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सलमान खान बना रहे 300 करोड़ की फिल्म जिसमें हीरो वो नहीं, कोई दूसरा खान है!

कहानी है कोमागाटा मारू की.

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गुरदित्त सिंह 1914 में अपने बेटे के साथ कामागाटा मारू जहाज के पास जब वे वैंकूवर पहुंचे; अक्षय कुमार जो पहले इस विषय वाली फिल्म में गुरदित्त का रोल करने वाले थे; इरफान खान जिनके अब ये रोल करने के चर्चे हैं; सलमान खान जो कामागाटा पर फिल्म प्रोड्यूस कर रहे हैं.
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गजेंद्र
17 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 17 नवंबर 2016, 03:22 PM IST)
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पहले एक कहानी पढ़िए.
कोमागाटा मारू की घटना सन् 1914 में हुई थी. पंजाब के सरहाली गांव में जन्मे गुरदित्त सिंह इसके केंद्र में थे. वे मलेशिया में कारोबार किया करते थे. सम़द्ध थे. भारत, कैनेडा और मलय द्वीप तब ब्रिटिश शासन में आते थे. गुरदित्त एक जापानी जहाज 'कोमागाटा मारू' पर 376 भारतीयों को लेकर कैनेडा के लिए निकले. ज्यादातर यात्री सिख थे. शुरू से आखिर तक सबको बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा. इससे पहले ग़ुलामी के कारण भी लोगों को बुरे मानवीय अनुभवों से गुजरना पड़ा था. अच्छे अवसरों की तलाश में वे कैनेडा जा रहे थे. डेढ़ महीने की समुद्री यात्रा के बाद वे वैंकूवर पहुंचे तो उन्हें तट से दूर ही रोक दिया गया. कैनेडा की पुलिस ने उन पर हमला भी किया जिसका यात्रियों ने बहादुरी से सामना किया. वहां के इमिग्रेशन कानून के मुताबिक सिर्फ उन्हीं को प्रवेश की अनुमति थी जो अपने देश से सीधे टिकट लेकर कैनेडा पहुंचे हों. जबकि ये जहाज हॉन्ग कॉन्ग से होता आया था. करीब दो महीने तक जहाज वहीं अटका रहा.
यात्रियों के लिए यहां एक-एक दिन बहुत कष्ट भरा था. अंत में 20 वापस मुड़ने वाले लोगों, जहाज के डॉक्टर और उसके परिवार को कैनेडा में एंट्री दी गई और बाकी सारे यात्रियों समेत जहाज को जबरदस्ती मोड़ दिया गया. जब कलकत्ता के तट ये जहाज पहुंचा तो वहां ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस भेजी. गुरदित्त और अन्य यात्रियों ने गिरफ्तारी का विरोध किया. पुलिस से एक यात्री की धक्का-मुक्की हो गई और पुलिस ने 19 लोगों को गोली मार दी. गुरदित्त वहां से फरार हो गए. वे अंडरग्राउंड हो गए. बाद में कई बरस बाद गांधी जी के कहने पर उन्होंने आत्मसमर्पण किया और अपनी सजा काटी.
इस घटना ने कैनेडा के आव्रजन कानून में बदलाव की नींव रखी. आज वहां लाखों की आबादी भारतीयों और खासकर पंजाबियों की है. आज वहां के मंत्रीमंडल में भी प्रमुख पोर्टफोलियो में भारतीय है.
कैनेडा के समाज में इस घटना को लेकर हमेशा बहस होती रही. एक आबादी है जो गोरे नस्लभेदियों और दक्षिणपंथियों की है जो आज भी कहते हैं कि उस जहाज के लोग अवैध तरीके से कैनेडा में घुसने की कोशिश कर रहे थे और सरकार ने उन्हें लात मारकर भगाया तो अच्छा किया.
https://youtu.be/8Fu9l-h1SBY?t=35
लेकिन वहीं प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व में बहुत बड़ा समाज ऐसा भी है तो बौद्धिक रूप से विकसित है और अब मानता है कि किसी भी इमिग्रेंट को सम्मान के साथ अपने मुल्क आने और रहने का अधिकार देना जरूरी है. और इसीलिए आज उन्होंने कामागाटा मारू की घटना को अमानवीय माना. जस्टिन ट्रूडो ने कैनेडा की संसद में इस साल स्पष्ट रूप से अपने मुल्क की ओर से उन तमाम यात्रियों और उनके वंशजों से माफी मांगी जिन्हें 1914 में प्रवेश नहीं दिया गया.
https://www.youtube.com/watch?v=gOdrrhqju4Y
कोमागाटा मारू की घटना से कई ऐतिहासिक मायने हैं और बीते कुछ वक्त से इस पर फिल्म बनाने की भी तैयारी हो रही है. कैनेडा में रहने वाली भारत मूल की डायरेक्टर दीपा मेहता काफी वक्त से इस पर बड़ी फिल्म बनाने की तैयारी में थीं. इसमें अक्षय कुमार लीड रोल करने वाले थे. साथ में अमिताभ बच्चन को लेने की बातें थीं. लेकिन अब अक्षय स्टारर ये फिल्म नहीं बन रही.
अब सलमान खान इस कहानी पर फिल्म बनाने जा रहे हैं. करीब 300 करोड़ रुपये के बजट से उनकी कंपनी सलमान खान फिल्म्स और कैनेडा में रहने वाले डॉ. अजय विरमानी की कंपनी इस फिल्म को बनाएंगी. अजय के बेटे विनय विरमानी है जिन्होंने अक्षय कुमार की फिल्म 'स्पीडी सिंग्स' (2011), सलमान द्वारा निर्मित 'डॉ. कैबी' (2014) और डायरेक्टर बिजॉय नांबियार की 'डेविड' (2013) में काम किया है.
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सलमान ने इसे लेकर कहा है, "लॉयन्स ऑफ द सी, कोमागाटा मारू की सच्ची घटना पर आधारित है. ये उन सब लोगों के हीरोइज़्म की कहानी है जो उस जहाज पर थे और जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नस्लभेदी नीतियों को चुनौती दी. इस कहानी को कहना और भी जरूरी हो गया है क्योंकि ये आज के वैश्विक शरणार्थी संकट को प्रतिबिंबित करती है. ये फिल्म हमें बहु-संस्कृति, विविधता और मानवता को गले लगाने की बात कहेगी. ये हमें करीब लाएगी."
इसमें खास रहेगी फिल्म की कास्टिंग. अच्छा ये है कि अब गुरदित्त सिंह जैसे बेहद गंभीर और ऐतिहासिक पात्र में अक्षय कुमार नहीं नजर आएंगे. कहा जा रहा है कि इरफान खान अब ये रोल करेंगे. अभी घोषणा होनी बाकी है. इरफान ने इससे पहले निर्देशक अनूप सिंह की बेहद प्रशंसित फिल्म 'किस्सा' में केंद्रीय सिख पात्र अंबर सिंह का रोल किया था. राजस्थानी पृष्ठभूमि से होने के बावजूद इरफान ने पूरी फिल्म में सिर्फ पंजाबी बोली. ये कहानी बहुत पुराने समय काल में स्थित थी और बावजूद इसके उसी काल की लगी. इसके अलावा इरफान ने 'पान सिंह तोमर' जैसी फिल्म की तो उसमें भी उन्होंने बुंदेली भाषा बोली. साथ ही उस असल पात्र को विशेष पहचान के साथ निभाया.
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गुरदित्त सिंह (बाएं) अपने बेटे और जहाज के अन्य यात्रियों के साथ.

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इरफान ख़ान फिल्म किस्सा में अंबर सिंह के रोल में. लुक्स में वे गुरदित्त जैसे ज्यादा लग सकते हैं न कि अक्षय.

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फिल्म सिंह इज़ ब्लिंग में अक्षय कुमार.

अक्षय ने 'पटियाला हाउस', 'सिंह इज़ किंग', 'नमस्ते लंदन' और 'सिंह इज़ ब्लिंग' जैसी फिल्मों में पंजाबी बोली है, पंजाबी कैरेक्टर किए हैं लेकिन भाषा के अलावा उनके पास कोई एसेट नहीं है. कॉमेडी और एक्शन करने के मुकाबले किसी असल किरदार को निभाना बहुत अलग और जटिल काम है. हाल ही में उन्होंने 'रुस्तम' फिल्म की जो नानावटी मर्डर केस पर आधारित थी. इसमें वे उस पात्र को न तो भाषा के लिहाज से कुछ दे पाए, न ही नए मैनरिज़्म. उनकी मौजूदगी में असल घटना से प्रेरित उनके पात्र को कोई समय काल और ऐतिहासिकता नहीं मिल पाई.
हालांकि कोमागाटा मारू जैसी फिल्म उनके दायरे से बाहर हुई तो ठीक हुआ लेकिन वे एक और बायोपिक कर रहे हैं जो खराब होनी तय है. इस फिल्म में जितनी अच्छी कहानी है और फिल्म कला के लिहाज से जितनी संभावना है वो उनकी कास्टिंग के साथ ही खत्म हो गई है. इस फिल्म का नाम 'गोल्ड' है और इसमें वे हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह का रोल करेंगे. बलबीर आज 92 साल के हैं और परिवार के साथ कैनेडा में रहते हैं.
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बलबीर सिंह सीनियर 1948 में लंदन ओलंपिक गेम्स के दौरान मैच में.

ये फिल्म 1948 में स्थित होगी जब आजाद भारत के तौर पर भारत ने हॉकी में पहला ओलंपिक मेडल जीता था. अक्षय इस फिल्म की रिलीज भी घोषित कर चुके हैं जो 15 अगस्त 2018 की रखी गई है.
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असल जिंदगी पर आधारित रोल करने में उनके साथ दिक्कत ये है कि किसी भी मात्रा की मेथड एक्टिंग वे अपने पात्रों में नहीं डालते. वे कभी भी अपनी पात्रों में ज्यादा समय नहीं लगाते. इसके लिए वे कोई तैयारी या वर्कशॉप नहीं करते हैं. वे साल में चार फिल्मों की शूटिंग पूरी करते हैं. वे किसी फिल्म को 40-50 दिन से ज्यादा का समय नहीं देते. चाहे सीन किसी भी इंटेंसिटी का हो, शूटिंग का फ्लो कैसा भी हो वे शाम को टाइम पर पैकअप कर देते हैं. वे रेगुलर रोल ही कर सकते हैं जिनमें ज्यादा कुछ तैयारी की जरूरत न हो.
'लॉयन्स ऑफ द सी' में और भी कास्टिंग होनी है. इसके बारे में कोई भी जानकारी नहीं है. डायरेक्टर का नाम भी तय नहीं हुआ है. अन्य जानकारियों का इंतजार है.

Trivia: कोमागाटा की घटना पर पहले भी एक हिंदी फिल्म बन चुकी है. 1974 में निर्देशक-निर्माता राजबंस खन्ना ने 'जीवन संग्राम'नाम से फिल्म बनाई थी. ये उस घटना से प्रेरित थी. इसमें शशि कपूर ने लीड रोल किया था. ग़ुलजार ने क़मर जलालाबादी के साथ फिल्म के डायलॉग और स्क्रीनप्ले लिखा था.

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