कुछ सालों से एक चलन तेज़ी से चल पड़ा है. गुंडों की फ़ौज जमा करो, उसे एक फैंसी सानाम दो और जी भर के उत्पात मचाओ. बस नाम ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों की भावनाएंदुही जा सकें. एक झंडा सिलवा लो, किसी इतिहास के नायक या किसी धर्म/जाति/समुदाय कीअस्मिता वगैरह का. फिर किसी की मजाल नहीं होगी आपको कुछ कहने की. आपको लाइसेंस मिलजाएगा कि आप कुछ भी उल्टे-सीधे कारण खोज कर गुंडागर्दी की प्रदर्शनी लगा दो. इससेहीरो बनने का मौका तो मिलता ही है, साथ ही राजनीतिक दुकान चमकने की भी संभावना बढ़जाती है. यूं ही थोड़े ही कहा था जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने, "पॉलिटिक्स गुंडों की आख़िरीपनाहगाह है."सभ्यता-संस्कृति के नाम पर लफंगों का जमावड़ारणवीर सेना, श्रीराम सेना, महाराणा प्रताप संघ, राजपूत गौरव, संभाजी ब्रिगेड जैसेतमाम संगठन हैं, जो और कुछ नहीं बदमाशों का गिरोह है. इनका काम ही है धर्म,अस्मिता, गर्व और पता नहीं किस किस के नाम पर बवाल काटना. कभी वैलेंटाइन डे से इनकोदिक्कत होती है, तो कभी किसी किताब से अरुचि. कभी कोई किसी और प्रांत के बाशिंदोंकी ठुकाई पर उतर आता है, तो कोई नए साल के जश्न से खफ़ा होकर जवान बच्चों को सड़कोंपर मारने लगता है. इनके लिए समयकाल का बंधन भी कोई ख़ास मायने नहीं रखता. मुग़लों काबदला ये जुम्मन से ले सकते हैं और अंग्रेज़ों का भारतीय ईसाईयों से. ये बरसों पुरानीकिसी बात बार आज बवाल काटने का ज़बरदस्त हुनर रखते हैं. गड़े मुर्दे उखाड़कर बवालकाटने में इनका कोई सानी नहीं. ताज़ा मामला पुणे का है जहां ऐसी ही एक घटना मेंगुंडई की नई उंचाइयां छुई है संभाजी ब्रिगेड में. उखाड़ा हुआ मुर्दा 100 साल सेज़्यादा पुराना है.पुणे की घटनासंभाजी गार्डन, पुणे में इसी जगह थी गडकरी की प्रतिमासंभाजी ब्रिगेड ने पुणे के संभाजी गार्डन में लगे राम गणेश गडकरी उर्फ़ गोविंदाग्रजकी अर्ध-प्रतिमा उखाड़ र मुठा नदी में फेंक दी. वजह के खाते में उन्होंने बताया किगडकरी की लिखी किताब 'राज-सन्यास' में संभाजी राजे को लेकर कोई अपमानजनक टिप्पणीहै. दिलचस्प बात ये कि ये किताब तकरीबन सौ साल पहले लिखा गया प्ले है. संभाजी केशेर अब जागे हैं.गोविंदाग्रजराम गणेश गडकरीराम गणेश गडकरी मराठी साहित्य में एक बेहद सम्मानित नाम है. कवि, नाटककार औरव्यंगकार के रूप में उन्होंने मराठी साहित्य को बहुत कुछ दिया है. उन्होंनेगोविंदाग्रज के नाम से कवितायें लिखी, अपने नाम से नाटक और 'बालकराम' के नाम सेव्यंग लेख. 'एकच प्याला' (एक ही प्याला) नाम का उनका नाटक मराठी रंगमंच पर एक ख़ासइज्ज़त का मुकाम कब्जाए हुए है. अब तक अलग अलग कलाकारों ने हज़ारों बार इस नाटक कोरंगमंच पर पेश किया है. इसके अलावा 'पुण्य-प्रभाव', 'भाव-बंधन', 'प्रेम-सन्यास'जैसे नाटक और 150 से ज़्यादा कविताएं उनके लेखन का हाई-पॉइंट रही. मशहूर नाटककारविजय तेंडुलकर ने एक बार कहा था कि, "गडकरी कालिदास के बाद भारत के सर्वश्रेष्ठनाटककार हैं." जिस राज-सन्यास नाटक को लेकर बवाल है उसमें शिवाजी महाराज और उनकेपुत्र संभाजी के बीच का आपसी टकराव दर्शाया था गडकरी ने. संभाजी ब्रिगेड खफ़ा है किइस नाटक में संभाजी की छवि ठीक नहीं दिखाई गई है. गौरतलब है कि ये नाटक गडकरी केअधूरे प्रोजेक्ट्स में से एक है. यानी इसे कभी रंगमंच का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ.लेकिन इन सब तथ्यों से उपद्रवियों का क्या वास्ता! उन्हें तो बस कोहराम मचाना है.संभाजी ब्रिगेड उर्फ़ लफंगे @ इतिहासगिरीये पहली बार नहीं है जब संभाजी ब्रिगेड अपनी गुंडई के चलते चर्चा में है. इससे पहलेभी उनके ऐसे कारनामे सामने आते रहे हैं. * 2004 में इन लोगों ने पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट' में घुसकर तोड़-फोड़ की थी. बहाना था जेम्स लेन की किताब, शिवाजी: द हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया. ब्रिगेड का कहना था कि इसमें शिवाजी महाराज और उनकी माताजी का अपमान किया गया है. फिर क्या था! घुस गए इंस्टिट्यूट में जहां के बच्चों ने जेम्स की रीसर्च में मदद की थी. जी भर के उत्पात मचाया. कई सारे ऐतिहासिक दस्तावेजों और कलाकृतियों को नष्ट किया. जैसे उनका ऐतिहासिक तौर पर कोई महत्व ना हो. वो देश की धरोहर न हों. * कुछ साल पहले पुणे के लाल-महल में घुस कर इन्होंने ऐसी ही हरकत की थी. वहां शिवाजी महाराज के गुरु दादोजी कोंडदेव की प्रतिमा लगी थी. ये लोग उसे भी हटाने की मांग कर रहे थे. इनका कहना था कि उनका नाम ब्राह्मणवादी इतिहासकारों ने खामखां मशहूर कर रखा है. इस मुद्दे पर ये लोग तत्कालीन मेयर के ऑफिस तक में घुस गए थे और तोड़-फोड़ की थी. * मूर्तियों से इनका बैर सिर्फ इंसानों तक ही सीमित हो ऐसा नहीं है. रायगढ़ में लगे एक कुत्ते के पुतले से भी इनकी भावनाएं भयंकर रूप से आहत होती रही है.रायगढ़ किले में एक 'वाघ्या' नाम के कुत्ते की प्रतिमा लगी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वो शिवाजी महाराज का था. संभाजी ब्रिगेड के रणबांकुरों को इस बात से असहमति थी. और असहमति जताने का तोड़-फोड़ के अलावा और कोई तरीका उन्हें आता ही नहीं है. सो फिर पहुंच गए अपने प्यारे काम पर.रायगढ़ में लगी 'वाघ्या' की प्रतिमाताज़ा घटना भले ही कितनी भी अतार्किक लग रही हो लेकिन है नहीं. बात दरअसल ये है किआने वाले नगर-पालिका चुनावों में संभाजी ब्रिगेड हिस्सा लेने जा रही है. तो चर्चामें आने का इससे आसान उपाय क्या होगा कि अस्मिता, इतिहास-पुरुषों का अपमान वगैरहवगैरह जैसे इमोशनल मुद्दे जबरन क्रिएट कर के 'टॉक ऑफ़ दी टाउन' बना जाए. आज़माया हुआनुस्ख़ा जो है. उम्मीद करते हैं जनता इनकी नौटंकियों में नहीं फंसेगी.--------------------------------------------------------------------------------https://www.youtube.com/watch?v=YEiAlDQXMsYये भी पढ़िएशिवाजी की मूर्ति के सपोर्ट में आए ओवैसी लेकिन...पाकिस्तानी स्टाल पर हमला कर कहा, 'यही राष्ट्रवाद है'देवेंद्र फडनवीस, गुंडा एक्ट लगाकर राज ठाकरे को जेल में क्यों नहीं ठूंस देते?