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लुबना ने फेसबुक पर बुर्के का विरोध किया तो मिलने लगी गालियां और धमकियां

एक लड़की ने फेसबुक पर बवाल काट रखा है. उसकी बुर्के के विरोध में की गई पोस्ट के बाद उसे गालियां देने वालों की बाढ़ आई है. तो उसका साथ देने वाले भी कम नहीं.

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Source: Reuters
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आशुतोष चचा
25 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 3 मई 2016, 02:46 PM IST)
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फेसबुक पर एक प्रोफाइल है. लुबना गजल के नाम से. कुछ दिन पहले इन्होंने स्त्री को परदे में रखने के खिलाफ एक पोस्ट लिखी. बुरका औरत की आजादी और उसके विकास में कैसे रुकावट पैदा करता है. इसे लॉजिकल तरीके से बताया. लेकिन बात यहां से निकली और फिर दूर तलक चली गई. पक्षकारों और विरोधियों के दो धड़े बन गए. गाली-गलौज तक हो गई. पहले उनके साथियों और विरोधियों के कैम्पेन पर नजर डाल लें.
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ये वो पोस्ट थी जिसके बाद माहौल गरम हो गया. लुबना के खिलाफ कट्टर धार्मिक कानून मानने वाले लामबंद होने लगे. अगली पोस्ट में इनकी तकलीफ दिखी.
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अब डालते हैं एक नजर उनके विरोध में लिखी गई पोस्ट्स पर. इनमें से कितने प्वाइंट ऐसे हैं जिन पर भारत में अभी कोई कानून नहीं है. शायद कभी होंगे ही नहीं. क्योंकि भारत धर्म निरपेक्ष और डेमोक्रेटिक देश है. और ये शरिया कानून तो यहां लगने से रहा.
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दोनों तरफ से बराबर पोस्ट वॉर चल रहा है. लुबना का पलड़ा भारी है. क्योंकि उसमें लिबरल मुस्लिम अपना चेहरा देखते हैं.
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आज़ादी मेरा ब्रांड नाम की बेहतरीन किताब लिखने वाली अनुराधा बेनीवाल ने भी लुबना का फुल सपोर्ट किया. उनकी फोटो को अपना प्रोफाइल पिक बनाई. और ये पोस्ट लिखा.
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 ये लुबना की वो पोस्ट जिसमें उनका गुस्सा और तकलीफ दोनों निकल कर आई.
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लल्लन कहिस

आप पूरा मामला पढ़ लिए. देख लिए. न देखा हो तो फेसबुक पर देख आओ. बमचक बहुत ज्यादा है. अजीब ये है कि यहां कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है. वो तो शुक्र है भारत में कानून धर्म के हिसाब से नहीं है. संविधान आपको अपने धर्म का पालन करने की इजाजत देता है. लेकिन किसी पर अपने धार्मिक क्रियाकलाप थोपने की आजादी नहीं है. अगर किसी को बुरका पहनने के पक्ष में तर्क देना है तो दे. लेकिन बुरके के विरोध में तर्क देने वालों को गरियाना भी तो जुर्म है. अगर आप वाकई चाहते हो कि देश धार्मिक किताबों के हिसाब से चले तो उन किताबों को कानून में शामिल करा दो. उसके लिए बड़ी मेहनत करनी होगी. तगड़ी उलट पलट होगी. और यकीन मानिए. अभी देश दुनिया का जो हाल है. उसमें लोग आगे बढ़ना चाहते हैं. अपने बच्चों को दिमागी रूप से लॉजिकल होते देखना चाहते हैं. उनमें सवाल करने की और उनके जवाब चाहने की क्षमता बनी रहे, ये चाहते हैं. लड़कियां घर में रहें, परदे में रहें, इससे तो हो चुका कल्याण. इनमें से कुछ लोगों ने ये तर्क दिया है कि औरत को मर्द की बुरी नजर से बचाने के लिए नकाब पहनना जरूरी है. तो भैये, लड़कियों को क्यों बंद करते हो? मर्दों की बुरी नजर का कुछ उपाय करो न. आप तो अरब के उस कानून की वकालत कर रहे हो जहां औरत को रेप की रिपोर्ट करने पर उल्टे उसे ही कोड़े मारे जाते हैं. अरब के इस्लामिक बुद्धिजीवी औरत को जिस तरह से रखने की हिदायत देते हैं वो यहां पढ़ो. और ये वीडियो देखो. ‘मुस्लिम आदमियों अपनी बीवियों को दातून की छड़ से मारो. बिस्तर पर वाइफ को बिलकुल इंपॉर्टेंस मत दो. बिस्तर पर वाइफ की तरफ पीठ करके सोना चाहिए. इंशाअल्लाह, कांटों से भरे इस रास्ते को हम जरूर पार कर लेंगे. आदमियों तुम्हें औरतों के साथ शारीरिक शोषण नहीं करना चाहिए. लेकिन उन्हें तहजीब सिखाने के लिए तुम्हें 3 स्टेप्स फॉलो करनी चाहिए. पहले अपनी वाइफ से बात करो. फिर उन्हें बिस्तर पर लाओ. और इसके बाद पीटना शुरू कर दो. पत्नियों की वजह से बहुत दिक्कतें होती हैं. क्योंकि ज्यादातर अपने पति के साथ बराबरी करते हुए जीना चाहती हैं.’ https://www.youtube.com/watch?v=Gx1aRnmTgDA&feature=youtu.be अगर आप ऐसा कानून इंडिया में चाहते हो तो सॉरी दोस्त. ये एक बुरा सपना है. जो पूरा तो होना नहीं. जितनी जल्दी टूट जाए उतना बेहतर. आपको ये चाहिए कि लड़कियों को परदे से बाहर निकाल कर स्कूल कॉलेज भेजो. सरकारी, प्राइवेट नौकरियों के दरवाजे उनके लिए खोलो. उनको बिजनेस वूमेन बनाओ. आप बताते हो कि वो अपनी मर्जी से बुरका पहनती हैं. तो नो प्रॉब्लम. लेकिन जो नहीं पहनना चाहती उनको इसके पीछे की साइंस और टेक्नॉलजी समझा कर गुमराह मत करो. अपनी मर्दानगी को और कामों में लगाओ. बजाय औरतों को दबाने में. उनको अपनी पहचान बनाने दो. किसी परदे की आड़ से नहीं. फेस टू फेस.

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