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  • Rafale Deal: The Hindu newspaper report that Ministry of Defence objected to the parallel negotiations of PMO with France

रफाल पर ये आधी और पूरी चिट्ठी का क्या विवाद है, जिस पर बीजेपी-कांग्रेस लड़े पड़े हैं?

राहुल गांधी ने तो प्रेस कांफ्रेंस कर दी थी. प्रधानमंत्री को फिर एक बार सीधे-सीधे चोर कहा था.

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दोनों पार्टियां एक-दूसरे पर हमला करने का मौका नहीं छड़तीं. दोनों में एक बात कॉमन- पाकिस्तान का जिक्र.
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आशीष मिश्रा
9 फ़रवरी 2019 (अपडेटेड: 9 फ़रवरी 2019, 08:49 AM IST)
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द हिन्दू में एक ख़बर छपी. ख़बर से भी ज़्यादा जरूरी, एक फ़ाइल का हिस्सा छपा. फ़ाइल रफ़ाल डील से जुड़ी थी.
अखबार ने लिखा कि रफाल डील में PMO सीधे तौर दखल दे रहा था. एक तरफ रक्षा मंत्रालय डील में लगा था. दूसरी ओर प्रधानमंत्री कार्यालय निजी तौर पर इस सौदे में दिलचस्पी दिखा रहा था. पीएमओ फ्रांस सरकार के साथ डील पर समानांतर बातचीत कर रहा था. जिससे डील में हमारा नुकसान हुआ. इस ख़बर के बाद कांग्रेस रफ़ाल डील पर सीधा-पिसान लेकर प्रधानमंत्री पर चढ़ गई. राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की. प्रधानमंत्री को फिर एक बार सीधे-सीधे चोर कहा. घोटाले का गुनहगार बताया. सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने का आरोप लगाया. दावा किया कि प्रधानमंत्री ने वायुसेना के 30 हजार करोड़ रुपए लूटकर अनिल अंबानी को दे दिए.
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राहुल ने पीएम को एक एक बार फिर से सीधे-सीधे चोर कहा.

इसके बाद ट्विटर पर हैशटैग #PakdaGayaModi ट्रेंड हो पड़ा. सवाल पूछे जाने लगे कि 126 जेट क्यों नहीं लिए. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर क्यों नहीं हुआ, HAL को ऑफ़सेट पार्टनर क्यों नहीं बनाया, बिना एक्सपीरियंस की कंपनी को तरजीह क्यों दी गई और सबसे जरूरी बात, जब रक्षा मंत्रालय की टीम डील कर रही थी. तो प्रधानमंत्री का दफ्तर बीच में क्यों आया?
 रक्षा मंत्री ने बताया गड़ा मुर्दा
ये सारा हंगामा बढ़ा. इतना बढ़ा कि रक्षा मंत्री को लोकसभा में जवाब देना पड़ गया. रक्षा मंत्री ने 'द हिंदू' की खबर को सिरे से खारिज कर दिया. कहा ये विवाद 'मुर्दे उखाड़ने जैसा है.'
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के  शब्दों में गड़े मुर्दे उखाड़ने का कारण भी सामने आया. उन्होंने कहा, "विपक्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में खेल रहा है." विपक्ष का एयरफ़ोर्स को मजबूत बनाने में कोई इंटरेस्ट नहीं है.' लोकसभा में और हंगामा हुआ, कामकाज सोमवार तक के लिए टल गया.
अखबार ने ऐसा क्या सबूत छाप दिया कि कोहराम मच गया
'द हिंदू' ने डिफेन्स मिनिस्ट्री की एक रिपोर्ट छापी है. अब क्योंकि ये नोट एक सरकारी दस्तावेज है, जो अधिकारी आपसी सलाह मशविरा के लिए एक-दूसरे को भेजते हैं. इसलिए इसकी ऑथेंटीसिटी भी ज़्यादा मानी गई.
टेक्निकेलिटी में घुसे उससे पहले आसान भाषा में वो दावा समझ लीजिए. जो किया जा रहा है. मान लीजिए. आप रक्षा मंत्रालय हैं. आपको पापा ने ज़िम्मेदारी दी की कि आपको घर के लिए नया गेट खरीदना है. आपने फ्रांस, यानी दुकान वाले से बात करनी शुरू की. आप पैसे बचाने में माहिर हैं और गेट की मजबूती के जानकार हैं. इस बीच आपको पता लगता है कि चाचाजी मतलब पीएमओ वही गेट खरीदने के लिए अलग से उसी दुकान वाले से बात कर रहे हैं. अब कायदे से आप और चाचा जी यानी रक्षा मंत्रालय और पीएमओ हैं तो एक ही घर के. लेकिन मुद्दा ये है कि आपको पता तो होना चाहिए कि चाचा भी गेट खरीदने के लिए बातचीत कर रहे हैं, फिर आप क्यों खप रहे हैं, आप हट जाएं वही खरीद लें.'
सेम यही बात उस नोट से निकल कर आई. इस नोट पर रक्षा मंत्रालय के उप सचिव एसके शर्मा और उस वक्त के रक्षा सचिव जी. मोहन कुमार के दस्तखत हैं. नोट 24 नवंबर, 2015 को तैयार किया गया. याद रखें कि 10 अप्रैल 2015 को पीएम मोदी ने फ्रांस में 36 रफ़ाल खरीदने का ऐलान किया था . उसके पहले से ही भारत के रक्षा मंत्रालय की एक टीम और फ्रांस की तरफ से एक टीम बनी थी. जो इस डील पर बात कर रही थी. 24 नवंबर को उन्हें पता लगता है, पीएमओ भी इन्वॉल्व है.
लेकिन इस नोट के मुताबिक रफाल डील में PMO, फ्रांसीसी टीम के साथ 'समानांतर बातचीत' चला रहा था. PMO के दखल की वजह से भारत की पोजीशन कमजोर हुई. रक्षा मंत्रालय के इस नोट में तब के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को भी आगाह किया गया था. नोट के मुताबिक रक्षा मंत्री से कहा गया था कि वे प्रधानमंत्री कार्यालय को ऐसा करने से रोकें. फिर भी अगर पीएमओ को रक्षा मंत्रालय की बातचीत पर भरोसा नहीं है, तो प्रधानमंत्री कार्यालय नए सिरे से बातचीत शुरू कर सकता है.
पीएमओ के कौन से अफसर बातचीत में शामिल थे?
रक्षा मंत्रालय को फ्रांस के एक अफसर स्टीफन रेब की चिट्ठी मिली. स्टीफन रेब फ्रांस वाली टीम के मुखिया थे. रेब के मुताबिक 10 अक्टूबर, 2015 को PMO के संयुक्त सचिव जावेद अशरफ और फ्रांसीसी रक्षा मंत्री के कूटनीतिक सलाहकार लुइस वैसी के बीच रफाएल सौदे पर फोन पर बातचीत हुई थी. ये पता चला तो डिफेन्स मिनिस्ट्री में बखेड़ा हो गया. PMO को चिट्ठी लिखी गई. चिट्ठी लिखी वायु सेना उप प्रमुख एसबीपी सिन्हा ने. जो इंडिया वाली टीम के प्रमुख थे. पूछा गया आखिर मामला क्या है? इस पर 11 नवंबर, 2015 को PMO का  जवाब आया. संयुक्त सचिव जावेद अशरफ ने सिन्हा को बताया कि फ्रांस वाले उनके राष्ट्रपति कार्यालय की सलाह पर बात कर रहे हैं. 'द हिंदू' की मानें तो ये एक बार नहीं हुआ. जनवरी, 2016 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने भी पेरिस में फ्रांस वाली टीम से बात की थी.
इस नोट के हिसाब से PMO बीच में पड़ा तो 'दसॉ' से सरकारी गारंटी या बैंक गारंटी भी नहीं ली जा सकी. रक्षा सौदों में माल सप्लाई करने वाली कंपनी को बैंक गारंटी या सरकारी गारंटी देनी पड़ती है. इसका फायदा ये होता है कि अगर माल सप्लाई करने वाली कंपनी  शर्तों का पालन न करे तो भरपाई बैंक सिक्योरिटी से कर ली जाती है.
सुप्रीम कोर्ट में सरकार के झूठ की क्या बात है?
द हिंदू बताता है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अक्टूबर, 2018 में एक एफिडेविट दिया था. कहा था, डील में भारत की तरफ से बात एसबीपी सिन्हा की लीडरशिप में 7 लोगों की टीम कर रही है. सरकार ने कहीं ये नहीं बताया कि इसमें PMO भी शामिल था.
फिर एक और कागज़ सामने आया न्यूज़ एजेंसी ANI ने भी एक ट्वीट किया. मतलब एक और कागज़ आया. रक्षा मंत्री की तरफ से लिखे इस नोट में जवाब था. कहा गया कि "रक्षा सचिव मतलब जी मोहन को पीएमओ के प्रधान सचिव से सलाह-मशविरा कर इस मुद्दे को हल करना चाहिए."  मतलब कह दिया गया "कोई नहीं, कोई नहीं घर की बात है. देख समझ लो." जिस पैरा में पीएमओ के हस्तक्षेप पर सवाल था, उसके जवाब में रक्षामंत्री ने कहा, लगता है PMO और फ्रांस के प्रेसिडेंट का ऑफिस सीधे इस मामले में नजर रख रहा है. इसलिए बातें वातें हो रही हैं. 5वें पैरा में लिखी गई बात ओवर-रिएक्शन है. इस पर पूर्व रक्षा सचिव जी. मोहन कुमार का रिएक्शन भी आ गया है कि कीमतों पर रक्षा मंत्रालय ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. इस बात से 'सौदे में हमारा नुकसान' वाला दावा खटाई में पड़ गया है. लेकिन पेच और हैं. सौदे में नेगोशिएशन की टीम के मुखिया रहे SBP सिन्हा सामने आए. कहा, लेटर देखकर मैं सरप्राइज्ड हूं. ये तो इंटरनल कम्युनिकेशन का हिस्सा है. मोहन कुमार नेगोशिएशन टीम में नहीं थे. नोट में भी यही लिखा है कि किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं था. कोई 'समानांतर बातचीत' नहीं चल रही थी.
हम क्या समझें?
सब कुछ आँखों के सामने है, लेकिन लोग अपनी-अपनी झोंके जा रहे हैं. कोई एक कागज़ लाता है, उसके बहाने नैरेटिव बुनता है. दूसरा उस कागज़ पर जवाब लाता है. तीसरा आकर बताता है कि "जी, आपत्ति थी तो लेकिन दाम पर आपत्ति नहीं थी.' वो जो शब्द था 'ओवर रिएक्शन' हर ओर वही हो रहा है. ज़रूरत सबकुछ साफ़ करने की है. यहीं से जेपीसी बनाने की मांग उठेगी. पर सवाल तो ये भी है कि जेपीसी गठन हो गया. तो भी क्या होगा? जेपीसी बनी. सरकार के खिलाफ रिपोर्ट दी तो उसे किनारे करना सरकार के लिए कतई मुश्किल नहीं होगा.
इस ओवर रिएक्शन के दौर में मीडिया वालों की गति हमारे 'जानकार' ने  बताई. पहला नेता कहता है.  कितना अच्छा दिन है.
दूसरा कहता है. झमाझम बारिश हो रही है.
पत्रकार खिड़की से बाहर झांकके  खिली हुई धूप देखता है और कहता है. आसमान में बादल नहीं हैं लेकिन क्योंकि दूसरा नेता कह रहा है. इसलिए, इस मुद्दे की जांच हो करके सब कुछ साफ़ क्यों नहीं कर दिया जाता.
दूसरा पत्रकार, इस पर लेख लिखता है. मौसम विभाग की चेतावनी बताता है कि पानी बरस सकता है. अब तीन धुरंधर मांग कर रहे हैं कि कोर्ट की निगरानी में जांच हो जाए.
अब दूसरा नेता अता है, प्रेस कांफ्रेंस करता है. कहता है पहला नेता जांच से डर क्यों रहा  है. सब हामी भरते हैं. हां!इसने कायदे की बात कही है.


वीडियो देखें: राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में कितने वक्त के लिए बनाया बघेल को सीएम? 

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