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मर्ज़ी से शादी करना गुनाह है तो क्यों पूछते हो क़ुबूल है?

पाकिस्तान में मां-बेटे ने लड़की को जिंदा जला दिया, क्योंकि उसने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी.

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Source- Reuters
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15 जून 2016 (Updated: 15 जून 2016, 11:45 AM IST)
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पाकिस्तान के लाहौर में एक लड़की को मां ने अपने बेटे के साथ मिलकर सिर्फ इसलिए ज़िंदा जला दिया, क्योंकि 17 साला लड़की ने अपनी मर्ज़ी से हमसफ़र चुन लिया था. जब से ये खबर मिली सोच रहा हूं ये कौन सी मां थी. ये हरगिज़ वो मां नहीं हो सकती है, जिसके लिए इस्लाम में कहा गया है मां के पांव तले जन्नत होती है. ये कौन सा गुनाह था जिसके लिए लड़की को ज़िंदा जला दिया जाए. लड़की ने तो सिर्फ अपनी मर्ज़ी से शादी की थी. अगर ये गलत था तो फिर निकाह के वक़्त मौलवी साहब क्यों मर्ज़ी पूछते है. क्यों पूछते हैं कि क्या तुम्हें ये निकाह क़ुबूल है? पाकिस्तान की ज़ीनत ने 29 मई को अपनी मर्ज़ी से हसन खान से शादी की थी. उसने घरवालों से कई बार अपनी मर्ज़ी का इज़हार किया था, लेकिन घरवाले इस फैसले से शदीद नाराज़ थे. हसन खान के मुताबिक ज़ीनत के घरवाले ये भरोसा दिलाकर उसे घर वापस ले गए कि वो बकायदा ज़ीनत को रुखसत करेंगे. ज़ीनत घर जाने को राज़ी नहीं थी. उसे अपनी जान की फ़िक़्र थी. घर लाने के बाद उसकी मां ने तेल छिड़ककर ज़ीनत को ज़िंदा जला दिया. पुलिस हिरासत में आने के बाद बेदर्द मां ने अपने जुर्म का इक़बाल किया तो उसे जेल भेज दिया गया. फरार हुए ज़ीनत के भाई को भी पुलिस ने दबोचकर जेल में डाल दिया. मामला अदालत में है.
इस खबर को सुनने के बाद दिमाग में सवाल कौंधता है. ये कौन सी इज़्ज़त है, जिसको बचाने के लिए क़त्ल उनकी नज़र में कोई गुनाह नहीं. इस्लाम में मां को आला दर्जा दिया गया है. बाप से भी बढ़कर मां को अहमियत दी गयी है. कैसा बेदर्द दिल होगा जो बेटी के जलने पर न तड़पा होगा. ऐसी वारदात बताती है. हम इज़्ज़त के नाम पर या धर्म के नाम पर ढकोसले वाली ज़िंदगी जी रहे हैं.
क़ुरान कहता है कि दीने-इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं है. फिर क्यों लड़की को उस इज़्ज़त के लिए ज़िंदा जला दिया, जो इज़्ज़त बाद में खुद ही जलकर ख़ाक हो गई. इज़्ज़त के बनावटी लबादे में लिपटे लोग ये क्यों नहीं समझते. लड़की को मारना-पीटना भी गुनाह है. तुम्हारी नज़र में अपनी मर्ज़ी से शादी करना गुनाह है तो तुम कौन होते हो सजा देने वाले? कम से कम क़ुरान के इस मैसेज को देखकर ही बाज़ आ जाओ, जिसमें कहा गया है. जो बुरे काम करे और उसके गुनाह उसे घेर लें, तो ऐसे लोग दोज़ख वाले हैं. बेटी को मार देने वालों क्या तुम्हें ये नहीं मालूम, जब अरब में लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था, तो मुहम्मद साहब ने उन्हें बचाने की पहल की और महिलाओं को अहम मक़ाम दिया गया. क्यों नबी को भूलकर जाहिल अरबियों के नक़्शे कदम पर चल रहे हो. उन्होंने लड़की के पैदा होते ही बोझ समझकर मारा. तुम झूठी शान के लिए बेटियों को जला रहे हो क़त्ल कर रहे हो.

निकाह से पहले क्यों लेते हो इजाज़त

अगर मर्ज़ी से शादी करना गुनाह है तो फिर इस्लाम के मुताबिक शादी करने के कांसेप्ट में थोड़ा हेरफेर करना पड़ेगा. मौलवी साहब दूल्हा-दुल्हन से पूछते है. फलां के दुख्तर (बेटी) या फलां के फ़रज़ंद (बेटे) तुम्हारा निकाह फलां के साथ किया जाता है. क्या तुम्हें क़ुबूल है ? इस बात को तुम्हें हटाना पड़ेगा. तभी अपनी ज़बरदस्ती करते हुए अच्छे लगोगे. ये बात फॉर्मेलिटी के लिए लागू नहीं की गई थी, बल्कि इस्लाम ने इसे ज़रूरी माना था, तभी रज़ामंदी लेने का प्रावधान किया गया था. जब बेटा या बेटी की शुरू से ही मर्ज़ी नहीं है तो फिर लास्ट में ही ये पूछने का क्या मतलब रह जाता है कि क्या तुम्हे ये निकाह क़ुबूल है.

ये खबर मोहम्मद असगर ने की है.


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