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लुबना ने फेसबुक पर बुर्के का विरोध किया तो मिलने लगी गालियां और धमकियां

एक लड़की ने फेसबुक पर बवाल काट रखा है. उसकी बुर्के के विरोध में की गई पोस्ट के बाद उसे गालियां देने वालों की बाढ़ आई है. तो उसका साथ देने वाले भी कम नहीं.

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Source: Reuters
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आशुतोष चचा
25 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 3 मई 2016, 02:46 PM IST)
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फेसबुक पर एक प्रोफाइल है. लुबना गजल के नाम से. कुछ दिन पहले इन्होंने स्त्री को परदे में रखने के खिलाफ एक पोस्ट लिखी. बुरका औरत की आजादी और उसके विकास में कैसे रुकावट पैदा करता है. इसे लॉजिकल तरीके से बताया. लेकिन बात यहां से निकली और फिर दूर तलक चली गई. पक्षकारों और विरोधियों के दो धड़े बन गए. गाली-गलौज तक हो गई. पहले उनके साथियों और विरोधियों के कैम्पेन पर नजर डाल लें.
Lubna Ghazal बुर्के की अनिवार्यता की वजह से मुस्लिम औरतें उन किसी भी फील्ड मे करियर नही बना सकती जहां यूनिफॉर्म अनिवार्य है मुस्लिम औरतें काबिल है इसमे कोई शक नहीं. बुर्के के साथ ही कुछ एक गिने चुने फील्ड मे अपना परचम लहरा रही है लेकिन हर फील्ड में अपनी काबिलियत नही दिखा पा रही हैं बुर्के की अनिवार्यता की वजह से ! बुर्का मुस्लिम औरतो के पूर्ण विकास मे सबसे बड़ी बाधा है !
ये वो पोस्ट थी जिसके बाद माहौल गरम हो गया. लुबना के खिलाफ कट्टर धार्मिक कानून मानने वाले लामबंद होने लगे. अगली पोस्ट में इनकी तकलीफ दिखी.
Lubna Ghazal फेसबुक के बड़े से बड़े प्रगतिशील मुसलमान पुरूषों के नकाब उतर रहे हैं. धीरे धीरे. असल में ये लोग प्रगतिशील तो हैं खुद के लिए लेकिन इनकी मानसिकता स्त्री विरोधी है. हिंदू मुस्लिम औरतों के मामले में बोले तो ये हिन्दू मुस्लिम मुद्दा बना देते हैं कोई मुस्लिम पुरूष बोले तो औरतों का मामला उनकी मर्ज़ी कहकर चुप करा देते, खुद औरत बोले तो उल्टे सीधे कुतर्क करते हैं, जिसमें इनकी स्त्री विरोधी मानसिकता झलकती है इनकी समस्या बस इतनी है कि औरत को क्या पहनना चहिए क्या नहीं. वो खुद तय नही करेगी जो खुद तय करेगी उससे हमें चिढ़ है, उसको हम इस तरह के कमेन्ट देकर चुप करा देंगे जो विरोध करेगी वो तो है ही दुश्मन उसको तो गाली देने वालो को सही ठहराने के कुतर्क भी हम ढूढ़ निकालेंगे. मोहम्मद उस्मान का ये कमेन्ट यही साबित करता है. नाम तो और भी बहुत है और वे लोग फेसबुक सेलीब्रेटी प्रगतिशील बने बैठे हैं लेकिन सारी प्रगतिशीलता बस संघ और औविसी को कोसकर दिखाते हैं. अन्दर ही अन्दर औरतों के बोलने से चिढ़ते कुढ़ते रहते हैं कभी कभी फ्रस्ट्रेशन निकाल जाते है कहीं न कहीं!
अब डालते हैं एक नजर उनके विरोध में लिखी गई पोस्ट्स पर. इनमें से कितने प्वाइंट ऐसे हैं जिन पर भारत में अभी कोई कानून नहीं है. शायद कभी होंगे ही नहीं. क्योंकि भारत धर्म निरपेक्ष और डेमोक्रेटिक देश है. और ये शरिया कानून तो यहां लगने से रहा.
Mohd Zahid FBP/16-117 प्रगतिशीलता या अय्याशियां :- आप सभी लोग "आईपीएल" देख रहे होंगे , बल्लेबाज के चौके छक्के या गेंदबाज के विकेट लेने पर स्टेडियम में जश्न मनता है पर कैमरा सबसे पहले घूमता है "चीयर्स गर्ल" पर , उनकी नाचती अदाओं को दिखाने के लिए, ऐसे अवसरों पर खेल में खिलाड़ी और दर्शकों को दिखाने के पहले अधनंगी "चियर्स गर्ल" को आगे पीछे और यहाँ तक कि नीचे से कैमरा ज़ूम करके दिखाने का क्रिकेट से क्या संबंध? कोई बता सकता है? क्या चियर्स गर्ल की अनुपस्थिति में रन कम बनेंगे या विकेट कम गिरेंगे ? नहीं ऐसा कुछ नहीं, दरअसल उन लड़कियों का प्रयोग खेल में ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए किया जाता है, चंद रुपये के लिए यह विदेशी लड़कियाँ चौके छक्के के साथ लाखों लोगों के सामने अपने कसे हुए जिस्म की नुमाईश करती हैं , यह है महिला स्वाभिमान और सशक्तिकरण का वह उदाहरण जहाँ जाकर प्रगतिशील विचारों के लोग अंधे हो जाते हैं । भगोड़े ललित मोदी के द्वारा पैदा किये गये इस आईपीएल की हकीकत कुछ यूँ थी कि हर मैच से पहले की संध्या पर उसी होटल में जश्न और ऐय्याशियाँ होती थी जिसमें शराब और कवाब के साथ इन चियर्स गर्ल की भी भागेदारी होती थी। यहाँ पर प्रगतिशील समाज के मुँह में दही जम जाती थी। औरतों और लड़कियों के नंगे जिस्म को विभिन्न माध्यमों और तरीकों से बेचने के खेल में यही प्रगतिशील लोग ऐय्याशियाँ करते भी देखे जा सकते हैं और उनमें ऐसी महिलाएँ भी मिलेंगी जिनको "रंडी" कहलाने पर शर्म महसूस नहीं होती। देश में स्वतंत्रता और अधिकार है कि वह कैसे रहे और क्या पहनें पर यही प्रगतिशील लोग उन लोगों पर उंगली उठाएँ उनपर व्यंग करें जो परम्परागत और धार्मिक तरीके से रहना चाहते हैं तो उनको भी कुछ सवालों के जवाब तो देने ही पड़ेंगे । तो आईये एक बहन Asma Banu के पोस्ट का जवाब दीजिए शराब पीना प्रगतिशीलता है ? शराब पीकर जुआ खेलना प्रगतिशीलता है ? जुए में हार जीत तो होती ही रहती है मगर पत्नी हारना प्रगतिशीलता से भी बहुत ऊपर यानी धर्मराज होना है ? शराब पीना पिलाना फिर नशे का फायदा उठाना प्रगतिशीलता है ? सामूहिक तथा अप्राकृतिक सेक्स करना प्रगतिशीलता है ? वाइफ स्वेपिंग करना प्रगतिशीलता है ? पब, डिस्को, बार में जाना प्रगतिशीलता है ? कैबरे का लुत्फ लेना प्रगतिशीलता है ? समलैंगिक होना प्रगतिशीलता है ? पोर्न फिल्में बनाना तथा पोर्न कहानियाँ लिखना प्रगतिशीलता है ? पत्नी की कमाई पर ऐश करना प्रगतिशीलता ? पत्नी की कमाई खाकर फिर शाम को उसकी पिटाई करना प्रगतिशीलता है ? विचार विमर्श से आगे बढ़कर सेक्स चैट करना प्रगतिशीलता है ? खजुराहो प्रगतिशीलता का प्रतीक एंव अमिट हस्ताक्षर है ? लिंग को स्थापित करना उसे पूजना उसकी उपासना करना प्रगतिशीलता है ? मगर बुरक़ा पहनना पिछड़ापन है , चादर ओढ़ना, अबाया या हिजाब या स्कार्फ लगाना दुपट्टा लेना पिछड़ापन है , मुसलमान होना पिछड़ापन है .... साले मुल्ले मुल्लियाँ पता नहीं कब तरक्की करेंगे कब सुधरेंगे नोट- ये पोस्ट उनके लिए है जिन्हें लगता है कि बुरका जबरन पहनाया जाता है, जिन्हें लगता है बुरका पहनने वाली महिला मानसिक रोगी तथा मानसिक गुलाम होती है जिन्हें लगता है, बुरका पहनने वालियाँ इंसान नहीं रैपर में लिपटी टॉफी होती हैं । इसलिए उपरोक्त प्रगतिशीलों के अतिरिक्त कोई अन्य उड़ता तीर अपने उपर लेकर घाव न दिखाये वरना मरहम की जगह एसीड लगा दुंगी। Mohd Zahid FBP/16-119 पर्दा , एक साजिश :- बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ। ‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया ?’ कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया ।। अकबर इलाहाबादी की यह नज़्म उन बहन बेटियों की आखें खोलने के लिए बेहद ज़रूरी है जो मर्दों के उकसावे में आकर खुद को बेपर्दा करना चाह रही हैं। औरतों को बेपर्दा होने से उकसाने वाले मर्दों से सावधान होने की ज़रूरत है , मैं बार बार कह रहा हूँ कि कोई भी माँ बहन बेपर्दा नहीं होना चाहतीं । बेपर्दा का मतलब सिर्फ़ जिस्म को लिबास से ढकना ही नहीं है बल्कि इसे समग्र रूप से देखने की आवश्यकता है। आखों का पर्दा अर्थात गंदी चीजें मत देखिए , दिमाग का पर्दा अर्थात गंदी बातें मत सोचिए , ज़बान का पर्दा अर्थात गलत बातें मत बोलिए , जिस्म का भी पर्दा अर्थात जिश्म को नुमाईश ना करना और मर्दों की गंदी नज़रों से खुद को बचाना। गांधी जी के तीनों बंदर भी लगभग पर्दे की हिमायत करते ही दिखेंगे। पर्दे को यदि वृहद रूप में आप देखेंगे तो यह केवल महिला के लिए ही नहीं है बल्कि पुरुषों के लिए भी है , परंतु हम यहाँ मान चुके हैं कि अधिकतर मर्द बेपर्दा हो चुके हैं तो उसकी चर्चा व्यर्थ है। शातिर मर्दों के हाथों चली जा रही इस साजिश से , प्रगतिशीलता के नाम पर बहन बेटियों को बचने की ज़रूरत है नहीं तो मर्दों की शक्ल में यह भेड़िए , औरतों को प्रगतिशीलता के नाम पर बाजार तक में बैठा देते हैं और खुद भोगने और ऐय्याशी करने चले जाते हैं। हांगकांग के एक ऐसे ही एक मर्द की इसी चाल में फँस कर कल एक बहन ने अपने को रंडी कहलाने पर ऐतराज नहीं करने की पोस्ट कर दिया और पर्दे को तार तार कर दिया। और मजेदार बात देखिए कि उस पोस्ट पर फेसबुक के बड़े बड़े सूरमा वाह वाही करते दिखे जैसे कोठे पर बैठे कद्र दान लोग करते हैं। ज़िन्दा गोश्त के व्यापारी यह मर्द प्रगतिशीलता के नाम पर उकसा कर बहन बेटियों को समग्र रूप में बेपर्दा कर देते हैं और उदाहरण है कि बाजार में सोने से भी अधिक तीव्र गति से बिकने वाली यही बहन बेटियाँ होती हैं। फिर कहता हूँ कि पर्दा विरोध मर्दों की साजिश है , बहन बेटियाँ इससे बच कर रहें , अपनी मर्जी से ही जो उचित लगे वो करें । मुद्दा नकाब बुर्का नहीं पर्दा है जिसे समझने की ज़रूरत है।
दोनों तरफ से बराबर पोस्ट वॉर चल रहा है. लुबना का पलड़ा भारी है. क्योंकि उसमें लिबरल मुस्लिम अपना चेहरा देखते हैं.
Tabish Siddiqui ये बात अब बहुत आगे निकल गयी है.. एक लड़की Lubna Ghazal ..जिसने शायद ही इस बुर्के की विरोध की मुहीम को इतना सीरियसली सोच के उठाया होगा.. मगर मर्द सारे खुलके सामने आ गए अपने अपने प्रायोजित अखबारों और पोस्टों के साथ इन्हीं के एक भाई बंधु ने लुबना को "रंडी" कहके नवाज़ा और जब उसने उस गाली पर रियेक्ट न करके ये कहा कि वो इस गाली में कोई बुराई नहीं देखती है और इसे दिल से लगाती है क्यों "रंडियाँ" भी औरतें ही होती हैं.. तो इस बात को लेकर "मज़हबी भाई" लोग और भड़क गए कि इसको तो ख़ुद को रंडी कहलवाने में फख्र महसूस हो रहा है ये "मज़हबी पत्रकार भाई" भी उसी बात की पुष्टि कर रहे हैं.. अब ये बात बहुत दूर निकल चुकी है.. अब ये मामला यहाँ नहीं रुकने वाला.. तुम कितनी लुबना रोकोगे? घर घर से लुबना निकलेगी मेरा समर्थन सिर्फ इसलिए क्यूंकि एक लड़की के पीछे पूरा कठमुल्ला समाज एक हो के खड़ा हो गया है.. ये है इनकी मर्दानगी और मज़हब की सीख ‪#‎standwithlubna‬
Khan Shakil बुर्के या परदे के ख़िलाफ़ बोलने वालों को जो लोग मज़हब के ख़िलाफ़ बता रहे हैं वह झूठ बोल रहे हैं यह झूठ उनकी मजबूरी है परदे की लड़ाई में मज़हब मर्दों का हथियार है मज़हब इस लड़ाई एक पक्ष नहीं है क्योंकि यह लड़ाई औरत के वजूद और आज़ादी की है जो उसे मर्दवाद से लड़नी पड़ रही है आप क्या तर्क देंगें परदे के समर्थन में ? सभ्य समाज में परदे के पक्ष में कोई तर्क हो ही नही सकता क्योंकि एक सभ्य समाज में पर्दा उसकी सभ्यता पर सवालिया निशान है आपको अपने धर्म की भी परवाह नही है आपको अपनी सत्ता की परवाह है आपको तो आज़ाद औरत से डर लगता है अपने साम्राज्य के ढहने से डर लगता है अपनी ज़मीन सिकुड़ने से डर लगता है और आप छुप जाते हो मज़हब की दीवार के पीछे वहीं से कायरों की तरह वार करते हो औरत को बेशर्म नंगी रंडी वेश्या जैसे शब्दों से अपमानित करने की कोशिश करते हो पर आपकी माँ ने आपको जन्म बुरका पहन कर नही दिया था जिस समय आप पैदा हुए वह नंगी थी औरत को नंगी कहने से वह अपमानित नही होती है बल्कि मर्द की औकात पता लगती है कोई औरत रंडी बिना मर्द के बन ही नही सकती तो यह टाइटल भी तुम मर्दों की मेहरबानी है शर्म तुम्हे आनी चाहिए मर्दवाद का पाखण्ड देखिये एक तरफ औरत को परदे में कैद करके इज़्ज़त देने का ढोंग करते हैं और किसी को अपमानित करने के लिए हर गाली उसके ढके अंगो को लक्षित करके ही देते हैं यह लड़ाई तो तुम हार चुके हो जाहिलो क्योंकि तुम्हारे पास जवाब में सिर्फ गालियां है मै Lubna Ghazal के साथ खड़ा हूँ और मुझे इस बात पर फ़ख्र है मै उन सभी औरतों को सलाम करता हूँ जो मर्दों की इस गैरबराबरी वाली दुनिया में हिम्मत से खड़ी हैं सभी महिला मित्रों के साथ जिनके नाम टैग हैं और जिनके नही है मज़बूती से खड़ा हूँ. Meraj Anwar मोहम्मद साहब कहते है, "कोई भी बात बस इसलिए मत मानो कि कोई कह रहा है, मैं कह रहा हूँ या बहुत से लोग कह रहे हैं। पहले सोचो-समझो, सवाल करो ठीक लगे, संतुष्ट हो जाओ तब जाकर मानो वरना मत मानो।" यह बात जब मैं 6th क्लास में था तब बहुत सारे आयतों के कोटेशन के साथ एक न्यूज़ पेपर में पढ़ा था। उस वक़्त तक मैं बहुत धार्मिक हुआ करता था, और आगे भी रहा। बहुत छोटे पर से पुरे रमजान रोजा रहा करता था। डांट पड़ती थी की बहुत छोटे हो रोजा फर्ज नही है फिर भी रहता था। पुरे हिजाब में रहा, हाफ शर्ट तक नही पहना। पर ये सवाल करने वाली बात मेरे दिमाग में हमेशा रहती थी, क्योंकि मोहम्मद साहब का कहना था। फिर अपने मामा जो कि मौलाना हैं उनसे सवाल करने लगा, और धीरे-धीरे क़ुरबानी से लेकर हर एक बात पर सवाल करने लगा। कुछ जवाब से संतुष्ट हो जाता पर कुछ वक़्त बाद उसी पर दूसरा सवाल खड़ा हो जाता था।... सारे किससे बाद में लिखूंगा खैर कहना ये है, गौतम बुद्ध से लेकर मोहम्मद साहब तक का कहना है सवाल करो, सोचो-समझो फिर मानो। एक लड़की Lubna Ghazal है, जो सवाल करना चाहती थी, अपनी बात रखना चाहती थी, पूछना चाहती थी। जो कुछ तथाकथित धार्मिक और शरीफ लोगों को हजम नही हुआ। और वो अपने गालीबाज गैंग के साथ मिलकर गन्दा से गन्दा गाली देने लगे। ये मोहम्मद साहब का नाम अपने नाम के आगे लगाये मोहम्मद की बातों को कितना मान रहे हैं, आपलोग देख ही रहे होंगे। मैं भी ये सब कई दिन से देख रहा था, मेरे पास तीन आप्शन थे- -मैं चुप रहता और उस लड़की को गाली सुनने देता। -उन गालीबाजों के साथ हो जाता और उसे गाली देता। -या फिर मैं उन गालीबाजों के खिलाफ खड़ा होजाता कि सबको अपनी बात सभ्य तरीके से रखने का हक़ है। मैंने तीसरा आप्शन चुना। आपने जो भी साइड चुना है, वो आपकी मर्जी है। आप बुरका-बुरका सुनकर तंग आगये हैं, पर बात केवल बुरके की नही है, बात है सवालों को दबाने की, बात है गाली देकर चुप कराने की। और मैं इसका विरोध करूँगा, हर कीमत पर...
आज़ादी मेरा ब्रांड नाम की बेहतरीन किताब लिखने वाली अनुराधा बेनीवाल ने भी लुबना का फुल सपोर्ट किया. उनकी फोटो को अपना प्रोफाइल पिक बनाई. और ये पोस्ट लिखा.
Anuradha Saroj
तुम बुर्का बचाते हो, हम दुप्पटे जलाने चली हैं! दुपट्टा निरादर है नारीत्व का, दुपट्टा तौहीन है कुदरत कि, दुपट्टा अपमान है इंसान के विकास का , दुपट्टा तौहीन है तुम्हारी संस्कृति कि! ज्यों ही लड़की रखती है कदम जवानी में, ज्यों ही होती विकसित नारी रूप में, उढ़ा दिया जाता उसे "दुपट्टा"। "ढक लो!", "छुपा लो!" भाई से छुपा लो, बाप से छुपा लो, ताऊ से छुपा लो, चाचा से छुपा लो, दोस्त से छुपा लो, पड़ोसी से छुपा लो! हर तरफ से शुरू हो जाती है कोशिश उसे छुपाने कि। मार डालने तक कि धमकियाँ दीजाती हैं, मजाल के लड़की करे गर्व अपने लड़की होने पर। तुम शरमाओ, तुम छुपाओ, नहीं तो तुम्हे "बदचलन", "बेहया", और ना जाने क्या क्या उपाधियाँ दी जाती हैं। डरा धमका के ढक दिया जाता है लड़की के विकास को। क्या रहस्य है? डर लगता है लड़की के जवान होने से, या शर्म आती है? क्या छुपा ले? अपने नारी होने को? अपने विकास को? अपनी जवानी को? कलंक है जो छुपा ले? पाप करती है जो जवान होती है?
दूसरी तरफ लड़का बस इस कोशिश में रहता है, के किसी तरह दाढ़ी-मुछ आ जाये, कच्ची-चिकनी खाल पे चलाता रहता है ब्लेड, बस कैसे जल्दी से जल्दी जवान हो जाए। जवान होते ही पनियाता फिरता है अपनी मुछो को, ताव देता फिरता है अपनी जवानी कि निशानी पे! होता है गुमान माँ को, बाप को, ताऊ को, चाचा को, पुरे समाज को उसकी जवानी पे! पूरा दिखावा होता है लड़के कि जवानी का, गर्व करता है, इठलाता फिरता है। वहीँ दूसरी तरफ शर्म में गाड़ दिया जाता है लड़की कि जवानी को। तैयार किया जाता है उसे पुरुष प्रधान समाज के लिए। "पर्दे" कि और पहला कदम है दुपट्टा। ये नीव है गुलामी कि। हम-सब-लुबना-हैं।
Mubarak Ali 
आप धार्मिक हैं अच्छी बात है. अपने मज़हब में आपका ईमान पुख़्ता है और भी अच्छी बात है. लेकिन ये न भूलिए आप अपने मज़हब की पहचान भी हैं. आपके मज़हब को आपके किये-धरे से आंका जाएगा. तो अगर आप अपने हक़परस्त, दयालु और भेदभाव-विहीन धर्म की साख बचाना चाहते हैं तो वैसे बन के भी दिखाइए. जिम्मेदारी है आपकी. किसी प्रथा के विरोध करने भर से अगर आप दो सेकण्ड में सामने वाले पर गालियों का तोपखाना बरसाना शुरू करते हो तो आप बहुत गन्दा विज्ञापन हैं अपने धर्म का. किसी महिला को वेश्या बताना, कोठे पर जाने की सलाह देना ये दिखाता है कि अपने खुद के मज़हब की बुनियादी शिक्षाओं से आपका कोई वास्ता नहीं. हुज़ूर अगर लौट आये धरती पर तो सबसे पहले आपके ही कान पे रैपट धरेंगे.
कोई भी विरोध व्यक्ति की इंडिविजुअल चॉइस है. अगर Lubna Ghazal बुर्के के अगेंस्ट है तो ये उसका हक़ है. आप को कोई अधिकार नहीं उसके इस हक़ को चैलेंज करने का. ख़ास तौर से तब जब आप खुद कहते नहीं थकते कि बुर्का औरतों की पर्सनल चॉइस है. पिछले दो तीन दिनों में जो कुछ लुबना को कहा गया वो गन्दगी की, दिमागी दिवालियेपन की इंतेहा है. और अगर ये सब मज़हब के नाम पर है तो यकीन जानिये आपका मज़हब उन्ही थप्पड़ों के काबिल है जो आज सारी दुनिया में उसके मुंह पर बजाये जा रहे हैं. कमाल की बात ये कि बुर्के का विरोध लुबना ने किया लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पुरुषों की सोच नंगी बरामद हुई. पता नहीं कैसा अजीब कनेक्शन रहा होगा. मठाधीश बने बैठे बुजुर्गवार से तो कोई उम्मीद नहीं लेकिन उनकी रियाया से अपील है कि इंसानियत के बुनियादी तकाज़े न भूलें. मज़हब में आस्था रखिये, बेशक रखिये, बस उसे हथियार बनाकर किसी को रौंदने ना पहुँच जाइए. आप ही बताओगे दुनिया को कि आपका मज़हब कैसा है. समानता के हक़ की पैरवी करने वाला या क्रूर, पाशवी, बंद कुएं सा. जो दिखाएँगे दुनिया वही देखेगी. बाद में शिकायत न कीजियेगा कि हमारी छवि ठीक नहीं दिखाते. संसार भर में आईने हैं महज़. जैसा वजूद होगा अक्स वैसा ही नज़र आएगा. सिम्पल सी बात है.
 ये लुबना की वो पोस्ट जिसमें उनका गुस्सा और तकलीफ दोनों निकल कर आई.
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लल्लन कहिस

आप पूरा मामला पढ़ लिए. देख लिए. न देखा हो तो फेसबुक पर देख आओ. बमचक बहुत ज्यादा है. अजीब ये है कि यहां कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है. वो तो शुक्र है भारत में कानून धर्म के हिसाब से नहीं है. संविधान आपको अपने धर्म का पालन करने की इजाजत देता है. लेकिन किसी पर अपने धार्मिक क्रियाकलाप थोपने की आजादी नहीं है. अगर किसी को बुरका पहनने के पक्ष में तर्क देना है तो दे. लेकिन बुरके के विरोध में तर्क देने वालों को गरियाना भी तो जुर्म है. अगर आप वाकई चाहते हो कि देश धार्मिक किताबों के हिसाब से चले तो उन किताबों को कानून में शामिल करा दो. उसके लिए बड़ी मेहनत करनी होगी. तगड़ी उलट पलट होगी. और यकीन मानिए. अभी देश दुनिया का जो हाल है. उसमें लोग आगे बढ़ना चाहते हैं. अपने बच्चों को दिमागी रूप से लॉजिकल होते देखना चाहते हैं. उनमें सवाल करने की और उनके जवाब चाहने की क्षमता बनी रहे, ये चाहते हैं. लड़कियां घर में रहें, परदे में रहें, इससे तो हो चुका कल्याण. इनमें से कुछ लोगों ने ये तर्क दिया है कि औरत को मर्द की बुरी नजर से बचाने के लिए नकाब पहनना जरूरी है. तो भैये, लड़कियों को क्यों बंद करते हो? मर्दों की बुरी नजर का कुछ उपाय करो न. आप तो अरब के उस कानून की वकालत कर रहे हो जहां औरत को रेप की रिपोर्ट करने पर उल्टे उसे ही कोड़े मारे जाते हैं. अरब के इस्लामिक बुद्धिजीवी औरत को जिस तरह से रखने की हिदायत देते हैं वो यहां पढ़ो. और ये वीडियो देखो. ‘मुस्लिम आदमियों अपनी बीवियों को दातून की छड़ से मारो. बिस्तर पर वाइफ को बिलकुल इंपॉर्टेंस मत दो. बिस्तर पर वाइफ की तरफ पीठ करके सोना चाहिए. इंशाअल्लाह, कांटों से भरे इस रास्ते को हम जरूर पार कर लेंगे. आदमियों तुम्हें औरतों के साथ शारीरिक शोषण नहीं करना चाहिए. लेकिन उन्हें तहजीब सिखाने के लिए तुम्हें 3 स्टेप्स फॉलो करनी चाहिए. पहले अपनी वाइफ से बात करो. फिर उन्हें बिस्तर पर लाओ. और इसके बाद पीटना शुरू कर दो. पत्नियों की वजह से बहुत दिक्कतें होती हैं. क्योंकि ज्यादातर अपने पति के साथ बराबरी करते हुए जीना चाहती हैं.’ https://www.youtube.com/watch?v=Gx1aRnmTgDA&feature=youtu.be अगर आप ऐसा कानून इंडिया में चाहते हो तो सॉरी दोस्त. ये एक बुरा सपना है. जो पूरा तो होना नहीं. जितनी जल्दी टूट जाए उतना बेहतर. आपको ये चाहिए कि लड़कियों को परदे से बाहर निकाल कर स्कूल कॉलेज भेजो. सरकारी, प्राइवेट नौकरियों के दरवाजे उनके लिए खोलो. उनको बिजनेस वूमेन बनाओ. आप बताते हो कि वो अपनी मर्जी से बुरका पहनती हैं. तो नो प्रॉब्लम. लेकिन जो नहीं पहनना चाहती उनको इसके पीछे की साइंस और टेक्नॉलजी समझा कर गुमराह मत करो. अपनी मर्दानगी को और कामों में लगाओ. बजाय औरतों को दबाने में. उनको अपनी पहचान बनाने दो. किसी परदे की आड़ से नहीं. फेस टू फेस.

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