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पाकिस्तान और तालिबान की 'दोस्ती' दुश्मनी में कैसे बदली? जंग की नौबत आ गई!

Pakistan ने हमेशा इस बात से इनकार किया है कि Taliban को बनाने या उसे मजबूत करने में उसका कोई योगदान रहा है. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि तालिबान आंदोलन की शुरुआत में पाकिस्तान के मदरसों से निकले लोग इससे जुड़े थे.

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26 दिसंबर 2024 (पब्लिश्ड: 03:20 PM IST)
Pakistan Air Strike
पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक में 46 लोगों की मौत हो गई. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)
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पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबान (Pak-Taliban Conflict) के बीच तनाव बढ़ते जा रहे हैं. 24 दिसंबर की रात को पाकिस्तान के एयरस्ट्राइक में अफगानिस्तान के 46 लोगों की मौत हो गई. वहां की तालिबान सरकार ने कहा कि मरने वालों में अधिकतर महिलाएं और बच्चे थे. अब तालिबान ने इस हमले का जवाब देने का एलान किया है.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 15 हजार तालिबानी लड़ाके अफगानिस्तान के काबुल, कांधार और हेरात से निकलकर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के मीर अली बॉर्डर की ओर बढ़ रहे हैं. तालिबान प्रवक्ता ने कहा है कि पाकिस्तान को उसकी कार्रवाई का "मुंहतोड़ जवाब” मिलेगा.

पाकिस्तान और तालिबान का आपसी रिश्ता जटिल रहा है. एक वक्त पर दोनों में दोस्ती थी जो अब “जंग की स्थिति” में पहुंच गई है. 

Taliban का Pakistani कनेक्शन

पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान में एक भाषा बोली जाती है, पश्तू. इसको पश्तून या पख्तू भी कहते हैं. तालिबान नाम इसी जुबान से आया है. पश्तू में इसका अर्थ है- छात्र. 90 के दशक में अफगानिस्तान में गृहयुद्ध हुआ था. इसी दौरान वहां सोवियत संघ का हस्तक्षेप हुआ. इसी दशक के अंत में सोवियत संघ ने अपने सैनिकों को वहां से वापस बुलाना शुरू किया. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इसी अवधि में तालिबान का उभार हुआ.

कहा जाता है कि तालिबान का जन्म धार्मिक मदरसों में हुआ और सऊदी अरब ने उसको फंड्स दिए. इसके बाद तालिबान का फैलाव पाकिस्तान और अफगानिस्तान के पश्तून इलाकों में हुआ. इन इलाकों में तालिबान ने वादा किया कि वो शांति और सुरक्षा के लिए यहां शरिया कानून को लागू करेंगे. 1995 में ईरान की सीमा से लगे हेरांत प्रांत पर तालिबान ने कब्जा कर लिया. और इसके एक साल बाद अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर भी तालिबानियों का कब्जा हो गया.

ये भी पढ़ें: पढ़ नहीं सकतीं, गा नहीं सकतीं, तालिबान के राज में अफगान महिलाएं और क्या-क्या नहीं कर सकतीं?

तालिबान ने तत्कालीन राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी को सत्ता से हटाया. 1998 तक अफगानिस्तान के अधिकतर हिस्सों पर तालिबान का कब्जा हो गया था. इस बीच उन्होंने अफगानिस्तान के लोगों के लिए कई ऐसे निर्णय लिए जो मानवाधिकर के खिलाफ थे. 2001 तक अंतरराष्ट्रीय स्तर तालिबान का विरोध होने लगा. हालांकि, इसके बावजूद उन्होंने अपना रूख जारी रखा.

तालिबान सरकार को पाकिस्तान की मान्यता

पाकिस्तान ने हमेशा इस बात से इनकार किया है कि तालिबान को बनाने या उसे मजबूत करने में उसका कोई योगदान रहा है. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘तालिबान आंदोलन’ की शुरुआत में पाकिस्तान के मदरसों से निकले लोग इससे जुड़े थे. अफगानिस्तान पर जब तालिबानियों का कब्जा था, तब उसे तीन देशों ने मान्यता दी थी. इसमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के अलावा पाकिस्तान भी शामिल था.

जब दुनिया भर के देश तालिबान से अपना राजनयिक संबंध खत्म कर रहे थे, तब पाकिस्तान ऐसा करने वाले आखिरी देशों में से था. इसके बाद तालिबान ने पाकिस्तान को अस्थिर करने की धमकी दी. 2012 में तालिबान ने पाकिस्तान में मलाला युसुफजई को गोली मार दी. मलाला घायल हो गईं. इसके एक साल बाद अमेरिका के ड्रोन हमले में हकीमुल्ला मेहसूद सहित तीन बड़े तालिबानी नेता मारे गए. ये तीनों पाकिस्तान में तालिबान की कमान संभाल रहे थे.

2001 का 9/11 अटैक

11 सितंबर, 2001 को न्यूयॉर्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ. तालिबान पर गंभीर आरोप लगे. उस पर ओसामा बिन लादेन और अल कायदा के लड़ाकों को शरण देने का आरोप लगा. अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की. और इस तरह अफगानिस्तान में तालिबान का शासन खत्म हो गया.

इसके बाद अप्रैल 2021 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने एलान किया कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से वापस आ जाएंगे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई गई. लेकिन अंत में हुआ ऐसा ही. इसी साल अगस्त महीने में वापस से अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो गया.

अभी पाकिस्तान से तनाव क्यों बढ़ा?

ये विवाद तब गहराया जब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने हाल ही में वजीरिस्तान के मकीन इलाके में पाकिस्तानी सेना के 30 जवानों को मार गिराया. इसके जवाब में पाकिस्तान ने एयरस्ट्राइक करके ये संदेश देने की कोशिश की कि वो अपने सैनिकों की हत्या बर्दाश्त नहीं करेगा.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफगान तालिबान के पास भारी मात्रा में हथियार और दुर्गम इलाकों में छिपने की क्षमता है. उनके पास एके-47, मोर्टार, रॉकेट लॉन्चर जैसे आधुनिक हथियारों का विशाल भंडार है. इसके अलावा, तालिबानी लड़ाके उन पहाड़ों और गुफाओं से हमले करते हैं, जिनके बारे में पाकिस्तानी सेना को जानकारी तक नहीं है.

शहबाज शरीफ सरकार पहले से ही आर्थिक संकट, सीपैक प्रोजेक्ट में देरी और बलूचिस्तान में अलगाववाद जैसी समस्याओं से जूझ रही है. इन मुद्दों ने सरकार और सेना दोनों को कमजोर किया है. अब तालिबान के साथ टकराव ने इस संकट को और बढ़ा दिया है.

क्या है तालिबान की रणनीति?

मीर अली बॉर्डर पर बढ़ती गतिविधियों के चलते पाकिस्तान ने भी अपनी सेना को अलर्ट पर रखा है. सीमाई इलाकों में सैनिकों की तैनाती तेज कर दी गई है. तनाव बढ़ने के साथ ही ये देखना होगा कि पाकिस्तान और तालिबान के बीच यह टकराव किस ओर बढ़ता है?

वीडियो: दुनियादारी: अफगानिस्तान पर पाकिस्तान ने हमला क्यों किया? क्या अफगानिस्तान TTP को संरक्षण देता है?

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