मैंने बचपन से ही लड़कियों के स्कूल में पढ़ाई की. माना जाता है कि लड़कियों के स्कूलमें लड़कियां सेफ रहेंगी. उन्हें लड़के तंग नहीं करेंगे. उनका दिमाग नहीं भटकेगा औरवो पढ़ाई पर फोकस करेंगी. जिस तरह बच्चों पर आदर्श बच्चे होने का बोझ रहता है, उसीतरह मां-बाप पर आदर्श मां-बाप बनने का बोझ रहता है. यही कारण है कि वो लड़कियों कोलड़कियों के स्कूल में भेजते हैं, लेकिन अगर उनकी बेटी लेस्बियन हो तो?बॉयज हॉस्टल में लड़कियों का आना मना होता है. गर्ल्स हॉस्टल में लड़कों का. जब लड़केया लड़कियां किराए पर घर लेने जाते हैं, तो मकान-मालिक की सबसे बड़ी शर्त यही होती हैकि 'बेटा लड़के/लड़कियां नहीं आने चाहिए.' ये कितना मासूम समाज है, जिसे लगता है किसारे गलत काम (पढ़ें: सेक्स) केवल एक लड़की और लड़के के बीच ही हो सकते हैं. और इसीलिएलड़की और लड़के की परवरिश अलग-अलग ढंग से की जाती है. अपेक्षित होता है कि लड़की कीदोस्त लड़कियां हों और लड़कों के लड़के.समलैंगिकता हमारे समाज में इतनी दूर की चिड़िया है कि लोगों के दिमाग में ही नहींआता कि जो काम लड़का और लड़की साथ में कर सकते हैं, वो काम अपने ही 'जेंडर' केव्यक्ति के साथ भी तो कर सकते हैं. कहने का अर्थ ये कतई नहीं है कि लड़कों यालड़कियों के समलैंगिक होने के 'डर' से उन्हें हॉस्टल में न भेजे जाने की वकालत कररही हूं मैं. मैं इस प्रेमहीन समाज को समझने की कोशिश कर रही हूं, जहां किसी भी तरहका प्रेम करना एक नैतिक अपराध हो जाता है. चाहे वो होमो हो या स्ट्रेट.समलैंगिकता से हमारा परिचय जल्दी हो जाता है. मालूम बाद में पड़ता है. मुझे याद हैजब हम स्कूल में थे, एक अफवाह उड़ी कि फलानी लड़की को फलानी लड़की के साथ एक ही टॉयलेटमें पकड़ा आया दीदी ने. उसमें से एक लड़की हमारी बस में जाती थी. कुछ लोग कहते थे किउसकी शक्ल साइड से मुझसे मिलती है. मुझे ये गाली जैसा लगता था. मैं उन दोस्तों सेलड़ जाती, नाराज हो जाती. एक लेस्बियन से मेरा कुछ भी मैच होना मुझे अपराध सा लगताथा. खचाखच भरी स्कूल बस में भी मैं ये कोशिश करती रहती कि कहीं उससे छूते हुए ननिकल जाऊं.शुक्र है मेरे उस फैसले का, जिसके तहत मैंने घर से दूर पढ़ाई करना चुना और साहित्यजैसा लिबरल फील्ड चुना. और ये बात पढ़ते-पढ़ते, नए लोगों से मिलते हुए सीखा कि ये तोआम है. एक इंसान का दूसरे इंसान से प्रेम होना गलत कैसे हो सकता है? हम वही समाजहैं न, जहां रेप और हिंसा को हम बुरा मानते हैं. इंसानों के पढ़ने, अच्छा जीवन,अच्छी सैलरी के अधिकार के पक्ष में होते हैं. तो फिर प्रेम और सेक्स करने के अधिकारके पक्ष में क्यों नहीं होते? उससे तो किसी का बुरा भी नहीं होता, न?आज मुझसे कोई मेरा सेक्शुअल ओरिएंटेशन पूछता है, तो मैं कहती हूं कि मैं डिस्कवर कररही हूं.असल में हम सब अपना ओरिएंटेशन डिस्कवर कर रहे होते हैं, ताउम्र. हममें से अधिकतरलोग स्ट्रेट होते हैं, क्योंकि ये बचपन से सीखा गया सच होता है कि आप लड़की हैं, तोलड़के में इंटरेस्ट लेना ही आपका नॉर्मल बर्ताव होना चाहिए. और हम इसे निभाते भीहैं. इसीलिए अगर कोई केस ऐसा दिखता है, जब पुरुष को पुरुष या औरत को औरत मेंइंटरेस्ट होता है, हम इसे नॉर्मल नहीं मानते. जब कॉलेज में आकर मैंने सुना कि बाकीलड़कियां दो लड़कियों के बारे में दबी आवाज में बातें करती हैं, स्कूल का वो पूरामाजरा मेरी आंखों के आगे दौड़ गया. मुझे शर्मिंदगी हुई कि मैं कैसी थी. लेकिन हम सबऐसे ही थे. हममें से जो समलैंगिक हैं, वो भी ऐसे ही थे. आज भी कई लोग वैसे ही हैं,क्योंकि वो खुद ही ये महसूस करते रहते हैं कि वो कुछ गलत कर रहे हैं.***मैं कुछ 12-13 साल की थी, जब पड़ोसी के घर में बेबी हुआ. छुट्टी का दिन था. सोकर उठीकि सामने वाले दरवाजे पर ढोलक पिट रही है. मर्दाना आवाज में गीत सुनाई दे रहे हैं.असल में हिजड़ों की एक टोली गाने आई थी. रिवाज वही है, घर में कोई भी शुभ खबर हो,शादी, गृह प्रवेश या बच्चा होने की, हिजड़ों को शगुन देना आम बात होती है. पड़ोस वालीआंटी से हिजड़े 10 हजार रुपए मांग रहे थे. आंटी के पास इतने पैसे नहीं थे. वो अफोर्डही नहीं कर सकती थीं इतना देना. हिजड़े जब ज़बरदस्ती करने लगे, तो आंटी ने 100 नंबरपर फ़ोन किया. पुलिस ने साफ़ कहा, हम हिजड़ों के मामले में दखल नहीं देते. आप देखलीजिए.एक और पड़ोसी ने कहा, 'भाभी जो है दे दीजिए. ये लोग बड़े बद्तमीज होते हैं. पैसे नदो, तो नंगई करने लगते हैं. अरे वो अपने मल-मूत्र वाले अंग दिखाने लगते हैं. ये सबठीक नहीं लगता मोहल्ले में.''ये लोग बड़े बद्तमीज होते हैं.' ये शब्द मुझे याद हैं आज भी. किसी हिजड़े को देखतीहूं, तो बरबस याद आते हैं. जब हम घर में ऐसी बातें कहते हैं, तो हमारे बच्चे इसीसोच के साथ बड़े होते हैं. जैसे मैं हुई. दिल्ली में कभी किसी पुरुष दोस्त के साथहोती और हिजड़ा आ जाता तो डर सा लगता.फिर बड़े होने और पढ़ाई के इस सिलसिले में समझ आया कि हिजड़ों को मूल अधिकार भी नहींमिलते. वो अधिकार, जिन्हें हम बचपन से मानकर चलते हैं, उसके लिए उन्हें लड़ना पड़ताहै. मैं कोई कपड़ा पहनती हूं जो मुझे साइज़ में छोटा आता है, इतना जी घुटता है कितुरंत निकाल फेंकती हूं. तो उनका क्या जिनका अपने शरीर में दम घुटता है? जिन्हेंलगता है उनकी आत्मा को एक गलत शरीर में कैद कर दिया गया है. जिन हिजड़ों के लिए हमबड़े सहज रूप से भाषा में पुल्लिंग का चुनाव करते हैं, वो असल में पुल्लिंग होते हीनहीं हैं. स्त्रीलिंग भी नहीं होते. मुझे कभी-कभी हमारी भाषा की गरीबी पर शर्म आतीहै.काम के सिलसिले में हिजड़ा समुदाय की एक शख्स से मिली, तो उन्होंने मुस्कुराते हुएबताया, 'हम चमकीला मेकअप लगाते हैं, ताकि तुम हमें देख सको. हम ताली बजाकर बात करतेहैं, ताकि तुम हमें सुन सको.' हिजड़े अपने कपड़े उतारते हैं, तो आप पैसे दे देते हैं,क्योंकि आप डरते हैं. उनके असली स्वरुप से. वो स्वरुप जो न स्त्री का है, न पुरुषका. उससे आप डरते हैं. उस सच्चाई का आप सामना नहीं करना चाहते, क्योंकि वो आपकोआपके कम्फर्ट जोन से बाहर निकालती है.***हम सब एक हैं. समलैंगिक, स्ट्रेट, हिजड़े, बाईसेक्शुअल. हमारी आत्मा एक है. जिस तरहहमने एक-दूसरे को पैसों, जाति और धर्म के बेस पर बांटा है, उस तरह लिंग के बेस परभी बांट रखा है. जिस दिन हम ये समझ गए, उस दिन न कोई दंगा होगा, न किसी औरत का रेपहोगा, न किसी हिजड़े का क़त्ल होगा.--------------------------------------------------------------------------------पीपी के पिछले कॉलम:'लड़कों को भरे शरीर वाली लड़कियां अच्छी लगती हैं, थोड़ा वजन बढ़ा लो'हर रात रोते हैं तो आप प्यार में नहीं, परेशान हैंरेप करने के पहले वो औरत को पॉर्न क्यों दिखाते हैं?'इंटरव्यू के लिए जा रही हो, बिकिनी वैक्स करा लो, सेलेक्शन पक्का है'