क्या कोर्ट में मामला होने पर सरकार कानून से बनाएगी राम मंदिर?
कल से शुरू होने वाले शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार क्या करने वाली है?
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फोटो - thelallantop
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परफेक्ट टाइमिंग की जब भी बात चलेगी 10-दिसंबर-2018 की तारीख याद रखी जाएगी. ये टाइमिंग मानवाधिकार दिवस पर भारत- ऑस्ट्रेलिया के पहले टेस्ट मैच में नज़र नहीं आई है. राजनीति में नज़र आई, जब उपेन्द्र कुशवाहा ने खुद को NDA से OUT किया है. इस्तीफे के लिहाज़ से सर्वश्रेष्ठ समय है. क्योंकि अगले ही दिन संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने को था .
टाइमिंग की डीटेलिंग पर जाइए.
1- ये सत्र लोकसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार के कार्यकाल का आख़िरी पूर्ण संसद सत्र होगा. 2- सत्र के पहले NDA और विपक्ष अपनी-अपनी रणनीतियों को लेकर मीटिंग कर रहे हैं. 3- सत्र, उस दिन शुरू होगा, जिस दिन 5 राज्यों से विधानसभा चुनावों के नतीजे आने वाले हैं, और 2019 की दिशा तय होने वाली है.
तो अपन बात करेंगे उन अहम मुद्दों की जिन पर सबकी नज़र रहेगी.

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इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर अब तक, कब-कब, क्या-क्या हुआ?
1- शुरुआत तब हुई थी, जब 2015 में उत्तराखंड की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक को चुनौती देते हुए, केस दायर किया. सुप्रीम कोर्ट ने 4 अन्य महिलाओं के मामले भी इसमें जोड़ दिए थे. 2- बाद में पांच जजों की बेंच ने 22 अगस्त 2017 को 3-2 से फैसला सुनाया कि ट्रिपल तलाक की प्रथा असंवैधानिक है. 3- कोर्ट ने सरकार को छह महीने के अंदर इसके खिलाफ कानून बनाने का आदेश दिया था. 4- सरकार ने कोशिश की, ट्रिपल तलाक़ बिल लाए, जो लोकसभा में तो पास हो गया लेकिन राज्यसभा में नहीं हो सका. 5- मजबूरन सरकार ने 19 सितंबर 2018 को अध्यादेश के जरिये बिल लागू कर दिया. अब बिल फिर संसद पहुंचेगा, जहां उसे पास होना ही होगा वर्ना उसे निरस्त कर दिया जाएगा.

नए विधेयक के बाद उपभोक्ता को हल्का समझने वाले पछताएंगे, वो हल्क बन सकता है|
क्या है ख़ास? 1. ये बाज़ार की नई जरूरतों के हिसाब से है. मतलब भ्रामक ऐड, डिजिटल ट्रांजैक्शन, ई-कॉमर्स जैसी नई चुनौतियों के लिए इसमें नियम हैं. अब ऐड में दिखने वाले सेलेब्रिटीज की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी . 2. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी और उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम बनाए जाएंगे. 10 करोड़ तक के मामलों की सुनवाई हो सकेगी, अथॉरिटी को कैद और जुरमाना देने का अधिकार होगा. 3. इसके अलावा इलीगल कांट्रेक्ट, खराब प्रोडक्ट से हुए नुकसान, मिलावट को लेकर भी अलग-अलग प्रावधान बनाए जाएंगे.
इसका इलाज़, NMC Bill! क्या है बिल में?
1- 25 आयोगों का नया आयोग, जहां MCI में इलेक्टेड लोग होते थे, इसमें नॉमिनेटेड लोग होंगे. 2- प्राथमिक प्राइमरी हेल्थ केयर में सुधार लाने के लिए एक ब्रिज-कोर्स भी लाया जाएगा. 3- देश भर में दाख़िले के लिए एक ही परीक्षा होगी. 4- प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एक निर्धारित संख्या की सीट्स की फीस सरकार अपने हिसाब से तय करेगी. बाकी की सीट्स पर प्राइवेट कॉलेज फीस तय करेंगे. 5- एमबीबीएस के बाद आगे की पढ़ाई या प्रैक्टिस के लिए एक परीक्षा पूरे देश में एक साथ कराई जाएगी.
जवाब - टाइटल सूट चल रहा है.
सवाल - ये टाइटल-टाइटल क्या है?
जवाब- ऐसा समझिए कि ज़मीनी विवाद है. 6 दिसंबर 1992, बाबरी मस्जिद गिरी. 7 जनवरी, 1993 को केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर मंदिर से जुड़ी हुई 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया. इस 67 एकड़ में विवादित जमीन का 120*80 फीट हिस्सा था. जहां से “राम जन्मभूमि विवाद” नाम आया.
फिर क्या हुआ? 30 सितंबर, 2010 को राम जन्मभूमि विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया. कहा गया, “अयोध्या सबकी.” विवादित जमीन को रामलला, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर हिस्से में बांट दिया. तब तो सब चकाचक हो गया होगा? नहीं रे धोंधू...दिसंबर, 2010 में हिंदू महासभा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. वही टाइटल सूट अब तक चल रहा है. 29 अक्टूबर को इस पर सुनवाई हुई, जो सिर्फ 3 मिनट में ख़त्म हो गई थी. तब जस्टिस गोगोई ने कहा था कि “ये मामला अर्जेंट सुनवाई के तहत नहीं सुना जा सकता है.” इस टिप्पणी को लेकर कई संगठनों में बहुत रोष भी रहा. (याकूब मेमन के लिए आधी रात को कोर्ट खुलती है, रामलला के लिए टाइम नहीं टाइप्स)
फिलहाल बड़ा सवाल

क्या अगर कोर्ट में केस चल रहा है तो सरकार कोई बिल ला सकती है? क़ानून बना सकती है. जब हमने क़ानून के जानकारों से बात की तो उनका कहना था कि टेक्निकली संसद की शक्तियां न्यायपालिका से ज़्यादा हैं. क्योंकि क़ानून वहीं बनते हैं, अगर संसद को लगता है कि देश के लिए कोई क़ानून बनना है तो उन्हें रोका नहीं का जा सकता. पेच सिर्फ इस बात पर फंसेगा कि सरकार क्या राजनैतिक फायदे के लिए ये क़ानून बना रही है?
विधानसभा चुनाव के नतीजे आने को हैं और उनके नतीजे अगर ऊपर-नीचे हुए तो मोदी सरकार, राम मंदिर को लेकर कुछ बड़े कदम उठा सकती है, क्या होगा क्या नहीं. आने वाले समय में दिख जाएगा.
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मुद्दे सिर्फ इतने ही नहीं हैं, कांग्रेस की पूरी तैयारी है कि वो सरकार को महिला आरक्षण बिल पर पर घेरे. राहुल गांधी ने इसी की तैयारी में हैं, पंजाब, पुड्डूचेरी और कर्नाटक, यानी जहां-जहां कांग्रेस की सरकार है, राहुल ने उन्हें चिट्ठी लिखी है, कहा है कि अपनी विधानसभाओं में इस बिल के समर्थन में प्रस्ताव पारित करें और केंद्र सरकार को भेजें. ओडिशा में बीजेडी और आंध्र में टीडीपी पहले ही प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज चुकी हैं, 8-9 राज्य ऐसा कर दें तो केंद्र सरकार पर संविधान संशोधन का दवाब बढ़ जाएगा.
इसके अलावा विपक्षी दल केंद्र को रफाएल डील पर घेरने के लिए तैयार खड़ी हैं. साथ ही आज के उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद, आरबीआई का मुद्दा भी सरकार के गले की फांस बनने वाला है.

टाइमिंग की डीटेलिंग पर जाइए.
1- ये सत्र लोकसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार के कार्यकाल का आख़िरी पूर्ण संसद सत्र होगा. 2- सत्र के पहले NDA और विपक्ष अपनी-अपनी रणनीतियों को लेकर मीटिंग कर रहे हैं. 3- सत्र, उस दिन शुरू होगा, जिस दिन 5 राज्यों से विधानसभा चुनावों के नतीजे आने वाले हैं, और 2019 की दिशा तय होने वाली है.
तो अपन बात करेंगे उन अहम मुद्दों की जिन पर सबकी नज़र रहेगी.
मुद्दा नंबर- 1- ट्रिपल तलाक़
शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार ट्रिपल तलाक़ बिल को हर हाल में पास कराना चाहती है. और इंस्टेंट तलाक को गैर-कानूनी बनाए रखना चाहती है.
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इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर अब तक, कब-कब, क्या-क्या हुआ?
1- शुरुआत तब हुई थी, जब 2015 में उत्तराखंड की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक को चुनौती देते हुए, केस दायर किया. सुप्रीम कोर्ट ने 4 अन्य महिलाओं के मामले भी इसमें जोड़ दिए थे. 2- बाद में पांच जजों की बेंच ने 22 अगस्त 2017 को 3-2 से फैसला सुनाया कि ट्रिपल तलाक की प्रथा असंवैधानिक है. 3- कोर्ट ने सरकार को छह महीने के अंदर इसके खिलाफ कानून बनाने का आदेश दिया था. 4- सरकार ने कोशिश की, ट्रिपल तलाक़ बिल लाए, जो लोकसभा में तो पास हो गया लेकिन राज्यसभा में नहीं हो सका. 5- मजबूरन सरकार ने 19 सितंबर 2018 को अध्यादेश के जरिये बिल लागू कर दिया. अब बिल फिर संसद पहुंचेगा, जहां उसे पास होना ही होगा वर्ना उसे निरस्त कर दिया जाएगा.
मुद्दा नंबर -2- उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2018
साल 2018 की जनवरी यानी पिछले शीतकालीन सत्र के आख़िरी दिन सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2018 को लोकसभा में पेश किया था. लेकिन तब इस पर चर्चा नहीं हो सकी थी. इस बिल के पास होने के बाद ये पुराने ‘उपभोक्ता संरक्षण कानून -1986’ की जगह ले लेगा और उपभोक्ता अदालतों को इससे शक्तियां मिलेंगी.
नए विधेयक के बाद उपभोक्ता को हल्का समझने वाले पछताएंगे, वो हल्क बन सकता है|
क्या है ख़ास? 1. ये बाज़ार की नई जरूरतों के हिसाब से है. मतलब भ्रामक ऐड, डिजिटल ट्रांजैक्शन, ई-कॉमर्स जैसी नई चुनौतियों के लिए इसमें नियम हैं. अब ऐड में दिखने वाले सेलेब्रिटीज की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी . 2. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी और उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम बनाए जाएंगे. 10 करोड़ तक के मामलों की सुनवाई हो सकेगी, अथॉरिटी को कैद और जुरमाना देने का अधिकार होगा. 3. इसके अलावा इलीगल कांट्रेक्ट, खराब प्रोडक्ट से हुए नुकसान, मिलावट को लेकर भी अलग-अलग प्रावधान बनाए जाएंगे.
मुद्दा नंबर- 3- एनएमसी बिल
एनएमसी बिल यानी नेशनल मेडिकल कमीशन बिल. मोदी सरकार का चिकित्सा के क्षेत्र में एक अच्छा कदम. इसकी ज़रूरत तब पडी जब 26 सितंबर 2018 को केंद्र ने अध्यादेश के जरिये मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को भंग कर दिया था. मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया, मतलब 84 साल पुरानी वो संस्था जो देश में मेडिकल से जुड़ी हर चीज, कॉलेज-कोर्स-डॉक्टर-कॉलेज को चलाती थी. और करप्शन का अड्डा बन गई थी. प्रधानमंत्री खुद मानते हैं कि मेडिकल क्षेत्र में माफिया की तरह काम किया जा रहा है. जिसे ख़त्म करने के लिए MCI का हटना और उसकी जगह एक नई व्यवस्था का आना जरूरी था.इसका इलाज़, NMC Bill! क्या है बिल में?
1- 25 आयोगों का नया आयोग, जहां MCI में इलेक्टेड लोग होते थे, इसमें नॉमिनेटेड लोग होंगे. 2- प्राथमिक प्राइमरी हेल्थ केयर में सुधार लाने के लिए एक ब्रिज-कोर्स भी लाया जाएगा. 3- देश भर में दाख़िले के लिए एक ही परीक्षा होगी. 4- प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एक निर्धारित संख्या की सीट्स की फीस सरकार अपने हिसाब से तय करेगी. बाकी की सीट्स पर प्राइवेट कॉलेज फीस तय करेंगे. 5- एमबीबीएस के बाद आगे की पढ़ाई या प्रैक्टिस के लिए एक परीक्षा पूरे देश में एक साथ कराई जाएगी.
मुद्दा नंबर- 4- राम मंदिर
सरकार पर राम मंदिर को लेकर कोई क़ानून या अध्यादेश लाने का चौतरफा दबाव था. सरकार के शीतकालीन एजेंडे में राम मंदिर का ज़िक्र तक नज़र नहीं आता है. एकाध उत्साही सांसद जरूर प्राइवेट मेंबर बिल का ज़िक्र कर रहे थे, लेकिन ज़िक्र आगे नहीं बढ़ा. पर फिर भी एक बात तय है, इस बार संसद में राम मंदिर का मुद्दा गर्माएगा तो जरूर. लेकिन संसद में कुछ हो न हो, उससे पहले हमें कुछ बातें समझ लेनी चाहिए. कि कोर्ट में क्या चल रहा है और संसद में क्या हो सकता है? सवाल- कोर्ट में क्या चल रहा है?जवाब - टाइटल सूट चल रहा है.
सवाल - ये टाइटल-टाइटल क्या है?
जवाब- ऐसा समझिए कि ज़मीनी विवाद है. 6 दिसंबर 1992, बाबरी मस्जिद गिरी. 7 जनवरी, 1993 को केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर मंदिर से जुड़ी हुई 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया. इस 67 एकड़ में विवादित जमीन का 120*80 फीट हिस्सा था. जहां से “राम जन्मभूमि विवाद” नाम आया.
फिर क्या हुआ? 30 सितंबर, 2010 को राम जन्मभूमि विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया. कहा गया, “अयोध्या सबकी.” विवादित जमीन को रामलला, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर हिस्से में बांट दिया. तब तो सब चकाचक हो गया होगा? नहीं रे धोंधू...दिसंबर, 2010 में हिंदू महासभा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. वही टाइटल सूट अब तक चल रहा है. 29 अक्टूबर को इस पर सुनवाई हुई, जो सिर्फ 3 मिनट में ख़त्म हो गई थी. तब जस्टिस गोगोई ने कहा था कि “ये मामला अर्जेंट सुनवाई के तहत नहीं सुना जा सकता है.” इस टिप्पणी को लेकर कई संगठनों में बहुत रोष भी रहा. (याकूब मेमन के लिए आधी रात को कोर्ट खुलती है, रामलला के लिए टाइम नहीं टाइप्स)
फिलहाल बड़ा सवाल

क्या अगर कोर्ट में केस चल रहा है तो सरकार कोई बिल ला सकती है? क़ानून बना सकती है. जब हमने क़ानून के जानकारों से बात की तो उनका कहना था कि टेक्निकली संसद की शक्तियां न्यायपालिका से ज़्यादा हैं. क्योंकि क़ानून वहीं बनते हैं, अगर संसद को लगता है कि देश के लिए कोई क़ानून बनना है तो उन्हें रोका नहीं का जा सकता. पेच सिर्फ इस बात पर फंसेगा कि सरकार क्या राजनैतिक फायदे के लिए ये क़ानून बना रही है?
विधानसभा चुनाव के नतीजे आने को हैं और उनके नतीजे अगर ऊपर-नीचे हुए तो मोदी सरकार, राम मंदिर को लेकर कुछ बड़े कदम उठा सकती है, क्या होगा क्या नहीं. आने वाले समय में दिख जाएगा.
मुद्दा नंबर- 5- महिला आरक्षण बिल

Symbolic Iamge| कि इमेजेज ऐसी और भी आएं| Image Courtesy- Outlook India
मुद्दे सिर्फ इतने ही नहीं हैं, कांग्रेस की पूरी तैयारी है कि वो सरकार को महिला आरक्षण बिल पर पर घेरे. राहुल गांधी ने इसी की तैयारी में हैं, पंजाब, पुड्डूचेरी और कर्नाटक, यानी जहां-जहां कांग्रेस की सरकार है, राहुल ने उन्हें चिट्ठी लिखी है, कहा है कि अपनी विधानसभाओं में इस बिल के समर्थन में प्रस्ताव पारित करें और केंद्र सरकार को भेजें. ओडिशा में बीजेडी और आंध्र में टीडीपी पहले ही प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज चुकी हैं, 8-9 राज्य ऐसा कर दें तो केंद्र सरकार पर संविधान संशोधन का दवाब बढ़ जाएगा.
इसके अलावा विपक्षी दल केंद्र को रफाएल डील पर घेरने के लिए तैयार खड़ी हैं. साथ ही आज के उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद, आरबीआई का मुद्दा भी सरकार के गले की फांस बनने वाला है.


