सऊदी अरब. तेल की खदान. हमारे यहां तो पानी के कुएं होते हैं, पर वहां तेल के होतेहैं. तभी तो दुनियाभर से लोग सऊदी जॉब के लिए जाते हैं. और अपने साथ ले जाते हैंअमीर बनने का सपना. पर अब हालात अलग हैं. तेल के दामों में गिरावट के चलते वहां रहरहे मजदूरों की हालत खस्ता है. उनके पास काम नहीं है. जाहिर सी बात है, काम नहीं हैतो सैलरी भी नहीं होगी. ऐसे में घर पैसे भेजना तो दूर की बात है, उनका खुद का पेटपालना भी मुश्किल हो गया है. पिछले हफ्ते की बात है. बिहार के 40 मजदूर जो सऊदी गएथे, बैक टू होम हैं. ये सारे लोग सऊदी कंपनी औगर में काम करते थे. इन मजदूरों केमुताबिक कंपनी ने तो उन्हें बस मरने के लिए छोड़ दिया था. बता दें कि औगर साद हरीरीकी कंपनी है, जो कंस्ट्रक्शन का काम करती है. हरीरी लेबनान के प्रधानमंत्री रह चुकेहैं. एक टाइम था, जब इस कंपनी में 50 हजार से भी ज्यादा मजदूर काम करते थे. इसकंपनी में इलेक्ट्रीशियन का काम करने वाले इमाम हुसैन ने भी अपना टिकट सऊदी से कटालिया और दिल्ली पहुंचे. उन्होंने बताया, 'कंपनी ने अचानक कैंटीन में ताला लटकादिया. तीन दिन तक खाना तो दूर, हमारे पास पीने के लिए पानी तक नहीं था. बिजली नहींथी. और तो और, मुझे अरेस्ट कर लिया गया था, क्योंकि कंपनी ने मेरा आई कार्ड रिन्यूनहीं कराया था.' इमाम के साथ ही बिहार के संतोष ने भी बैक टू होम का टिकट कटा लियाथा. दिल्ली पहुंचकर बिहार की ट्रेन लेने से पहले उन्होंने भी अपनी दुखभरी दास्तांसुनायी. उन्होंने कहा, 'हम अपने घर पहुंच कर बहुत खुश हैं. बस जल्दी से जल्दीघर-परिवार को देखना चाहते हैं. और फिर जिंदगी को शुरु करना चाहते हैं.' हुसैन कीतरह लाखों लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं. इधर इंसानों के अधिकारों के लिए लड़नेवाले लोग कहते हैं कि इन मजदूरों का शोषण बहुत कॉमन बात है. इसकी कहीं सुनवाई भीनहीं होती. सऊदी अरब के कफाला सिस्टम के तहत विदेशी मजदूरों को उनका कॉन्ट्रैक्टओवर होने से पहले किसी दूसरी जगह नौकरी करने की परमिशन नहीं है. अगर बॉस परमिशन देदे, तो बात अलग है. बता दें कि भारत से लगभग 30 लाख लोग काम की तलाश में सऊदी जातेहैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल एक संस्था है जो ह्यूमन राइट्स के लिए काम करती है. उसकी2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग एक हजार लोगों को सऊदी जाने की परमिशन दी जातीहै. उसमें ज्यादातर संख्या में लोग बिहार से होते हैं. जाकिर हुसैन. साल 2013 मेंसऊदी के लिए इनका टिकट कटा था. जैसे ही कदम रखा, दिक्कतें शुरू. मानो जाकिर का हीउन्हें इंतजार था. इनकी सैलरी 30 हजार रुपये थी. ये बताते हैं, 'सिवान जिले मेंजहां मैं रहता हूं, वहां विदेशों में नौकरी के लिए अनाउंसमेंट मुनादी के जरिए होतीथी. मेरे घर में 15 लोग थे. उनकी और खुद की जिंदगी बनाने का सबसे शानदार तरीका थामेरा विदेश जाना. लेकिन मैं गलत था. दिसंबर से मुझे सैलरी नहीं मिली. सपने टूटकरबिखर गए. अब बस दुआ करता हूं कि मेरा बकाया पैसा मुझे मिल जाए.' शेख दिलशर. इस बंदेने 18 साल तक सऊदी औगर में काम किया है, लेकिन अब अपने घर पर हैं. उनका कहना है किउन्होंने अपना जीवन उनके लिए काम करने में खपा दिया, लेकिन बदले में उन्हें क्यामिला. उनके लगभग साढ़े सात लाख रुपए वहां फंसे पड़े हैं. अगस्त में भारत के विदेशमंत्रालय ने हजारों मजदूरों को स्वदेश लाने की पहल की थी, जिनके पास घर-वापसी केपैसे नहीं थे. इसके बाद सऊदी सरकार की आंखे खुली और उन्होंने भारत से गए लोगों कोखाना-पानी दिया. जो लोग घर वापस जाना चाहते थे, उनको भेजने का इंतजाम भी किया.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: सऊदी अरब के किंग सलमान की बेटी क्यों पगला गई! सऊदी अरब में शतरंज काखेल खतम