रास्ते हमारी अलग-अलग वास्तविकताओं के बीच का पुल होते हैं
रास्ते में आप सचमुच कुछ भी हो सकते हैं- अपना अतीत या अपना भविष्य या फिर और कुछ भी जो आपके बिजनेस कार्ड पर कभी नहीं छपेगा. सफ़र में किसी आत्मीय के साथ बैठे हुए भी आप ज़्यादातर समय चुप रह सकते हैं क्योंकि आपको ये मालूम होता है कि वे भी इस वक़्त खुद से संवाद कर रहे हैं.

एक से दूसरे शहर के रास्ते में होना उन दोनों शहरों की सच्चाइयों को स्थगित कर देता है. एक बड़े शहर में तुम छोटी ड्रेस पहन सकती हो और एक छोटे शहर में तुम्हें सलवार सूट या फुल पैंट ही पहनना होगा. लेकिन दोनों शहरों के बीच के रास्ते में तुम कुछ भी पहन सकते हो. एक शहर में तुम अपने मां-पिता की औलाद हो और दूसरे में एक कंपनी की कर्मचारी. लेकिन उन शहरों को जोड़ते हाईवे में तुम कुछ भी हो सकते हो और कुछ नहीं भी हो सकते हो.

रास्तों में कई बार बदबूदार पेशाबघरों का इस्तेमाल करना पड़ता है, रुककर पीठ सीधी करनी पड़ती है, ज्यादा मीठी चाय पीनी पड़ती है, कई बार उस चाय के बाद का स्वाद मुंह बासी करता रहता है और कई बार यूं भी लगता है कि अब जल्दी ही घर पहुंच जाएं और अपना कमरा वापस मिल जाए, तो कितना अच्छा हो. मगर अपने घर और कमरे के साथ बाहें फैलाए कई अधूरे पड़े काम, जिम्मेदारियां और लेने के लिए फैसले मुंह बाए खड़े रहते हैं. कभी-कभी फैसले छोटे ही होते हैं, जैसे कि आज डिनर में क्या बने, मगर आप इतना थका हुआ महसूस करते हैं कि उस बारे में सोचना नहीं चाहते.

आप रास्ते में हों और किसी का किसी काम को लेकर कोई फोन आ जाए तो आप चाहकर भी कुछ कर नहीं सकते क्योंकि आप रास्ते में होते हैं. रास्ते में हम वो सबकुछ सोच सकते हैं जो घर या दफ्तर में नहीं सोचते, जैसे सड़क से लगे गांव में कितने परिवार होंगे, राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ इतनी कर्कश क्यों लगती है, ऊंचे पेड़ हवा में झुके हुए यूं लगते हैं जैसे हरेक पेड़ में एक-एक बिल्ली की आत्मा आ गई हो, टोल से लगे ढाबे की कितनी कमाई होती है या फिर अपनी पसंद के वो गीत याद क्यों नहीं आते जिन्हें झटपट प्ले किया जा सके और दो गीतों के बीच एक सेकंड का भी फासला न हो.
रास्ते में आप सचमुच कुछ भी हो सकते हैं- अपना अतीत या अपना भविष्य या फिर और कुछ भी जो आपके बिजनेस कार्ड पर कभी नहीं छपेगा. सफ़र में किसी आत्मीय के साथ बैठे हुए भी आप ज़्यादातर समय चुप रह सकते हैं क्योंकि आपको ये मालूम होता है कि वे भी इस वक़्त खुद से संवाद कर रहे हैं. असल में कई बार चुप रहना बोलने से ज्यादा सहज और आत्मीय होता है.

घर पहुंचते-पहुंचते थकान बढ़ती जाती है और आराम के प्रति आकर्षण भी. मगर अपनी असल भूमिकाओं में वापस लौटते हुए पता लगता है कि आराम शायद कुछ है ही नहीं. क्योंकि जब हम सफ़र के लिए निकलते हैं तो आराम की तलाश में ही निकलते हैं. आराम का ख़याल भी खुद को छलने का तरीका है. रास्ते का सच्चाइयों और भूमिकाओं को स्थगित कर देना ही शायद वजह है कि लोग उन्हें तस्वीरों और इन्स्टाग्राम रील्स में कैद कर लेना चाहते हैं. रास्ते के लिए अच्छा खाना पैक करना चाहते हैं और अपनी पसंदीदा प्लेलिस्ट बनाना चाहते हैं. लोग गूगल मैप्स पर रास्तों को पढ़ लेना चाहते हैं, जाम लगने के लिए जी कड़ा करना चाहते हैं ताकि ये समझ सकें कि ये रिश्ता ठीक-ठीक कितना लंबा चलने वाला है.
रास्ते सिर्फ दूरी और वक़्त का माप नहीं होते. वे हमारी अलग-अलग वास्तविकताओं के बीच का पुल होते हैं. शायद हम सभी डॉक्टर स्ट्रेंज हैं.
(इस राइट अप को दी लल्लनटॉप के साथ जुड़ी रहीं प्रतीक्षा पांडेय ने लिखा है)
वीडियो- इन पहाड़ी सुपरफूड के फायदों के बारे में जान लीजिए.

