सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सरकार गिराने-बनाने का खेल खत्म कर दिया?
आज बात होगी सुप्रीम कोर्ट में चल रहे. उद्धव बनाम शिंदे केस की.

देश का प्रथम नागरिक कौन? हेड ऑफ़ स्टेट कौन? राष्ट्रपति. वैसे ही सूबे के महामहिम होते हैं गवर्नर.लेकिन आमफ़हमी तो यही है कि राष्टपति या गवर्नर का काम 'सरकारी टाइप' का होता है. लोकभावना में वो बस मूरत मात्र हैं. चूंकि हम अमेरिका की तरह प्रेसिडेंशियल डेमोक्रेसी नहीं, पार्लियामंट्री डेमोक्रेसी हैं, तो राष्ट्रपति-राज्यपाल की ताक़तें और ज़िम्मेदारियां सीमित हैं.संविधान में राष्ट्रपति की लेजिस्लेटिव और एक्ज़िक्यूटिव पावर्स निर्धारित हैं. किसी कार्यक्रम या सम्मान समारोह, या भाषण के दौरान राष्ट्रपति ख़बरों में आते हैं. और, वो कार्यक्रम भी निर्धारित होते हैं.बावजूद इसके हाल के दिनों में कई गवर्नर्स की ख़बरें आईं. ख़ासतौर पर ग़ैर-भाजपा शासित प्रदेशों से. ख़बरें कि गवर्नर और रूलिंग पार्टी के बीच तनातनी चल रही है. कहीं सीएम के चलते भाषण के दौरान वॉक-आउट कर जाने की ख़बरें, कहीं गवर्नर के विवादास्पद भाषणों की ख़बरें. और, इसी टसल के बीच सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी आई है. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि गवर्नरों को राजनीतिक ख़ेमे में नहीं उतरना चाहिए. आज बात सुप्रीम कोर्ट में चल रहे.उद्धव बनाम शिंदे केस की.क्योंकि उसमें की गई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की टिप्पणी, पूरे देश में नजीर के तौर पर देखी जा रही है.
सबसे पहले केस के बारे में जान लीजिए.मामला थोड़ा पेचीदा है, इसलिए थोड़ा धैर्य से समझना होगा.मामला महाराष्ट्र में उद्धव सरकार के गिरने और शिंदे सरकार के बनने से जुड़ा हुआ है.उस वक्त इस प्रकरण के बाद कई सारे संवैधानिक सवाल उठे थे.मसलन सरकार बनाने का आखिरी फैसला कौन लेगा? सदन में स्पीकर या डिप्टी स्पीकर की ताकत कितनी होगी? विधायकों की सदस्यता पर फैसला कौन लेगा? चुंकि मामला संवैधानिक था, तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
इससे जुड़ी कुल 5 याचिकाएं लगीं.
1.>सबसे पहली याचिका है शिंदे गुट से. डिप्टी स्पीकर ने विधायकों को जो बर्ख़ास्तगी नोटिस जारी की थी, उसके ख़िलाफ़. और भारत गोगावाले और बाक़ी 14 शिवसेना विधायकों ने डिप्टी स्पीकर को बरक़रार रखने की जो मांग की है, उसके ख़िलाफ़ है.
2.>दूसरी याचिका है शिवसेना के पूर्व मुख्य विप सुनील प्रभु की. राज्यपाल कोश्यारी ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत साबित करने का निर्देश दिया था. सुनील प्रभु की याचिका इसी के ख़िलाफ़ है.
3.>तीसरी याचिका भी सुनील प्रभु की है. राज्यपाल ने शिंदे गुट के एक विधायक को विप बना दिया था, जिसके बाद ठाकरे गुट ने आपत्ती जताई थी. इसमें एक ज़रूरी बात है कि इससे ठाकरे-ख़ेमे पर आगे भी असर पड़ेगा. 'असली शिवसेना' कौन है, इस बहस में शिंदे गुट को फ़ायदा हो जाएगा क्योंकि विप उनका आदमी है.
4.>चौथी पेटिशन है शिवसेना के महासचिव सुभाष देसाई की, जिसमें एकनाथ शिंदे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने के लिए आमंत्रित करने के महाराष्ट्र के राज्यपाल के फ़ैसले को चुनौती दी गई है. और, विधानसभा की आगे की कार्यवाही को चुनौती देते हुए कहा कि ये 'अवैध' है.
5.>पांचवी याचिका है उद्धव खेमे के 14 विधायकों की. स्पीकर ने दसवीं अनुसूची के तहत उनके ख़िलाफ़ जो अयोग्यता की कार्यवाही शुरू की, उसको चुनौती देने वाली याचिका.
कई दिनों से इन सब पर सुनवाई चल रही है. सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को भी सुनवाई हुई.CJI डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस कृष्णा मुरारी, जस्टिस हेमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच मामले की सुनवाई कर रही है.
मगर यहां एक पेच है.इन पांचों केस का फैसला तब होगा, जब सुप्रीम कोर्ट अपने ही दिए एक पुराने फैसले की वैधानिकता तय कर लेगा.क्या है वो फैसला?
नबाम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर केस (2016), ये केस अरुणाचल प्रदेश में उपजे उस वक्त के संवैधानिक संकट से जुड़ा था.इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि अगर स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को हटाने का नोटिस विधायकों ने दे दिया है तो स्पीकर या डिप्टी स्पीकर विधायकों की दलबदल कानून के तहत अयोग्यता तय नहीं कर सकते.ये फैसला क्यों महाराष्ट्र मामले के बीच फंसा है? इसमें सुप्रीम कोर्ट को क्या तय करना है.पहले इंडिया टुडे के लिए लीगल मामले कवर करने वाली संवाददाता से नबाम रेबिया वर्सेज डिप्टी स्पीकर केस की बारीकी को समझ लीजिए.और ये भी सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में क्या तय करना है?
अब सारा पेंच यहीं पर फंसा है.महाअघाणी सरकार पर संकट के वक्त डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल उद्धव गुट के साथ थे.और उनका विधायकों की सदस्यता रद्द करना मान्य नहीं हुआ था.क्योंकि विधायकों ने उनको ही हटाने का नोटिस दे दिया था.इसीलिए नबाम रेबिया वर्सेज डिप्टी स्पीकर फैसले को चुनौती देते हुए उद्धव गुट ने फैसले को गलत बताया था, जबकि शिंदे गुट फैसले के साथ खड़ा है.
उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट की दलीलों के बाद महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें देना शुरू किया कहा,
गठबंधन दो प्रकार के होते हैं - चुनाव से पहले किया हुआ गठबंधन और चुनाव के बाद हुआ गठबंधन.
चुनाव के बाद किया हुआ गठबंधन आमतौर पर मौक़ापरस्ती है. अंक-गणित को साधने के लिए किया जाता है,
लेकिन चुनाव से पहले किया गया गठबंधन सैद्धांतिक है. भाजपा और शिवसेना के बीच चुनाव-पूर्व गठबंधन था.
जब आप वोटर के सामने जाते हैं, तो आप एक व्यक्ति के रूप में नहीं जाते. उम्मीदवार के तौर पर जाते हैं, जो अमुक राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है. जो जाकर कहता है कि ये हमारा साझा विश्वास है, हमारा एजेंडा है. मतदाता व्यक्तियों के लिए नहीं, बल्कि उस विचारधारा या राजनीति के लिए वोट करता है, जिसे पार्टी प्रोजेक्ट करती है. हम 'हॉर्स ट्रेडिंग' शब्द सुनते हैं. यहां, अस्तबल के नेता यानी उद्धव ठाकरे ने उन लोगों के साथ सरकार बनाई, जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने चुनाव लड़ा. यानी कांग्रेस और एनसीपी. और, मतदाताओं ने इनके ख़िलाफ़ वोट दिया.
इस पॉइंट पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने टोका, चूंकि दलील राज्यपाल के वकील के तरफ से आयी थी.तो CJI ने कहा
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वो केवल इस बात पर तर्क दे रहे हैं कि नबाम रेबिया का वर्डिक्ट सही निर्णय था. दो संवैधानिक अधिकारों के बारे में भी बात कही. निर्वाचित व्यक्ति यानी विधायक की अभिव्यक्ति की आज़ादी और विवेक का अधिकार. उन्होंने कहा कि -
इस मौक़े पर उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वक़ील कपिल सिब्बल ने बीच में कहा कि 'राज्यपाल ये सब कैसे कह रहे हैं? या तो उनके बयान को राज्यपाल की दलील के रूप में दर्ज किया जाए. तब हम इसे स्वीकार करेंगे.'
इस पर तुषार मेहता ने कहा कि ये राज्यपाल के नहीं, उनकी प्रस्तुतियां हैं. इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा-
पीठ ने हस्तक्षेप किया और मेहता को अपनी दलील समेटने के लिए कहा, SG मेहता ने आगे कहा-
सभी पक्षों को सुनने के बाद 16 फरवरी यानी आज फिर से सुनवाई हुई और कोर्ट ने अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया.अब फैसला किसके पक्ष में होगा ये तो आने वाला वक्त बताएगा.मगर फैसले के दौरान दी गई दलील और टिप्पणी से राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठ गए.बतौर महाराष्ट्र के राज्यपाल के तौर पर भगत सिंह कोश्यारी का कार्यकाल विवादों में रहा था.
आपको याद हो तो बीते हफ्ते ही 12 राज्यों में गवर्नर बदले गए.कइयों का तबादला हुआ तो एक व्यक्ति का इस्तीफा भी हुआ है.वो भगत सिंह कोश्यारी ही थे.
तत्कालीन राज्यपाल से तल्खी का अंदाजा इसी बात से लगाइए.कि गवर्नर कोश्यारी के इस्तीफ़े पर पूर्व सीएम उद्धव ने कहा कि ये महाराष्ट्र की जीत है.
भगत सिंह कोश्यारी RSS के पुराने स्वयंसेवक हैं और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. सितंबर 2019 में भगत सिंह कोश्यारी ने महाराष्ट्र के गवर्नर का कार्यभार संभाला. तभी से कोश्यारी की टिप्पणियां तीख़ी चर्चाओं के घेरे में है. महाराष्ट्र के तात्कालिक विपक्ष और पूर्व-सत्तारूढ़ महा विकास अगड़ी गठबंधन जिसमें कांग्रेस, एनसीपी और शिव सेना के उद्धव ठाकरे का गुट शामिल है, उन्होंने अलग-अलग मौक़ों पर कोश्यारी की टिप्पणी की भरसक आलोचना की है. पहले उनसे जुड़ी कुछ कॉन्ट्रोवर्सी बता देते हैं.
मार्च, 2022. पुणे में सावित्रीबाई फुले की मूर्ति के अनावरण का मौक़ा था. भाषण देते हुए कोश्यारी ने ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के बाल-विवाह पर टिप्पणी कर दी. दोनों के विवाह का उपहास उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि जब उनका विवाह हुआ था, तब ज्योतिबा फुले 13 वर्ष के थे और सावित्रीबाई फुले 10 की थीं. मंच से ही हंसते हुए पूछ लिया कि उस वक़्त दोनों क्या ही सोच रहे होंगे. दूसरा मौक़ा औरंगाबाद का. पिछले साल नवंबर में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राज्यपाल का भाषण था. संबोधन में भगत सिंह कोश्यारी ने छत्रपति शिवाजी को 'पुराने युग का नायक' दिया. और, कहा था कि आज के हीरो तो नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस ही हैं. विपक्ष बुरा भड़क गया. ख़ूब हेडलाइनें बनीं.
जुलाई 2022 में कोशियारी ने बयान दिया था कि अगर गुजराती और मारवाड़ी राज्य का हिस्सा न होते, तो मुंबई देश की वित्तीय राजधानी नहीं होती. बरहाल ऐसी टिप्पणियों और उनपर आ रही प्रतिक्रियाओं को देखकर महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक बैठे सब भाजपा नेताओं ने भी कोश्यारी से पल्ला झाड़ लिया. ये कहकर कि उनकी निजी राय हो सकती है. महाराष्ट्र के महा विकास अगड़ी गठबंधन और भगत सिंह कोश्यारी के बीच विवाद पुराना है. कोश्यारी वही गवर्नर हैं, जिन्होंने तड़के देवेंद्र फडणविस और अजित पवार की शपथ करवाई थी. हालांकि, वो सरकार ज़्यादा चली नहीं और शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने जल्द ही सरकार बना ली थी. कोविड के समय भी भगत सिंह कोश्यारी ने मौजूदा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को धार्मिक संस्थानों को फिर से खोलने के मुद्दे पर पत्र लिखा था और पूछा था कि क्या ठाकरे धर्मनिरपेक्ष हो गए हैं? राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का धर्मनिरपेक्ष पर सवाल पूछना, अपने आप में सवालों के घेरे में आ गया.इस प्रकरण ने पार्टी और गठबंधन के कई नेताओं को नाराज किया था. फिर एक विवाद है कार्यवाही को लटकाने का. महाराष्ट्र कैबिनेट ने विधान परिषद के लिए मनोनीत होने वाले बारह नेताओं की एक लिस्ट पेश की थी. राज्यपाल कोश्यारी ने बहुत समय तक लिस्ट पर सहमति नहीं दी थी. ऐसे में ये सवाल तो उठने लगा है कि आखिर राज्यपाल की शक्तियां क्या हैं ?
केंद्र के भेजे राज्यपालों की तरफ से विपक्ष की राज्य सरकारों से टशन लेने का लंबा इतिहास है.बूटा सिंह, रोमेश भंडारी,सैय्यत सिब्ते रजी, हंसराज भरद्वाज जैसे कांग्रेस के जमाने के राज्यपालों की भी लंबी फेहरिस्त रही है.अगर अभी आपको फिलवक्त के राज्यपालों का नाम गिनाने को कह दिया जाए तो आप अपने राज्य का छोड़कर बाकी का शायद ही बता पाएं.मगर राज्यपाल शब्द कानों में गूंजते ही, जगदीप धनखड़, भगत सिंह कोश्यारी, विनय सक्सेना, नजीब जंग जैसे नाम जहन में आने लगते हैं.गलती आपकी नहीं है. भारत में सारे सूबों के राज्यपाल महामहिम ही होते हैं, लेकिन कुछ का ज़िक्र आप तक पहुंचता है, कुछ का नहीं. ज्यातादर उन्हीं राज्यों के राज्यपाल के बारे में जानते हैं, जो गैर बीजेपी शासित राज्यों में नियुक्त हैं या रहे हैं.
तो साफ है, झंडे का रंग बदल गया, लेकिन महामहिमों के काम करने का तरीका नहीं बदला. बार बार केंद्र की तरफ से राज्यों में दखल देने की कोशिश हुई. आप इसे ''चलता है'' या ''सबने किया'' कहकर खारिज नहीं कर सकते. अगर ऐसे चला, तो फिर संघीय ढांचे का क्या मतलब रह जाता है. क्या एक बड़ी सरकार, दूसरी सरकार को सिर्फ इसलिए परेशान कर सकती है, कि वो आकार या ओहदे में छोटी है? जबकि जनता ने तो दोनों को ही चुना है.आज सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने राज्यपालों की भूमिका को लेकर एक बड़ी लकीर खींच दी है.कितना अमल होगा, ये वक्त ही बताएगा.
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