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  • Purnima Devi: A women in Bihar whose husband's song was used in bollywood films daughter is a tv actress but still she is compelled to live a miserable life

इस महिला के पति के गाने बॉलीवुड में लिए गए, बेटी भी हीरोइन है बावजूद इसके मां की ये हालत है

एक राजा के महल के बाहर बैठकर गीत गाती है ये महिला.

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17 जून 2018 (अपडेटेड: 18 जून 2018, 05:35 AM IST)
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इस बूढ़ी महिला के पति के पति के गाने सिनेमा में लिए जाते थे, बेटी हीरोइन है लेकिन इन्हें अब भी अपना गुज़ारा गीत गाकर करना पड़ता है.
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सोशल मीडिया के दुरुपयोग. इससे होने वाली दिक्कतें. क्यों कितना और कब इस्तेमाल करना चाहिए जैसे ढेर सारा ज्ञान. अब खबर ये है कि हमारे सोशल मीडिया विचरण के दौरान एक बड़ी अच्छी चीज़ आंखों के सामने आ गई. एक बूढ़ी और उसकी दुख भरी कहानी. जिसके पति के गाने बॉलीवुड में इस्तेमाल हुए, बेटी हीरोइन है और किसी दौर में इलाके का मशहूर गवैया रहा बेटा अब डिप्रेशन से जूझ रहा है. अब ये कोई सिनेमा तो है नहीं कि थोड़ी-बहुत छूट लेकर मनगढ़ंत सा कुछ दिखा-पढ़ा दिया जाए. यहां होने के लिए खरा होना जरूरी है. पटना के दरभंगा हाऊस में गंगा किनारे बैठी पूर्णिमा जी के गीत में वैसी ही सच्चाई आपको सुनने को मिलेगी. जब वो अपनी कहानी कुछ लाइनों में कह जाती हैं. वो भी हारमोनियम की धुन पर. साधुवाद रहेगा ऊषा जी को जिनकी मदद से हमें पूर्णिमा जी की पूरी कहानी जानने को मिली.

तो हुआ ये कि ये जो पूर्णिमा जी हैं, वो दरभंगा हाऊस में गंगा किनारे बैठकर गाती हैं और जिसे अच्छा लगता है वो इच्छाशक्ति से कुछ रुपए दे देता है. इन रुपयों से उस बूढ़ी महिला का खर्चा चल जाता है. अब सवाल ये कि दरभंगा हाऊस क्या है और वहां बैठकर माता जी गीत क्यों गाती हैं? ये जो हाऊस है, वो पहले महाराजा कामेश्वर सिंह का महल हुआ करता था. जैसे मुंबई में सी-फेसिंग बंगले होते हैं, वैसे बिहार में गंगा किनारे महल. खैर, अब राजा जी तो रहे नहीं इसलिए उनके महल में पोस्ट ग्रेजुएशन की क्लास चलती है. माता वहां बैठती हैं. उसी परिसर में एक बहुत पुराना काली मंदिर है. लोगों की उनमें भरपूर आस्था है. कुछ खास दिनों पर तो लोगों का जमघट लगा रहता है.
29 दिसंबर, 1945 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में महाकाल मंदिर के पुजारी हरिप्रसाद शर्मा के घर एक बच्ची पैदा हुई. नाम रखा गया पूर्णिमा. इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के बाद जनवरी 1974 में बाराबंकी के मशहूर फिजिशियन डॉ. एच.पी. दिवाकर से इनकी शादी हो गई. शादी के शुरुआती दस साल अच्छे रहे. एक बेटा और एक बेटी पैदा हुई. आला दर्जे के डॉक्टर होने के साथ-साथ दिवाकर लिखते भी थे. अगर पूर्णिमा की माने तो उनके लिखे कई गाने जैसे 'शाम हुई सिंदूरी' और 'आज की रात अभी बाकी है', बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल किए गए. लेकिन किसी और के नाम से. दिवाकर के लिखे ये गाने वहां तक कैसे पहुंचे किसी को नहीं पता. सब कुछ सही चल रहा था. फिर आया साल 1984. संपत्ति को लेकर हुए किसी विवाद की वजह से अचानक कुछ बदमाशों ने एक रात दिवाकर की गोली मारकर हत्या कर दी. डॉक्टर साहब की डेथ के बाद ससुर और देवर बहुत परेशान करने लगे. इतना परेशान की पूर्णिमा को अपना ससुराल और संपत्ति में हिस्सा छोड़कर पटना में रह रही अपनी मौसी के यहां जाना पड़ा. मौसी जब तक रहीं, बहुत मदद की. लेकिन 1989 में लीवर कैंसर उन्हें भी लील गया. दो बच्चों के साथ अब पूर्णिमा बिलकुल अकेली पड़ गईं थी. मायके गईं लेकिन मां-बाप की मौत के बाद किसी ने मदद करने से इनकार कर दिया.
पूर्णिमा जी का कहना है कि ये गाना उनके पति ने लिखा है:

इसके बाद पूर्णिमा ने तय किया कि वो अब किसी के पास नहीं जाएंगी और अपनी कमाई से बच्चों का भरण-पोषण करेंगी. बचपन से ही गाने का शौक था. पटना के एक स्कूल में म्यूज़िक क्लास देने लगीं. लता जी का करियर उस दौर में अपने शबाब पर था, उनसे बहुत इंस्पायर्ड थीं. खुद भी गाने लगीं. कई स्टेज शोज़ किए. 1990 में झारखंड के गढ़वा से शुरू हुआ गाने का सफर 2002 तक बदस्तूर जारी रहा. बेटा रफी साहब का फैन था, वो भी ऑर्केस्ट्रा में रफी के गाने गाया करता था. लेकिन कुछ समय के बाद ये परिवार दुख और निराशा के जाल में फंसने लगा. लड़का डिप्रेशन का शिकार हो गया. पटना से पढ़ाई लिखाई करने के बाद बेटी मुंबई चली गई हीरोइन बनने. हीरोइन तो बन गई लेकिन मां के पास कभी वापस नहीं लौटी, न कभी खोज-खबर ली. उनके जानने वाले लोग कहते हैं कि उनकी बेटी कई टीवी सीरियल में काम कर चुकी है. आए दिन टीवी पर दिखाई देती रहती हैं. कुछ लोगों ने उससे बात कर मां के बारे में याद दिलाने की कोशिश की लेकिन उसने ऐसी किसी भी महिला को जानने से मना कर दिया. मुंबई में अपनी पहचान छिपाकर रह रही है. बिहार से होने के बावजूद खुद को गुजराती बताती है.
पूर्णिमा जी को बचपन से ही गाने का शौक था इसलिए उन्होंने कई जगह स्टेज शोज़ किए.
पूर्णिमा जी को बचपन से ही गाने का शौक था इसलिए उन्होंने कई जगह स्टेज शोज़ किए.

पटना में रहने की कोई जगह नहीं है इसलिए एक ट्रस्ट द्वारा बनाए गए अनुग्रह सेवा सदन (खजांची रोड) में रहती हैं. हर महीने 1500 रुपए किराए पर. इस रकम के लिए अब कोई बचा ही नहीं, जिससे मदद मांगना बाकी रह गया हो, इसलिए मंदिर में गाती हैं. हर शनिवार को जब मंदिर में लोगों की भीड़ होती है, उस दिन मकान मालिक को पांच सौ रुपए दे देती हैं. क्योंकि एकमुश्त 1500 रुपए देना संभव नहीं है. बेटा हमेशा मां के साथ रहता है लेकिन मानसिक रूप से बीमार हो गया है. न किसी से कुछ कहता है, न सुनता है. एकाकीपन में रम गया है. बेटी होकर भी नहीं है. इसलिए माताजी गाती रहती हैं-
मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानो तो बहता पानी...



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