राजद्रोह कानून: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पीएम मोदी की 'बोझ उतारने' वाली बात याद दिला दी
कोर्ट ने सरकार को कानून के पुनर्विचार का काम 3-4 महीने में पूरा करने का निर्देश दिया है.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राजद्रोह कानून (Sedition Law) पर केंद्र सरकार को दोबारा विचार करने के लिए समय दे दिया है. कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि वो इस कानून के लंबित और भविष्य में आने वाले मामलों को लेकर बुधवार 11 मई की सुबह तक हलफनामा दाखिल करे. इससे पहले केंद्र ने भी मांग की थी कि जब तक सरकार इस कानून पर विचार कर रही है, तब तक सुनवाई टाल दी जाए. हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) ने इसका विरोध किया.
Supreme Court suggests Centre to complete the task of reconsideration of sedition law in 3-4 months. SC asks the Centre why it doesn't direct the State governments that matter under 124A be kept in abeyance till the Centre finishes the process of reconsideration.
— ANI (@ANI) May 10, 2022
मंगलवार 10 मई को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने राजद्रोह मामले में अपना पुराना रुख बदलने पर सफाई दी. पहले केंद्र ने कोर्ट में कहा था कि कानून की समीक्षा करने की जरूरत नहीं है. अब इस रुख में बदलाव की जानकारी देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने कहा,
कोर्ट और केंद्र के बीच सवाल-जवाब'राष्ट्रहित और देश की एकता अखंडता को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय कार्यपालिका ने ये नया फैसला लिया है. हालांकि इससे दंड का प्रावधान नहीं हटाया जाएगा. कोई नहीं कह सकता कि देश के खिलाफ काम करने वाले को दंडित ना किया जाए.'
आजतक\इंडिया टुडे से जुड़ीं अनीषा की रिपोर्ट के मुताबिक चीफ जस्टिस एनवी रमना (CJI NV Ramana) की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान सरकार से कई तीखे सवाल पूछे. कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है कि जब तक सरकार इस कानून पर दोबारा विचार करेगी तब तक लोगों के अधिकार की रक्षा कैसे तय होगी. अदालत ने केंद्र को राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार का काम 3-4 महीने में पूरा करने का निर्देश दिया है. CJI एन वी रमना ने सुनवाई टालने से पहले सरकार से पूछा,
'हमारा नोटिस महीनों पहले का है. पहले आपने कहा कि दोबारा विचार की जरूरत नहीं है. अब आपने हलफनामा दिया है. आखिर आप कितना वक्त लेंगे?'
सुनवाई के दौरान सीजेआई रमना ने केंद्र के पिछले हलफनामे के साथ-साथ पीएम मोदी के एक बयान का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने ही 'औपनिवेशिक काल के बोझ को उतारने' की बात कही थी. चीफ जस्टिस ने केंद्र के प्रतिनिधि से कहा,
"हम ये सुनिश्चित करेंगे कि इस मामले में एक गंभीर प्रक्रिया चल रही है. हम ये केस बंद नहीं करने वाले. कई तरह की चिंताएं हैं. एक तो लंबित मामले ही हैं, दूसरा कानून का गलत इस्तेमाल भी चिंता का विषय है. हम कैसे इन सब चीजों से निपटेंगे?"
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया,
'हमने कानूनी आधार पर अपनी बात हलफनामे के जरिए कोर्ट के सामने रख दी है. लेकिन कानून में संशोधन के लिए कितना वक्त लगेगा इस बारे में अभी कोई वादा या भरोसा नहीं दिया जा सकता.'
वहीं याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई टालने पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा,
'राज्यों को कार्रवाई से रोके केंद्र''सरकार इसकी (राजद्रोह कानून की) आड़ ले रही है. जबकि हमने तो IPC के प्रावधान 124A को ही चुनौती दी है. नया संशोधित कानून जो आएगा सो आएगा. हमने तो मौजूदा प्रावधान को चुनौती दी है.'
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून पर दोबारा विचार करने के बीच राज्यों को इसका इस्तेमाल करने से रोकने के लिए दिशानिर्देश देने को कहा है. कोर्ट ने कहा,
'केंद्र, राज्यों को ये निर्देश क्यों नहीं देता कि जब तक वह राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार कर रहा है, तब तक इस कानून के तहत कार्रवाई न करें. केदारनाथ जजमेंट में कानून को हल्का कर दिया गया है, लेकिन फिर भी स्थानीय लेवल पर पुलिस कानून का इस्तेमाल कर रही है और ये तब तक होगा जब तक कि आपका कोई निर्देश नहीं होगा.'
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार देखेगी कि क्या इस संबंध में कोई दिशानिर्देश दिया जा सकता है. उन्होंने कहा,
'भविष्य के लिए हम नहीं जानते कि प्रावधान कैसा होगा. हम पुलिस से दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने के लिए नहीं कह सकते. इस देश के इतिहास में अदालत ने कभी ऐसा आदेश नहीं दिया कि दंडात्मक कानून लागू न किया जाए. लेकिन, मैं इसे लेकर सरकार से बात करूंगा कि क्या कोई दिशानिर्देश दिए जा सकते हैं.'
इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि सरकार कानून पर दोबारा विचार कर रही है, लिहाजा कोर्ट अभी सुनवाई टाल सकता है. वहीं कपिल सिब्बल ने सरकार की इस दलील का विरोध किया. उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत कानून की संवैधानिक वैधता परख रही है. सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही इसलिए नहीं रोकी जा सकती है कि सरकार उस पर विचार करने की बात कर रही है.
याचिका में क्या कहा गया था?राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिका एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा समेत पांच पक्षों की तरफ से दायर की गई थी. इनका कहना है कि आज के दौर में औपनिवेशिक काल के इस कानून की जरूरत नहीं है. बता दें कि चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है. बेंच में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली भी शामिल हैं.
राजद्रोह कानून क्या है?आईपीसी की धारा 124A, जिसके तहत राजद्रोह के मामले दर्ज किए जाते हैं. इसमें लिखा है,
'जो भी लिखित या फिर मौखिक शब्दों, या फिर चिह्नों या फिर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नफरत फैलाने या फिर विधि संगत बनी सरकार के खिलाफ असंतोष को बढ़ावा देता है या इसकी कोशिश करता है, उसे 3 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.'
पिछले साल इस मामले पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा था कि ये औपनिवेशिक कानून है, आज़ादी के आंदोलन को दबाने के लिए बनाया गया था. ये वही कानून है जो गांधी, तिलक को चुप कराने के लिए इस्तेमाल हुआ था. सीजेआई ने पूछा था कि क्या आजादी के 75 साल बाद अब भी ऐसे कानून की जरूरत है.
नोट- हम ये साफ कर दें कि न्यायालय की पूरी कार्यवाही के ब्योरे देना संभव नहीं होता. संक्षेपण किया जाता है. वकीलों की दलीलों और बेंच की टिप्पणियों का क्रम कई बार बना नहीं रह पाता. बावजूद इसके, दी लल्लनटॉप ने उपलब्ध जानकारियों को समेटने की कोशिश की है. दर्शक जानते ही हैं कि कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी होती है. इसीलिए हमने अनुवाद पेश किया है. न्यायालय की कार्यवाही की सटीक जानकारी के लिए न्यायालय से जारी आधिकारिक आदेश (या डॉक्युमेंट) को ही देखा जाए.
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