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शत्रुघ्न सिन्हा ने इस बार नरेंद्र मोदी-अमित शाह की तगड़ी मौज ली है

शॉटगन अभी तक सिर्फ ट्वीट करते थे, इस बार बम मारा है.

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28 जून 2018 (अपडेटेड: 28 जून 2018, 01:01 PM IST)
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शत्रुघ्न सिन्हा
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25 जून 2018 को राजस्थान में बीजेपी के कद्दावर नेता घनश्याम तिवाड़ी ने इस्तीफा दे दिया. 6 मई 2017 को बीजेपी की केंद्रीय अनुशासन समिति ने उन्हें अनुशासनहीनता पर कारण बताओ नोटिस जारी किया था. नोटिस में तिवाड़ी पर पार्टी-विरोधी गतिविधि करने, पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करने और समानांतर संगठन खड़ा करने के आरोप थे. तिवाड़ी ने आर-पार वाले लहज़े में जवाब दिया कि सूबे के भ्रष्ट पार्टी नेतृत्व के आगे न झुकेंगे, न पीछे हटेंगे. तिवाड़ी की अहमियत इस बात से समझिए कि वो राजस्थान में बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं.


घनश्याम तिवारी
घनश्याम तिवारी

वैसे बीजेपी में ये कोई पहला मौका नहीं है, जब किसी नेता ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया हो. पीछे क्या जाना, अभी के वक्त में देख लीजिए. कीर्ति आजाद से लेकर सावित्रीबाई फुले और यशवंत सिन्हा तक. कई सूरमा भरे हैं. पर एक नाम इन सबसे भी ऊपर है. शत्रुघ्न सिन्हा.

बिहार की पटना साहिब सीट से सांसद शत्रुघ्न लंबे वक्त से अपनी पार्टी की किरकिरी कराते आ रहे हैं. वो सांसद ज़रूर हैं, लेकिन न तो उन्हें मंत्रीपद दिया गया और न ही उनकी पार्टी में सुनवाई होती है. कम से कम उनके बयानों से तो यही ज़ाहिर होता है. ऐसे में वो हर कुछ दिनों में कमल के नीचे बिछा कीचड़ सतह पर लाते रहते हैं. मज़े की बात ये है कि इतने के बावजूद पार्टी न तो उनके खिलाफ कोई एक्शन लेती है और न ही किसी तरह का नोटिस जारी करती है.

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28 जून को दैनिक भास्कर में शत्रुघ्न सिन्हा का एक इंटरव्यू छपा, जिसमें उन्होंने फिर मुखर होकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बीजेपी को नसीहतें दी हैं. जानिए इस इंटरव्यू की खास बातें:

- पिछली बार भी मुझे सबसे आखिर में टिकट दिया था. इस बार नहीं देंगे, तो उफ न करूंगा. अपने लिए मिनिस्ट्री की बात भी नहीं करता.

- 2019 में UPA का रौद्र रूप दिखाई देगा, इसलिए 'संपर्क फॉर समर्थन' नहीं, 'संपर्क फॉर समर्पण' होना चाहिए. अपने अहंकार, तेवर एक तरफ रखो और जाओ आडवाणीजी के चरणों में. वे पिता-तुल्य हैं. उनसे कहो कि हमसे भूल हो गई है. जो अपने लोग हैं. चाहे अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा या हम जैसे लोग. पार्टी में ही हैं न. क्या आपका फर्ज नहीं बनता कि आप ही गले लगा लो. हम मिलने की कोशिश करते हैं, तो आप मिलते नहीं. अब अहंकार से काम नहीं चलेगा.

- अभी मोदी-लहर नहीं है, लेकिन कहूंगा कि अभी मोदी से बढ़िया ऑरेटर, संपूर्ण व्यक्तित्व और कैंपेनर कोई और नहीं है.

- कई बार लगता है कि पार्टी फोरम में बोलें, लेकिन अब तो वहां मीटिंग शाम को शुरू होती है और दूसरे दिन लंच के बाद खत्म. आप बोल ही नहीं पाते. वो जो कहना चाहते हैं, वो सुन लो.

- तेजस्वी तो हमेशा पार्टी में आने के लिए कहते हैं. मीसा कहती हैं कि चाहे जहां से चुनाव लड़ लीजिए. तेज प्रताप भी मुझे प्यारा लगता है. मैं झूठ क्यों बोलूं, लालूजी ने भी कहा है कि आप ही गार्जियन हो.

- मैं नि:स्वार्थ राजनीति के लिए आया था, क्योंकि मैं जानता था कि सत्ता हासिल हो, तो वो सेवा का माध्यम होनी चाहिए, मेवा का नहीं. डिग्री कम-ज़्यादा हो सकती है, लेकिन कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं है.

- आप बिल्ली को ही कमरे में बंद कर दें और रास्ता न दें, तो वो झपट्टा तो मारेगी. मेरी तुलना तो लोग शेर से करते हैं. मैं स्तुतिगान नहीं कर सकता.

- मैं सरकार का नहीं, सिस्टम का आलोचक हूं. मेरी ट्रेनिंग भाजपा में हुई है. अटलजी ने भी तो राजधर्म का पाठ पढ़ाया है. मैं कोशिश करता हूं कि पाठ नहीं पढ़ाऊंगा, इतना बड़ा नहीं हूं. लेकिन आइना दिखाऊंगा.

- मैंने मोदीजी से कहा था कि आपका विशेषाधिकार है, आपने मंत्री नहीं बनाया. कोई बात नहीं. मैं इन चीज़ों से ऊपर निकल चुका हूं. राजनीति में इसलिए नहीं आया था कि मंत्री बनूंगा. जीवन में ढंग का संतरी भी बन जाऊं, तो बड़ी उपलब्धि होगी.

- ये सरकार सोलो डिसीज़न की सरकार दिखती है. 'वन मैन शो' और 'टू मेन आर्मी'. अटल जी की सरकार कलेक्टिव डिसीज़न की सरकार थी.

- दलित तबका हमारे खिलाफ क्यों है? किसान खुदकुशी क्यों कर रहे हैं? नौजवानों से नौकरी का वादा किया था, तो नौकरी कहां है? बाहर घूमने और झूला झूलने से देश को क्या मिला? पहले घर की महिलाएं अच्छी नीयत से पैसा छिपाकर रखती थीं. जोड़कर देखें, तो नोटबंदी से लोगों को दुख पहुंचा है. हमसे कहते हैं कि ये पार्टी का निर्णय था. अगर पार्टी का फैसला था, तो आडवाणीजी, जोशीजी, यशवंत सिन्हा को मालूम होता. लोकशाही में तानाशाही दिखती है, तो दर्द होता है.




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