बिहार में जातिगत सर्वे जारी रहेगा, चुनौती वाली सारी याचिकाएं कोर्ट ने खारिज कर दीं
हाई कोर्ट ने सर्वे पर मई में अंतरिम रोक लगाई थी. फिर जुलाई में सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था.

पटना हाई कोर्ट ने बिहार में जातिगत सर्वे कराने को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं. इसका मतलब है कि नीतीश सरकार राज्य में जातीय सर्वेक्षण जारी रख सकती है. बिहार सरकार के जातिगत सर्वे कराने के फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई थीं. इन याचिकाओं में कोर्ट से जातिगत सर्वे पर रोक लगाने की मांग की गई थी.
पटना हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए राजद (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा,
"यह गरीबों के लिए दिया गया फैसला है. इससे गरीबों के लिए (आगे बढ़ने के) दरवाजे खुलेंगे. सर्वेक्षण के बाद, उनकी आर्थिक स्थिति का पता चल जाएगा और उस आधार पर, सरकार उनके लिए योजनाओं का मसौदा तैयार करेगी. इससे विकास के द्वार खुलेंगे. मैं CM और तेजस्वी यादव को धन्यवाद देता हूं, उन्होंने कड़ी मेहनत की."
वहीं बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और BJP नेता सुशील मोदी हाई कोर्ट के फैसले पर ट्वीट किया,
सर्वे पर कोर्ट ने मई में लगाया था स्टे"जातीय गणना पर हाई कोर्ट के फैसले का हम स्वागत करते हैं. राज्य सरकार ने शुरू में ही अच्छी तरह बहस की होती तो यह नौबत नहीं आती. BJP सरकार ने ही बिहार में जातीय गणना का फैसला लिया था."
इंडिया टुडे के रोहित कुमार सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में जातिगत सर्वेक्षण दो चरणों में कराए जाने की योजना बनाई गई थी. पहले चरण के तहत परिवारों की गिनती होनी थी. इसे इसी साल 7 जनवरी को शुरू किया गया और 21 जनवरी तक ये गिनती पूरी हो गई थी. सर्वेक्षण का दूसरा चरण 15 अप्रैल को शुरू हुआ, जिसमें लोगों की जाति और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ा डेटा जुटाना था.
पूरी प्रक्रिया इस साल मई तक पूरा करने की योजना थी. हालांकि, इसके खिलाफ जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने 4 मई को इस पर अंतरिम रोक लगा दी थी. हाई कोर्ट की ओर से कहा गया था कि प्रथम दृष्टया ये सर्वे ‘जनगणना’ की तरह लग रहा है, जिसे कराने की शक्ति राज्य सरकार के पास नहीं है.
सर्वे पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश देते हुए पटना हाई कोर्ट ने कहा था ‘जनगणना’ सिर्फ केंद्र सरकार ही करा सकती है. कोर्ट की ओर से तब कहा गया था,
"हमने पाया है कि सर्वेक्षण की आड़ में ये जाति-आधारित सर्वेक्षण एक जनगणना है; इसे पूरा करने की शक्ति विशेष रूप से केंद्रीय संसद पर है, जिसने जनगणना अधिनियम, 1948 भी बनाया है."
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार सरकार ने पटना हाई कोर्ट को बताया था कि वह राज्य के लोगों की जाति और सामाजिक-आर्थिक कल्याण पर डेटा जुटाने के लिए जाति-आधारित सर्वेक्षण कराने में समर्थ है.
बिहार सरकार की ओर से ये भी कहा गया कि लोगों को अपनी जाति बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है. सर्वे में लोगों की भागीदारी उनकी मर्जी पर निर्भर है और ये बात इसे जाति-आधारित ‘जनगणना’ से अलग बनाती है क्योंकि जनगणना में जाति की घोषणा अनिवार्य होती है.
जुलाई में लगातार पांच दिन सुनवाईइस मामले पर पटना हाई कोर्ट में जुलाई महीने में लगातार पांच दिन (3 जुलाई से 7 जुलाई) सुनवाई हुई. कोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ताओं और बिहार सरकार की दलीलें सुनीं. सुनवाई के अंतिम दिन भी राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पीके शाही ने कोर्ट को बताया था कि यह सर्वेक्षण है. इसका मकसद आम नागरिकों के बारे में सामाजिक अध्ययन के लिए आंकड़े जुटाना है. इसका इस्तेमाल आम लोगों के कल्याण और हित के लिए किया जाएगा.
पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस पार्थ सार्थी की बेंच ने इस मामले पर 7 जुलाई को ही अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था. अब कोर्ट ने जातिगत सर्वे को लेकर मंगलवार, 1 अगस्त को अपना फैसला सुनाया है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा कि ये सर्वे कानूनी तौर पर पूरी तरह 'वैध' है और 'न्याय के साथ विकास' करने के उचित उद्देश्य से लाया गया है.
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