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जब शम्स खान की बीवी बोलीं - पर स्कूल तो आरएसएस का है.

अच्छी ख़बर!

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4 फ़रवरी 2018 (अपडेटेड: 4 फ़रवरी 2018, 08:25 AM IST)
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Shams
शम्स ताहिर खान

शम्स खान को कौन नहीं जानता? आज तक न्यूज़ चैनल के सबसे जाने माने चेहरों में से एक. क्राइम रिपोर्टर. लेकिन इनका एक चेहरा और भी है, जिससे आपको, हम सब को रूबरू होना बहुत ज़रुरी है. हमारी नज़र जब उनकी फेसबुक वॉल पर पड़ी तो देखा कि उनके कम ही अपडेट्स थे. यानी वो फेसबुक पर कम ही लिखते हैं. फिर हमें ये स्टेट्स दिखा जो ढेर और लोगों ने भी शेयर किया है. हम ये स्टेट्स जस-का-तस आपको पढ़वा रहे हैं. क्यूंकि ये स्टेट्स नहीं एक प्रेरणास्त्रोत है. क्यूंकि अच्छी ख़बरें फैलनी चाहिए. और क्यूंकि, ये एक पति-पत्नी के सफल रिश्ते से पूरे समाज में होने वाले सुखद-परिवर्तन की दास्तां है. ओवर टू शम्स:


अमूमन सोशल मीडिया पर लिखता नहीं हूं.
क्योंकि हमेशा सोचता हूं कि मै क्यों लिखूं और आप क्यों पढ़ें? मैं क्यों कहूं और आप क्यों सुनें? जबकि मैं जानता हूं कि मेरे लिखने-कहने से कुछ बदलने वाला नहीं है. मुझे खुद को लेकर कोई गलतफहमी भी नहीं है. पर एक छोटी सी चीज़ ने आज मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया.
एक रोज़ अचानक मेरी बीवी सावित्री बलूनी ने कहा कि वो नौकरी छोड़ कर कुछ ऐसा करना चाहती है जिससे उन्हें दिली खुशी हो. वो उत्तराखंड के अपने गांव को गोद लेना चाहती थीं. पर शर्त ये थी कि ना कोई एनजीओ खोलेंगी ना किसी से मदद लेंगी. जो करेंगी खुद करेंगी. जर्नलिज्म के बाद वो अच्छा-खासा जर्नलिज्म पढ़ाने का काम कर रही थीं.
सावित्री और शम्स
सावित्री और शम्स

खैर...
इसके बाद मेहनत भरी क़वायद शुरू हुई. उत्तराखंड के बमराडी ग्राम सभा में छोटा और बेहद पिछड़ा गांव है भैंसोड़ा. गांव आना-जाना शुरू हुआ. ऐसे ही एक बार गांव से लौट कर अचानक मुझसे पूछा कि - गांव में एक स्कूल है उसे भी गोद ले लूं क्या?
पर इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता अचानक सवालिया अंदाज़ में बोलीं - ‘पर स्कूल आरएसएस का है.’
पलट कर मैंने बस इतना पूछा और बच्चे? वो गांव के नहीं हैं क्या? गांव के साथ-साथ अब गांव का वो स्कूल भी गोद ले लिया गया.
Shams - 2

स्कूल के बच्चों के लिए धीऱे-धीरे ड्रेस, किताबें, कंप्यूटर खरीदी जिनमें कई दोस्तों ने मदद की. घर में रखे हारमोनियम को नया बनाया. ढोलक खीरदी. सब स्कूल पहुंचा दिया. ताकि बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ संगीत भी सीख सकें. यहां तक कि टीचर के लिए सैलरी का भी इंतजाम किया.
स्कूल के बच्चे खुश थे और वो भी खुश. और मैं इन सबकी खुशी में खुश. फिर एक रोज़ अचानक उसने कुछ तस्वीरें दिखाईं. पहली बार मुझे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था.
साल भर की कड़ी मेहनत का नतीजा उन तस्वीरों में क़ैद था. गांव में 12 शौचालय बन कर तैयार हो चुके थे. एक तस्वीर में एक शौचालय के बाहर गांव की एक बेहद बुजुर्ग महिला को बैठी देख मैं घंटों यही सोचता रहा कि सचमुच अगर इंसान ठान ले तो कुछ भी कर सकता है.
शौचालय के बाहर गांव की एक बेहद बुजुर्ग महिला को बैठी देख मैं घंटों यही सोचता रहा कि सचमुच अगर इंसान ठान ले तो कुछ भी कर सकता है.
'शौचालय के बाहर गांव की एक बेहद बुजुर्ग महिला को बैठी देख मैं घंटों यही सोचता रहा कि सचमुच अगर इंसान ठान ले तो कुछ भी कर सकता है.'
...और उसने ये कर दिखाया.



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