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कहानी आज़ाद भारत के पहले हॉकी गोल्ड मेडल की जिस पर अक्षय कुमार की फिल्म आ रही है

आजादी के बाद अंग्रेंजों को उन्हीं की धरती पर पछाड़ा था.

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13 जून 2018 (अपडेटेड: 13 जून 2018, 03:35 AM IST)
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आजादी के बाद पहली बार गोल्ड जीतने की असली कहानी 1948 लंदन ओलंपिक्स की है.
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दूसरे विश्व से हुए विनाश और यहां भारतीय उपमहाद्वीप में हुए सदी के सबसे बड़े बंटवारे से लोग त्रस्त थे. हिंदुस्तान-पाकिस्तान के लोग अपने जीवन को पटरी पर वापस लाने की जद्दोजहद कर रहे थे. इसी बीच साल 1948 के ओलंपिक गेम्स एक उम्मीद की एक किरण बनकर सामने खड़े थे. उम्मीद इसलिए क्योंकि 12 साल के अंतराल पर ये गेम्स हो रहे थे और भारत बतौर आजाद मुल्क पहली बार ओलंपिक्स में तिरंगा लिए शामिल होने का गौरव महसूस करने का इंतजार कर रहा था.
मगर यहां इस सपने को साकार करने में मुश्किलें भी कम नहीं थीं. ध्यान चंद जैसे महान भारतीय खिलाड़ी खेल से रिटायरमेंट ले चुके थे. बंटवारे के बाद खिलाड़ी भी दोनों मुल्कों में बंट गए थे. बहुत से खिलाड़ी डेब्यू कर रहे थे. ये भी प्रस्ताव आए कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान संयुक्त टीम ओलंपिक्स में भेजें. मगर इस पर दोनों मुल्कों की सहमति नहीं बनी. तो हिंदुस्तान की टीम बनी. रेलवे के लिए हॉकी खेलते रहे किशन लाल की कप्तानी में टीम लंदन ओलंपिक्स के लिए तैयार हुई. उपकप्तानी केडी सिंह (बाबू) को दी गई. टीम में पहले से लेसली क्लॉडियस और पंजाब से बलबीर सिंह सीनियर को ओलंपिक खेलने का एक्सपीरियंस था. टीम के मैनेजर थे ए. सी. चैटर्जी जिन्होंने टीम को लंदन ले जाने की जिद की और इस भरोसा दिलाया कि कम अनुभव वाली टीम भी गोल्ड जीतकर आएगी. अब फिल्म 'गोल्ड' में अक्षय कुमार चैटर्जी का किरदार निभा रहे हैं. हालांकि फिल्म निर्माताओं का कहना है कि गोल्ड की कहानी काल्पनिक है, हॉकी के जानकार इसे चैटर्जी के कैरेक्टर से जोड़कर देख रहे हैं.
Hockey Trio
कप्तान किशन लाल, उपकप्तान केडी सिंह और टीम के स्टार खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर.

1928 (एमस्टरडैम), 1932 (लॉस एंजल्स) और 1936 (बर्लिन) ओलंपिक्स में पहले ही हॉकी में गोल्ड जीत चुके भारत के लिए 1948 में लंदन में हो रहे ओलंपिक्स इसलिए भी खास थे क्योंकि इस दफा आजाद भारत अपने झंडे तले इनमें शामिल हो रहा था. लंदन में इंडिया का पहला मैच ऑस्ट्रिया के साथ था. पहले ही मैच में इंडिया को 8-0 से सफलता मिली. बलबीर सिंह सीनियर ने अकेले 6 गोल दागे थे. इसी से मिले कॉन्फिडेंस पर टीम ने अगले मैच में अर्जेंटीना को 9-1 से पस्त किया. क्वार्टरफाइनल में फिर स्पेन को 2-0 से शिकस्त दी. सेमीफाइनल में हॉलैंड को 2-1 से हराकर टीम फाइनल में पहुंच गई. फाइनल में मुकाबला अपने पूर्व शासक ब्रिटेन से था. यहां जीत का मतलब उस बरसों की गुलामी का बदला भी था.
फाइनल खेलने उतरी हिंदुस्तान और ब्रिटेन की टीम. भारत के कई खिलाड़ियों को यहां नंगे पांव खेलते देखा गया था क्योंकि इंग्लैंड में मैदानों पर काफी घास थी जिसके चलते खिलाड़ी खेलते हुए फिसल रहे थे. पहले दो गोल बलबीर सिंह ने दाग दिए और इस लीड को टीम के दूसरे खिलाड़ी जैनसन पैट्रिक और तरलोचन सिंह ने एक एक गोल करके 4-0 कर दिया. इस तरह भारत ने आजादी के बाद अंग्रेजों को अपने नेशनल गेम में पटखनी देकर गोल्ड मेडल जीत लिया. ये भारत का लगातार चौथा ओलंपिक गोल्ड था. ये ओलंपिक गेम्स और भी यादगार हो सकते थे, यदि फाइनल में मुकाबला पाकिस्तान से होता. मगर पाकिस्तान की टीम को सेमीफाइनल में ब्रिटेन ने हरा दिया था.
India 1948
प्रदर्शनी मैच के बाद की इस तस्वीर में बाएं ध्यान चंद हैं, बीच में गवर्नर जनरल सी राजागोपालचारी और दाएं टीम के कप्तान किशन लाल.

भारत की इस धमाकेदार जीत के बाद इंग्लैंड में भारत के राजदूत वीके कृष्ण मेनन ने खिलाड़ियों को दूतावास में खास दावत दी. इस खुशी में टीम को 15 दिन के यूरोप टूर पर भेजा गया जिसके तहत खिलाड़ी फ्रांस, चैकोस्लोवाकिया और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में छुट्टियां बिताकर आए. जब ये टीम भारत वापस लौटी तो उनका भव्य स्वागत हुआ. कई दिन तक चले जश्न का समापन दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में हुए एक प्रदर्शनी मैच के रूप में हुआ था जहां ये सभी खिलाड़ी खेले थे. इन्हें देखने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी पहुंचे थे.


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