बेड के इर्द-गिर्द परदे ही लगा लिए जाएं.
ना ही किसी हाइजीन का ध्यान रखा जाता है. न डिलीवरी के वक़्त ग्लव्स इस्तेमाल होते हैं, न किसी साफ़ चादर का इंतजाम होता है. बाकी सेफ्टी मेजर्स का तो कहना ही क्या! डिलीवरी करवाने के लिए एक्सपीरियंस्ड डॉक्टर्स की भयंकर कमी है. ज़्यादातर डिलीवरी तो इंटर्न्स के ही भरोसे है. SSG मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट्स ही करते हैं. मरीज़ को तभी अटेंड किया जाता है, जब डिलीवरी का वक़्त बिल्कुल नजदीक आ चुका हो. तब तक औरतें लावारिस सी पड़ी रहती हैं. सबकी नज़रों के सामने. शर्मिंदगी के एहसास में डूबते-उतरते.
पूजा ने मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों से बात की. पता चला कि स्टाफ का रवैया बेहद बदतमीज़ी भरा होता है. किसी भी शिकायत पर डांट दिया जाता है. किसी और हॉस्पिटल में जाने को बोला जाता है. ज़ाहिर सी बात है गरीब औरतों को अपमान का घूंट पीकर चुप हो जाना पड़ता है. ये भी पता चला कि अक्सर डिलीवरी के लिए नॉर्मल लेबर पेन स्टार्ट होने का इंतज़ार नहीं किया जाता. लेबर पेन के लिए जबरन इंजेक्शन भी दे देते हैं अक्सर.

औरतों की आपबीती सुन कर अफ़सोस होता है, गुस्सा भी आता है

पूजा ने एक महिला से बात की जिसने हाल ही में एक लड़के को जन्म दिया था. उसने बताया कि उस जैसे लोग किसी शिकायत की सोच भी नहीं सकते. उन्हें डर रहता है कि अस्पताल वाले निकाल न दें. पूजा के ये कहने पर कि आप शिकायत क्यों नहीं करती, उस महिला ने जवाब दिया,
"हम गरीब हैं इसलिए बर्दाश्त करना पड़ता है."
बस यही सच्चाई है. गरीब होना सबसे बड़ा जुर्म है हमारे समाज में. कदम-कदम पर समझौता करना पड़ता है. आत्मसम्मान नाम की चीज़ से कभी वास्ता ही नहीं पड़ता.

अस्पताल वाले बेख़बर भी हैं और बेख़तर भी

पूजा ने अस्पताल के प्रशासन से भी बात की. लेबर वॉर्ड के सुपिरिटेंडेंट मिस्टर देवेश्वर को फोन किया. वो बोलें, 'मुझे कुछ नहीं पता, वॉर्ड के हेड गोखले साब से बात करो'. पूजा ने गोखले साहब को फ़ोन लगाया. ये पता चलते ही कि पूजा किस बारे में बात करना चाहती है, उन्होंने मीटिंग में होने की बात कही. बाद में कॉल बैक करने को कहा. लेकिन न तो उनका कॉल आया वापस, न ही उन्होंने पूजा का फोन उठाया. ये रवैया कोई अनोखी बात नहीं है. ज़िम्मेदारी से बचने का सरकारी कर्मचारियों को वैसे भी तगड़ा अभ्यास होता है. और मामला गरीब का हो तो फिर कौन सुनता है? उम्मीद करते हैं पूजा का ये स्टिंग सही जगह पहुंच जाए और इस हॉस्पिटल के निजाम में थोड़ी सी शर्म भरने का कुछ जुगाड़ हो जाए. अपडेट: हमने सुपिरिटेंडेंट राजीव देवेश्वर को फोन किया. उन्होंने हमसे कहा कि उन्होंने एक इंटरनल जांच कमिटी का गठन किया है. वो संबंधित सारे लोगों से मीटिंग करने वाले हैं. उन्होंने हमें आश्वासन दिया है कि वो तमाम ज़रूरी कदम उठाएंगे. 
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