ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा के पीछे कौन लोग थे?
हिंसा में दीप सिद्धू और लक्खा सिधाना का क्या रोल था?
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दिल्ली में किसानों की भीड़ ने जमकर बवाल किया. फोटो- PTI
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26 जनवरी को दिनभर जो हुआ उसके एक दिन बाद आज शांति है. किसानों के ट्रैक्टर रातभर सेंट्रल दिल्ली से वापस सीमा की तरफ जाते रहे. सिंघु बॉर्डर पर रात को तीन बजे तक ट्रैक्टर्स लौटते रहे. सीमाओं पर हालात 26 जनवरी से पहले जैसे ही हैं. लेकिन इस शांति में सवालों का शोर है. 26 जनवरी की घटना को लेकर कई सवाल हैं. कोई कह रहा है कि बीजेपी से जुड़े लोगों ने आंदोलन को बदनाम करने के लिए ये चाल चली है, कोई कह रहा है कि हुड़दंगई करने वाले किसान थे ही नहीं. तो कोई कह रहा है कि इसमें आतंकी संगठन शामिल थे. और सवाल ये भी है क्या इस गुंडई का पहले से प्लान तैयार था? क्या लाल किले पर जाने का प्लान अचानक बना या फिर एक सोची समझी रणनीति के तहत मार्च को लाल किले तक ले जाया गया?
इस पूरी घटना को आज तथ्यों के आधार पर डिकोड करने की कोशिश करेंगे, उन किरदारों की बात करेंगे जो परेड को भटकाते दिखे.
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या को सारे किसान संगठनों ने पुलिस के तय रूट से ही परेड निकालने की बात मान ली थी. 25 जनवरी की रात को कई तरह के घटनाक्रम हुए. किसान मोर्चा के स्टेज पर किसान नेताओं के भाषण के बाद बवाल हुआ. भीड़ के चले जाने के बाद कुछ लोगों ने स्टेज कब्ज़ा लिया और नारे लगाने लगे. नारे क्या थे ‘हमारा रूट, रिंग रोड. परेड रूट, रिंग रोड.’इस बात को लेकर बहस हुई कि मार्च को तय रूट से ले जाया या आउटर रिंग रोड पर जाया जाए. ये बात फैलाई गई कि ज्यादातर किसान आउटर रिंग रोड जाना चाहते हैं, यानी सेंट्रल दिल्ली में घुसना चाहते हैं. दीप सिद्धू भी वहां मौजूद था. 25 जनवरी की आधी रात को दीप सिद्धू ने एक फेसबुक लाइव किया. ये करीब साढ़े पांच मिनट का वीडियो है. इसमें वो कहते हैं कि मैजॉरिटी (माने बड़ी संख्या में किसान) रिंग रोड पर जाना चाहते हैं.
सिद्धू सिख संगत का ज़िक्र करता है और किसान जत्थेबंदियों का भी जिक्र करता है. और कहता है कि सबको संगत के फैसले पर चलना चाहिए, किसी ने संगत से बाहर जाकर फैसला लिया तो उसे बदलना पड़ेगा. दीप की बातों पर गौर करें तो बिटवीन द लाइंस ये पढ़ा जा सकता है कि उसने ये कह दिया कि तय रूट से परेड निकालने पर किसान सहमत नहीं हैं इसलिए 26 जनवरी की सुबह जो फैसला लिया जाए बाकी भी उसे ही फॉलो करें. यानी दीप सिद्धू ने किसान संगठनों की कयादत को सिख संगत के नाम पर चुनौती दी. और आंदोलन को डिरेल करने वालों ने 12 बजे के तय वक्त से पहले, यानी सुबह ही पुलिस के बैरिकेड्स तोड़कर परेड की अगुवाई शुरू कर दी, ताकि सारे ट्रैक्टर्स वाले उनको फॉलो करते रहें.
अब इस आंदोलन के प्रबंधन को समझने की कोशिश करते हैं
आंदोलन को आधिकारिक तौर पर लीड कर रहा है संयुक्त किसान मोर्चा. ये 43 किसान संगठनों का मोर्चा है. अब तक सरकार इनसे ही बात कर रही थी. पुलिस ने भी संयुक्त किसान मोर्चा के साथ मिलकर ही ट्रैक्टर परेड का रूट बनाया. लेकिन इसके साथ सिख संगत की बात भी आई. कई स्रोतों से ये बात लगातार बाहर आती रही कि दक्षिणपंथी सिख संगठन इस आंदोलन को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. मोदी सरकार के वकील ने ऑन रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट में माना कि आंदोलन में प्रतिबंधित संगठनों का लिंक सामने आया है. सिख फॉर जस्टिस नाम के प्रतिबंधित संगठन के आंदोलन से जुड़ने की बात आई. इसके सिलसिले में 26 जनवरी के पहले से ही NIA मामले की जांच कर रही थी, कई लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया. यानी किसानों के अलावा इसे सिखों का आंदोलन भी बनाने की कोशिश की गई.
कल वाली परेड में हमें निहंग सिख तलवार लहराते दिखते हैं, किसान संगठनों के बजाय सिखों के धार्मिक प्रतीकों को स्थापित करने की कोशिश दिखती है. और इस कोशिश को लीड करने में दीप सिद्धू जैसे लोग शामिल दिखते हैं. दीप सिद्धू कल लाल किले पर था. एक वीडियो में वो लाल किले पर निशान साहिब के झंडा लगाने को भी सही बताता है. ये वीडियो भी देखिए. इसमें कुछ सिख किसान दीप सिद्धू से बहस करते दिखते हैं और मामला ज्यादा बढ़ने पर दीप सिद्धू ट्रैक्टर से उतरकर भागता नज़र आता है. वायरल वीडियो है, सच्चाई की हम पुष्टि नहीं करते. लेकिन ये तथ्य है कि दीप सिद्धू को किसान मोर्चा ने अपने मंच से दूर ही रखा. दीप सिद्धू जैसे लोगों ने आंदोलन को उस राह पर धकेल दिया जहां शायद और किसान जाना नहीं चाहते थे या उनकी राय बंटी हुई थी. इसीलिए मौके पर सिद्धू को पाकर किसान प्रतिरोध करते हैं.

नरेंद्र मोदी और सनी देओल के साथ दीप सिद्धू (दाहिने) और लाल क़िले पर खालसा ध्वज लहराता प्रदर्शनकारी (बाएं - PTI)
अब ये समझते हैं कि दीप सिद्धू किसका आदमी था?
क्या किसी सियासी शह में उसने आंदोलन को भटकाया? ये आंदोलन शुरू होने से पहले दीप सिद्धू की पहचान पंजाब के फिल्म कलाकार की थी, जिसे शायद पंजाब के बाहर कम ही लोग जानते थे. 1984 में पंजाब के मुक्तसर जिले में दीप सिद्धू का जन्म हुआ. लॉ की पढ़ाई की. बार का सदस्य भी था. कई साल वकालत की. एक ब्रिटिश लॉ फ़र्म के साथ काम किया. फिर आया बालाजी टेलीफ़िल्म में. मॉडलिंग भी साथ साथ की.
2015. दीप सिद्धू की पहली पंजाबी मूवी रिलीज़ हुई. नाम रमता जोगी. पहली बार दीप सिद्धू का नाम सुना गया. फिर आया साल 2018 और फ़िल्म आयी जोरा दस नंबरिया. दीप सिद्धू का नाम जम गया. युवाओं में पहचान बनी. किसान आंदोलन से पहले दीप सिद्धू की ये ही पहचान थी. आंदोलन के शुरू में दीप सिद्धू का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो पुलिस अफसर से अंग्रेजी में बहस कर रहा था. यहां से दीप सिद्धू को इस आंदोलन के साथ पहचान मिली. शुरू में वो आंदोलन का पोस्टर बॉय बना लेकिन कुछ विवादित बयान मीडिया में दिए जाने के बाद किसान संगठनों ने उससे किनारा कर लिया. हालांकि वो आंदोलन में लगातार बना रहा. कल वाली घटना के बाद किसान संगठन उसे सरकार का दलाल कह रहे हैं.
बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी का भी एक ट्वीट मिलता है जिसमें बिना नाम लिए वो कहते हैं कि कुछ खबरें हैं, शायद ये फेक भी हों, लेकिन बात आ ही है कि पीएमओ में उच्च सूत्रों के एक करीबी बीजेपी नेता ने लाल किले वाले ड्रामा को भड़काने के लिए एजेंट का काम किया. हमें नहीं पता स्वामी की ये बात कितनी सही है या गलत है या वो किसकी बात कर रहे हैं. लेकिन दीप सिद्धू की सोशल मीडिया पर फोटो वायरल हैं जिनमें वो प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और बीजेपी नेता सनी देओल के साथ नज़र आ रहे हैं. और इसी के आधार पर कुछ लोग उसे सरकार का एजेंट कह रहे हैं.
तो दीप सिद्धू का बीजेपी से क्या जुड़ाव है?
सनी देओल ने 2019 के लोकसभा चुनाव में गुरदासपुर की लोकसभा सीट से पर्चा भरा. कैम्पेन में दीप सिद्धू सनी देओल के साथ कई मोर्चों पर देखा गया. 26 जनवरी वाली घटना के बाद सन्नी देओल ने ट्विटर पर लिखा कि मैं पहले भी ट्विटर पर ये बात साफ कर चुका हूं मेरा या मेरे परिवार का दीप सिद्धू के साथ कोई संबंध नही है. आंदोलन के शुरुआत में दीप सिद्धू ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो बीजेपी सपोर्टर नहीं है, किसानों के साथ है.
दीप पहले बीजेपी के साथ जुड़ा रहा था. इस बिना पर ये कहा जा रहा है कि बीजेपी की शह से उसने आंदोलन को भटकाया. हालांकि किसान आंदोलन से जुड़े कई और नेता भी पहले किसी ना किसी पार्टी से जुड़े रहे हैं. भाजपा इस मायने में अलग है कि वो खुलकर कृषि कानूनों का समर्थन कर रही है. बाकी सभी पार्टियां कानूनों के खिलाफ खड़ी हैं.

लक्खा सिधाना
अब उपद्रव के दूसरे किरदार की बात करते हैं: लक्खा सिधाना
जब 25 जनवरी की रात स्टेज पर हंगामा हुआ था तो लक्खा सिधाना भी इसमें शामिल था. उसने कहा था- युवा रिंग रोड अख्तियार करना चाहते हैं. किसान मज़दूर संघर्ष समिति ने भी रिंग रोड जाने का निर्णय लिया है, वो हमारे आगे प्रदर्शन कर रहे हैं इसलिए हम उनके पीछे चलेंगे. अगर कोई रिंग रोड पर जाना चाहता है, तो वो किसान मज़दूर संघर्ष समिति को फ़ॉलो करे.
सिधाना ने ऐसा क्यों कहा? इसके पीछे उसकी राजनीति समझिए. सिधाना पंजाब के बठिंडा के रामपुरा फूल से ताल्लुक़ रखता है. पहले कबड्डी का खिलाड़ी था. फिर गैंगस्टर बना. रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2004 से 2016 साल तक लक्खा हर साल जेल गया. कभी 4 महीने, तो कभी 6 महीने के लिए. दर्जन भर मुक़दमे हुए. हत्या, हत्या के प्रयास और लूटपाट के. कुछ के क़िस्से तो ख़ुद ही लक्खा ने सुनाए हैं. ज़मीन पर क़ब्ज़े का काम किया. फिर ज़मीन पर क़ब्ज़े का काम बूथ पर क़ब्ज़े तक चला गया. प्रकाश सिंह बादल के भतीजे और पंजाब के मौजूदा वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने एक समय पार्टी बनायी थी - People's party of Punjab. 2012 के विधानसभा चुनाव में लक्खा को टिकट मिल गया. ज़मानत नहीं बची. 10 हज़ार वोट मिले. आगे भी राजनीतिक रूप से लक्खा एक्टिव रहा. अब मालवा यूथ फ़ेडरेशन का प्रेसिडेंट है. किसान आंदोलन में उसने किसान मज़दूर संघर्ष समिति का समर्थन किया. खबरें हैं कि दिल्ली पुलिस पर हुए हमलों में लक्खा और उसके सहयोगी शामिल थे.
सवाल गाज़ीपुर बॉर्डर वाले किसानों की कयादत पर भी उठ रहे हैं. भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का एक बयान वायरल हो रहा है जिसमें वो पुलिस के बैरिकेड्स तोड़ने या लाल किला तक जाने की बात कर रहे हैं. हम इन वायरल वीडियो की पुष्टि नहीं करते हैं.
गाज़ीपुर बॉर्डर पर ही आंदोलन कर रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संघर्ष संगठन के नेता वीएम सिंह ने टिकैत पर गंभीर आरोप लगाए हैं. वीएम सिंह ने किसान आंदोलन से अपने संगठन को अलग कर, आंदोलन रद्द करने का ऐलान कर दिया है. उपद्रव को लेकर विपक्षी भी सरकार से सवाल कर रहे हैं. कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह को बर्खास्त करने की मांग कर दी है.
तोड़फोड़ नहीं करनी है!
कल वाले हुड़दंग की खूब तस्वीरें आपने देखी. अब हम इसका एक अलग रूप बताना चाहते हैं. लाल किले का एक विडियो है. प्राचीर पर चढ़े लोगों से कुछ किसान हाथ जोड़कर नीचे उतरने की विनती कर रहे हैं. वापस जाने की विनती कर रहे हैं. कह रहे हैं ऐसा करने से हमारा ही नुकसान है. ऐसे और भी वीडियो मिलते हैं. सोशल मीडिया पर वायरल एक औऱ वीडियो में माइक पर ऐलान हो रहा है कि तोड़फोड़ नहीं करनी है. किसान मोर्चा ने जो कहा वही मानना है. वापस जाना है. 4 महीने से जैसे आंदोलन किया वैसे ही करना है. कई तस्वीरों में पुलिसवालों का बचाव करते हुए लोग दिखते हैं. ये वीडियो ये तस्वीरें दिखाती हैं इसी आंदोलन वो किसान भी थे जो किसी तोड़फोड़ हुड़दंग के मकसद से नहीं आए थे. वो शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहते थे. उन्होंने अपने स्तर पर ये कोशिश की भी लेकिन हुड़दंगियों के आगे इनकी कोशिशें छोटी पड़ गई. ये किसान आंदोलन का कलेक्टिव फेलियर था कि आंदोलन शांतिपूर्ण नहीं रहा, हाथ से निकल गया.
ऐन गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में बवाल हुआ. लाल किले पर कब्ज़ा करके धार्मिक झंडा फहरा दिया गया. इसके बाद जाकर तंत्र हरकत में आया. 26 तारीख की शाम से अर्धसैनिक बलों को राजधानी की सड़कों पर उतार दिया गया था. ज़्यादातर जगहों को एक से डेढ़ घंटे के भीतर प्रदर्शनकारियों से खाली करवा लिया गया था. जहां तहां रह गए प्रदर्शनकारी देर रात तक या तो प्रदर्शन स्थल वापस चले गए, या फिर पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया. तीनों प्रदर्शन स्थलों के पास अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां लगा दी गईं और लाल किले सहित दिल्ली की सभी प्रमुख जगहों की सुरक्षा पुख्ता कर दी गई है. इसके चलते दिल्ली में कुछ जगह ट्रैफिक जाम की स्थिति भी बनी. दिल्ली पुलिस केंद्रीय ग्रह मंत्रालय के तहत आती है. तो गृहमंत्री अमित शाह ने आज भी हालात का जायज़ा लिया.

दिल्ली के पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव (दाएं) ने कहा है कि किसानों ने ट्रैक्टर परेड की पहले से तय शर्तें नहीं मानीं. तभी व्यवस्था बिगड़ी, हिंसा हुई. (PTI)
सुप्रीम कोर्ट में याचिका?
27 जनवरी की दोपहर तक खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी लग गई है जिसमें मांग की गई है कि अदालत के एक सेवानिवृत्त जज के नेतृत्व में कमीशन का गठन हो. ये कमीशन 26 जनवरी को हुई हिंसा की जांच करे और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कदम उठाने की सिफारिश करे.
कमीशन बनाना न बनाना अदालत के विवेक पर है. लेकिन हिंसा के आरोपियों पर पुलिस कार्रवाई शुरू हो गई है. दिल्ली पुलिस ने दावा किया है कि उसके 300 से अधिक जवान घायल हैं. इनमें से ज़्यादातर वो हैं जो आईटीओ और लाल किले पर तैनात थे. तो पुलिस इस वाकये को आसानी से जाने देने के मूड में नहीं है.
दिल्ली पुलिस ने समाचार की तैयारी तक तकरीबन 200 प्रदर्शनकारियों को दंगे का आरोप लगाकर हिरासत में ले लिया है. पुलिस लाल किले, आईटीओ, नांगलोई और हिंसा वाली दूसरी जगहों पर सीसीटीवी फुटेज का अध्ययन कर रही है. तो आरोपियों की संख्या बढ़ सकती है. इनपर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और वर्दीधारी पुलिस बल पर हमला करने का आरोप लगाने की भी तैयारी है.
अब तक हिंसा के संबंध में कुल 22 एफआईआर हो चुकी हैं. देढ़ दर्जन किसान नेताओं को नामज़द किया गया है.
इन आरोपों पर अब न्यायालय को विचार करना है
लेकिन हम पुलिस के लगाए आरोपों को समझने की कोशिश कर सकते हैं. अगर वाकई योगेंद्र यादव और दर्शन पाल जैसे नेताओं के कहने पर ट्रैक्टर पुलिस पर जान लेने के इरादे से चढ़ाए जा रहे थे तो ये बड़ी गंभीर बात है. ऐसे में ये सवाल पूछा ही जाएगा कि गणतंत्र दिवस पर दिल्ली की सुरक्षा की ज़िम्मेदार एजेंसियां ऐसी साज़िश का पता लगाने में नाकाम कैसे रह गईं. आंदोलन पांच महीने से हो रहा है. दो महीने से दिल्ली की सीमाओं पर है. दिल्ली पुलिस वहां तैनात है. कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को लेकर आतंकी मामलों की जांच करने वाली शीर्ष संस्था NIA आंदोलन पर नज़र रखे हुए है. नेताओं को बुला-बुलाकर पूछ-ताछ कर रही है. सरकार के पास खुफिया विभाग माने IB भी है जिसका काम ही है साज़िश का पता लगाना. ऐसे में सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करने वाली एक एजेंसी पर जानलेवा हमले की साज़िश पकड़ में क्यों नहीं आई? सवाल और भी हैं.
26 जनवरी की हिंसा की तस्वीरें याद कीजिए. आपको एक तरफ हुड़दंग मचाते ट्रैक्टर दिखेंगे और दूसरी तरफ खाकीधारी दिल्ली पुलिस. सुबह 9 के करीब दिल्ली की सीमाओं पर बैरिकेड तोड़ने की खबर आ गई थी. तब से जब तक किसान दोपहर साढ़े बारह के करीब आईटीओ नहीं पहुंच गई, तब तक हर तरफ खाकी ही थी. याद कीजिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया में घुसकर हिंसा करने वाली पुलिस को. आपको एक हरी चितकबरी वर्दी याद आएगी. अब ये देखिए कि ये बल आपको 26 जनवरी के दिन कब नज़र आया.
आज दिल्ली की तमाम सीमाओं पर चितकबरी वर्दी में दंगा रोधी बल हैं. ये कल कहां थे. अगर बैरीकेड सुबह 9 के करीब टूट गया था, तो फिर इन्हें सड़कों पर उतरकर बलवा काबू करने में शाम कैसे हो गई. जबकि ये सब दिल्ली में हो रहा था. और सुबह से ही तस्वीरें बता रही थीं कि ये पुलिस अकेले ट्रैक्टर दौड़ा रहे किसानों को काबू नहीं कर पा रही है. पुलिस को उसके संयम के लिए हम बधाई देते हैं. लेकिन क्या ये बलवा पुलिस के बस का था भी?
क्या अतिरिक्त बलों को ऊपर से आदेश नहीं मिले थे?
अगर वाकई ऐसा हुआ था, तो फिर इसका ज़िम्मेदार कौन था. क्या दिन भर हिंसा का काबू में न आना केंद्रीय गृह मंत्रालय के काम करने पर सवाल नहीं उठाता? एक साल के भीतर ये दूसरी बार हो रहा है जब पूरे देश की फिक्र करने वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय दिल्ली में ही बलवा दबाने में असहाय नज़र आया. फरवरी 2020 में भी दिल्ली जल रही थी और दिल्ली पुलिस तीन दिन तक राजधानी में दंगा रोक नहीं पाई थी.
यहीं से उस आरोप को बल मिलता है कि कल दिल्ली में जो हुआ, वो उतना भी एकतरफा नहीं था, जितना तस्वीरों से लगा. सवाल ढेर सारे हैं. लेकिन क्या जवाब देने में किसी की दिलचस्पी है.
इस पूरी घटना को आज तथ्यों के आधार पर डिकोड करने की कोशिश करेंगे, उन किरदारों की बात करेंगे जो परेड को भटकाते दिखे.
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या को सारे किसान संगठनों ने पुलिस के तय रूट से ही परेड निकालने की बात मान ली थी. 25 जनवरी की रात को कई तरह के घटनाक्रम हुए. किसान मोर्चा के स्टेज पर किसान नेताओं के भाषण के बाद बवाल हुआ. भीड़ के चले जाने के बाद कुछ लोगों ने स्टेज कब्ज़ा लिया और नारे लगाने लगे. नारे क्या थे ‘हमारा रूट, रिंग रोड. परेड रूट, रिंग रोड.’इस बात को लेकर बहस हुई कि मार्च को तय रूट से ले जाया या आउटर रिंग रोड पर जाया जाए. ये बात फैलाई गई कि ज्यादातर किसान आउटर रिंग रोड जाना चाहते हैं, यानी सेंट्रल दिल्ली में घुसना चाहते हैं. दीप सिद्धू भी वहां मौजूद था. 25 जनवरी की आधी रात को दीप सिद्धू ने एक फेसबुक लाइव किया. ये करीब साढ़े पांच मिनट का वीडियो है. इसमें वो कहते हैं कि मैजॉरिटी (माने बड़ी संख्या में किसान) रिंग रोड पर जाना चाहते हैं.
सिद्धू सिख संगत का ज़िक्र करता है और किसान जत्थेबंदियों का भी जिक्र करता है. और कहता है कि सबको संगत के फैसले पर चलना चाहिए, किसी ने संगत से बाहर जाकर फैसला लिया तो उसे बदलना पड़ेगा. दीप की बातों पर गौर करें तो बिटवीन द लाइंस ये पढ़ा जा सकता है कि उसने ये कह दिया कि तय रूट से परेड निकालने पर किसान सहमत नहीं हैं इसलिए 26 जनवरी की सुबह जो फैसला लिया जाए बाकी भी उसे ही फॉलो करें. यानी दीप सिद्धू ने किसान संगठनों की कयादत को सिख संगत के नाम पर चुनौती दी. और आंदोलन को डिरेल करने वालों ने 12 बजे के तय वक्त से पहले, यानी सुबह ही पुलिस के बैरिकेड्स तोड़कर परेड की अगुवाई शुरू कर दी, ताकि सारे ट्रैक्टर्स वाले उनको फॉलो करते रहें.
अब इस आंदोलन के प्रबंधन को समझने की कोशिश करते हैं
आंदोलन को आधिकारिक तौर पर लीड कर रहा है संयुक्त किसान मोर्चा. ये 43 किसान संगठनों का मोर्चा है. अब तक सरकार इनसे ही बात कर रही थी. पुलिस ने भी संयुक्त किसान मोर्चा के साथ मिलकर ही ट्रैक्टर परेड का रूट बनाया. लेकिन इसके साथ सिख संगत की बात भी आई. कई स्रोतों से ये बात लगातार बाहर आती रही कि दक्षिणपंथी सिख संगठन इस आंदोलन को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. मोदी सरकार के वकील ने ऑन रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट में माना कि आंदोलन में प्रतिबंधित संगठनों का लिंक सामने आया है. सिख फॉर जस्टिस नाम के प्रतिबंधित संगठन के आंदोलन से जुड़ने की बात आई. इसके सिलसिले में 26 जनवरी के पहले से ही NIA मामले की जांच कर रही थी, कई लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया. यानी किसानों के अलावा इसे सिखों का आंदोलन भी बनाने की कोशिश की गई.
कल वाली परेड में हमें निहंग सिख तलवार लहराते दिखते हैं, किसान संगठनों के बजाय सिखों के धार्मिक प्रतीकों को स्थापित करने की कोशिश दिखती है. और इस कोशिश को लीड करने में दीप सिद्धू जैसे लोग शामिल दिखते हैं. दीप सिद्धू कल लाल किले पर था. एक वीडियो में वो लाल किले पर निशान साहिब के झंडा लगाने को भी सही बताता है. ये वीडियो भी देखिए. इसमें कुछ सिख किसान दीप सिद्धू से बहस करते दिखते हैं और मामला ज्यादा बढ़ने पर दीप सिद्धू ट्रैक्टर से उतरकर भागता नज़र आता है. वायरल वीडियो है, सच्चाई की हम पुष्टि नहीं करते. लेकिन ये तथ्य है कि दीप सिद्धू को किसान मोर्चा ने अपने मंच से दूर ही रखा. दीप सिद्धू जैसे लोगों ने आंदोलन को उस राह पर धकेल दिया जहां शायद और किसान जाना नहीं चाहते थे या उनकी राय बंटी हुई थी. इसीलिए मौके पर सिद्धू को पाकर किसान प्रतिरोध करते हैं.

नरेंद्र मोदी और सनी देओल के साथ दीप सिद्धू (दाहिने) और लाल क़िले पर खालसा ध्वज लहराता प्रदर्शनकारी (बाएं - PTI)
अब ये समझते हैं कि दीप सिद्धू किसका आदमी था?
क्या किसी सियासी शह में उसने आंदोलन को भटकाया? ये आंदोलन शुरू होने से पहले दीप सिद्धू की पहचान पंजाब के फिल्म कलाकार की थी, जिसे शायद पंजाब के बाहर कम ही लोग जानते थे. 1984 में पंजाब के मुक्तसर जिले में दीप सिद्धू का जन्म हुआ. लॉ की पढ़ाई की. बार का सदस्य भी था. कई साल वकालत की. एक ब्रिटिश लॉ फ़र्म के साथ काम किया. फिर आया बालाजी टेलीफ़िल्म में. मॉडलिंग भी साथ साथ की.
2015. दीप सिद्धू की पहली पंजाबी मूवी रिलीज़ हुई. नाम रमता जोगी. पहली बार दीप सिद्धू का नाम सुना गया. फिर आया साल 2018 और फ़िल्म आयी जोरा दस नंबरिया. दीप सिद्धू का नाम जम गया. युवाओं में पहचान बनी. किसान आंदोलन से पहले दीप सिद्धू की ये ही पहचान थी. आंदोलन के शुरू में दीप सिद्धू का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो पुलिस अफसर से अंग्रेजी में बहस कर रहा था. यहां से दीप सिद्धू को इस आंदोलन के साथ पहचान मिली. शुरू में वो आंदोलन का पोस्टर बॉय बना लेकिन कुछ विवादित बयान मीडिया में दिए जाने के बाद किसान संगठनों ने उससे किनारा कर लिया. हालांकि वो आंदोलन में लगातार बना रहा. कल वाली घटना के बाद किसान संगठन उसे सरकार का दलाल कह रहे हैं.
बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी का भी एक ट्वीट मिलता है जिसमें बिना नाम लिए वो कहते हैं कि कुछ खबरें हैं, शायद ये फेक भी हों, लेकिन बात आ ही है कि पीएमओ में उच्च सूत्रों के एक करीबी बीजेपी नेता ने लाल किले वाले ड्रामा को भड़काने के लिए एजेंट का काम किया. हमें नहीं पता स्वामी की ये बात कितनी सही है या गलत है या वो किसकी बात कर रहे हैं. लेकिन दीप सिद्धू की सोशल मीडिया पर फोटो वायरल हैं जिनमें वो प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और बीजेपी नेता सनी देओल के साथ नज़र आ रहे हैं. और इसी के आधार पर कुछ लोग उसे सरकार का एजेंट कह रहे हैं.
तो दीप सिद्धू का बीजेपी से क्या जुड़ाव है?
सनी देओल ने 2019 के लोकसभा चुनाव में गुरदासपुर की लोकसभा सीट से पर्चा भरा. कैम्पेन में दीप सिद्धू सनी देओल के साथ कई मोर्चों पर देखा गया. 26 जनवरी वाली घटना के बाद सन्नी देओल ने ट्विटर पर लिखा कि मैं पहले भी ट्विटर पर ये बात साफ कर चुका हूं मेरा या मेरे परिवार का दीप सिद्धू के साथ कोई संबंध नही है. आंदोलन के शुरुआत में दीप सिद्धू ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो बीजेपी सपोर्टर नहीं है, किसानों के साथ है.
दीप पहले बीजेपी के साथ जुड़ा रहा था. इस बिना पर ये कहा जा रहा है कि बीजेपी की शह से उसने आंदोलन को भटकाया. हालांकि किसान आंदोलन से जुड़े कई और नेता भी पहले किसी ना किसी पार्टी से जुड़े रहे हैं. भाजपा इस मायने में अलग है कि वो खुलकर कृषि कानूनों का समर्थन कर रही है. बाकी सभी पार्टियां कानूनों के खिलाफ खड़ी हैं.

लक्खा सिधाना
अब उपद्रव के दूसरे किरदार की बात करते हैं: लक्खा सिधाना
जब 25 जनवरी की रात स्टेज पर हंगामा हुआ था तो लक्खा सिधाना भी इसमें शामिल था. उसने कहा था- युवा रिंग रोड अख्तियार करना चाहते हैं. किसान मज़दूर संघर्ष समिति ने भी रिंग रोड जाने का निर्णय लिया है, वो हमारे आगे प्रदर्शन कर रहे हैं इसलिए हम उनके पीछे चलेंगे. अगर कोई रिंग रोड पर जाना चाहता है, तो वो किसान मज़दूर संघर्ष समिति को फ़ॉलो करे.
सिधाना ने ऐसा क्यों कहा? इसके पीछे उसकी राजनीति समझिए. सिधाना पंजाब के बठिंडा के रामपुरा फूल से ताल्लुक़ रखता है. पहले कबड्डी का खिलाड़ी था. फिर गैंगस्टर बना. रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2004 से 2016 साल तक लक्खा हर साल जेल गया. कभी 4 महीने, तो कभी 6 महीने के लिए. दर्जन भर मुक़दमे हुए. हत्या, हत्या के प्रयास और लूटपाट के. कुछ के क़िस्से तो ख़ुद ही लक्खा ने सुनाए हैं. ज़मीन पर क़ब्ज़े का काम किया. फिर ज़मीन पर क़ब्ज़े का काम बूथ पर क़ब्ज़े तक चला गया. प्रकाश सिंह बादल के भतीजे और पंजाब के मौजूदा वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने एक समय पार्टी बनायी थी - People's party of Punjab. 2012 के विधानसभा चुनाव में लक्खा को टिकट मिल गया. ज़मानत नहीं बची. 10 हज़ार वोट मिले. आगे भी राजनीतिक रूप से लक्खा एक्टिव रहा. अब मालवा यूथ फ़ेडरेशन का प्रेसिडेंट है. किसान आंदोलन में उसने किसान मज़दूर संघर्ष समिति का समर्थन किया. खबरें हैं कि दिल्ली पुलिस पर हुए हमलों में लक्खा और उसके सहयोगी शामिल थे.
सवाल गाज़ीपुर बॉर्डर वाले किसानों की कयादत पर भी उठ रहे हैं. भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का एक बयान वायरल हो रहा है जिसमें वो पुलिस के बैरिकेड्स तोड़ने या लाल किला तक जाने की बात कर रहे हैं. हम इन वायरल वीडियो की पुष्टि नहीं करते हैं.
गाज़ीपुर बॉर्डर पर ही आंदोलन कर रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संघर्ष संगठन के नेता वीएम सिंह ने टिकैत पर गंभीर आरोप लगाए हैं. वीएम सिंह ने किसान आंदोलन से अपने संगठन को अलग कर, आंदोलन रद्द करने का ऐलान कर दिया है. उपद्रव को लेकर विपक्षी भी सरकार से सवाल कर रहे हैं. कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह को बर्खास्त करने की मांग कर दी है.
तोड़फोड़ नहीं करनी है!
कल वाले हुड़दंग की खूब तस्वीरें आपने देखी. अब हम इसका एक अलग रूप बताना चाहते हैं. लाल किले का एक विडियो है. प्राचीर पर चढ़े लोगों से कुछ किसान हाथ जोड़कर नीचे उतरने की विनती कर रहे हैं. वापस जाने की विनती कर रहे हैं. कह रहे हैं ऐसा करने से हमारा ही नुकसान है. ऐसे और भी वीडियो मिलते हैं. सोशल मीडिया पर वायरल एक औऱ वीडियो में माइक पर ऐलान हो रहा है कि तोड़फोड़ नहीं करनी है. किसान मोर्चा ने जो कहा वही मानना है. वापस जाना है. 4 महीने से जैसे आंदोलन किया वैसे ही करना है. कई तस्वीरों में पुलिसवालों का बचाव करते हुए लोग दिखते हैं. ये वीडियो ये तस्वीरें दिखाती हैं इसी आंदोलन वो किसान भी थे जो किसी तोड़फोड़ हुड़दंग के मकसद से नहीं आए थे. वो शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहते थे. उन्होंने अपने स्तर पर ये कोशिश की भी लेकिन हुड़दंगियों के आगे इनकी कोशिशें छोटी पड़ गई. ये किसान आंदोलन का कलेक्टिव फेलियर था कि आंदोलन शांतिपूर्ण नहीं रहा, हाथ से निकल गया.
ऐन गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में बवाल हुआ. लाल किले पर कब्ज़ा करके धार्मिक झंडा फहरा दिया गया. इसके बाद जाकर तंत्र हरकत में आया. 26 तारीख की शाम से अर्धसैनिक बलों को राजधानी की सड़कों पर उतार दिया गया था. ज़्यादातर जगहों को एक से डेढ़ घंटे के भीतर प्रदर्शनकारियों से खाली करवा लिया गया था. जहां तहां रह गए प्रदर्शनकारी देर रात तक या तो प्रदर्शन स्थल वापस चले गए, या फिर पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया. तीनों प्रदर्शन स्थलों के पास अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां लगा दी गईं और लाल किले सहित दिल्ली की सभी प्रमुख जगहों की सुरक्षा पुख्ता कर दी गई है. इसके चलते दिल्ली में कुछ जगह ट्रैफिक जाम की स्थिति भी बनी. दिल्ली पुलिस केंद्रीय ग्रह मंत्रालय के तहत आती है. तो गृहमंत्री अमित शाह ने आज भी हालात का जायज़ा लिया.

दिल्ली के पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव (दाएं) ने कहा है कि किसानों ने ट्रैक्टर परेड की पहले से तय शर्तें नहीं मानीं. तभी व्यवस्था बिगड़ी, हिंसा हुई. (PTI)
सुप्रीम कोर्ट में याचिका?
27 जनवरी की दोपहर तक खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी लग गई है जिसमें मांग की गई है कि अदालत के एक सेवानिवृत्त जज के नेतृत्व में कमीशन का गठन हो. ये कमीशन 26 जनवरी को हुई हिंसा की जांच करे और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कदम उठाने की सिफारिश करे.
कमीशन बनाना न बनाना अदालत के विवेक पर है. लेकिन हिंसा के आरोपियों पर पुलिस कार्रवाई शुरू हो गई है. दिल्ली पुलिस ने दावा किया है कि उसके 300 से अधिक जवान घायल हैं. इनमें से ज़्यादातर वो हैं जो आईटीओ और लाल किले पर तैनात थे. तो पुलिस इस वाकये को आसानी से जाने देने के मूड में नहीं है.
दिल्ली पुलिस ने समाचार की तैयारी तक तकरीबन 200 प्रदर्शनकारियों को दंगे का आरोप लगाकर हिरासत में ले लिया है. पुलिस लाल किले, आईटीओ, नांगलोई और हिंसा वाली दूसरी जगहों पर सीसीटीवी फुटेज का अध्ययन कर रही है. तो आरोपियों की संख्या बढ़ सकती है. इनपर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और वर्दीधारी पुलिस बल पर हमला करने का आरोप लगाने की भी तैयारी है.
अब तक हिंसा के संबंध में कुल 22 एफआईआर हो चुकी हैं. देढ़ दर्जन किसान नेताओं को नामज़द किया गया है.
योगेंद्र यादव, राकेश टिकैत, जसबीर सिंह तड़ा, भोग सिंह मनसा, सुखपाल सिंह दफर, ऋषि पाल अंबावत, प्रेम सिंह गहलोत, सुरजीत सिंह फूल, कृपाल सिंह नटुआला, वीएम सिंह, सतपाल सिंह, मुकेश चंद्रा, जोगिंदर सिंह, बलवीर सिंह राजेवाल, बूटा सिंह, सतनाम पन्नू, सरवण सिंह, दर्शन पालइन सभी नेताओं का संबंध संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल किसान यूनियन्स से है. इन नेताओं के खिलाफ कई धाराओं में आरोप लगाए गए हैं, जिनमें से एक भारतीय दंड संहिता की धारा 307 भी है. जान से मारने की कोशिश करना माने अटेंप्ट टू मर्डर के मामलों में यही धारा लगती है. आपवाले नेको ये समझना चाहिए कि ये आरोप आया कहां से. दरअसल कुछ एफआईआर में शिकायतकर्ता खुद पुलिस है. इनमें से एक में एक पुलिस कर्मी ने आरोप लगाया है कि किसानों ने बैरिकेड पर ट्रैक्टर चढ़ाकर उसे जान से मारने की कोशिश की. और ये सब किसान नेताओं के आदेश पर हुआ.
इन आरोपों पर अब न्यायालय को विचार करना है
लेकिन हम पुलिस के लगाए आरोपों को समझने की कोशिश कर सकते हैं. अगर वाकई योगेंद्र यादव और दर्शन पाल जैसे नेताओं के कहने पर ट्रैक्टर पुलिस पर जान लेने के इरादे से चढ़ाए जा रहे थे तो ये बड़ी गंभीर बात है. ऐसे में ये सवाल पूछा ही जाएगा कि गणतंत्र दिवस पर दिल्ली की सुरक्षा की ज़िम्मेदार एजेंसियां ऐसी साज़िश का पता लगाने में नाकाम कैसे रह गईं. आंदोलन पांच महीने से हो रहा है. दो महीने से दिल्ली की सीमाओं पर है. दिल्ली पुलिस वहां तैनात है. कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को लेकर आतंकी मामलों की जांच करने वाली शीर्ष संस्था NIA आंदोलन पर नज़र रखे हुए है. नेताओं को बुला-बुलाकर पूछ-ताछ कर रही है. सरकार के पास खुफिया विभाग माने IB भी है जिसका काम ही है साज़िश का पता लगाना. ऐसे में सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करने वाली एक एजेंसी पर जानलेवा हमले की साज़िश पकड़ में क्यों नहीं आई? सवाल और भी हैं.
26 जनवरी की हिंसा की तस्वीरें याद कीजिए. आपको एक तरफ हुड़दंग मचाते ट्रैक्टर दिखेंगे और दूसरी तरफ खाकीधारी दिल्ली पुलिस. सुबह 9 के करीब दिल्ली की सीमाओं पर बैरिकेड तोड़ने की खबर आ गई थी. तब से जब तक किसान दोपहर साढ़े बारह के करीब आईटीओ नहीं पहुंच गई, तब तक हर तरफ खाकी ही थी. याद कीजिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया में घुसकर हिंसा करने वाली पुलिस को. आपको एक हरी चितकबरी वर्दी याद आएगी. अब ये देखिए कि ये बल आपको 26 जनवरी के दिन कब नज़र आया.
आज दिल्ली की तमाम सीमाओं पर चितकबरी वर्दी में दंगा रोधी बल हैं. ये कल कहां थे. अगर बैरीकेड सुबह 9 के करीब टूट गया था, तो फिर इन्हें सड़कों पर उतरकर बलवा काबू करने में शाम कैसे हो गई. जबकि ये सब दिल्ली में हो रहा था. और सुबह से ही तस्वीरें बता रही थीं कि ये पुलिस अकेले ट्रैक्टर दौड़ा रहे किसानों को काबू नहीं कर पा रही है. पुलिस को उसके संयम के लिए हम बधाई देते हैं. लेकिन क्या ये बलवा पुलिस के बस का था भी?
क्या अतिरिक्त बलों को ऊपर से आदेश नहीं मिले थे?
अगर वाकई ऐसा हुआ था, तो फिर इसका ज़िम्मेदार कौन था. क्या दिन भर हिंसा का काबू में न आना केंद्रीय गृह मंत्रालय के काम करने पर सवाल नहीं उठाता? एक साल के भीतर ये दूसरी बार हो रहा है जब पूरे देश की फिक्र करने वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय दिल्ली में ही बलवा दबाने में असहाय नज़र आया. फरवरी 2020 में भी दिल्ली जल रही थी और दिल्ली पुलिस तीन दिन तक राजधानी में दंगा रोक नहीं पाई थी.
यहीं से उस आरोप को बल मिलता है कि कल दिल्ली में जो हुआ, वो उतना भी एकतरफा नहीं था, जितना तस्वीरों से लगा. सवाल ढेर सारे हैं. लेकिन क्या जवाब देने में किसी की दिलचस्पी है.

